Thursday, 20 September 2012

आमुख



नारी !

समस्त ब्रह्माण्ड की आदि शक्ति हो तुम !

तुम हो,

अमृत पावन की धारा .

तेरे,

स्वस्तिमयकल्याणमयप्रचंड तेज को,

निज,

श्यामल,सघनआकाश सरिस विस्तृत,

उड़तेकृष्ण जलद से अलक जाल में,

उज्ज्वल मौक्तिक माल सदृश,

सहर्षसोल्लासित होकर,

शिव ने,

सत्वरसनतसाभार सम्हाला .

तू !

अनुपम, अप्रतिम, शाश्वत सौंदर्य की,

पावन प्रज्वलित आलोकित दीप शिखा .

ब्रह्मांड विमूर्छित,

चौदहों भुवन चकित,

सम्मोहन का यह मादक रूप अमिट,

कर गया चेतना को जो व्यथित थकित.

तुझ सा अपूर्व,

अन्यत्र न कोई अन्य दिखा.

अमृत-मंथन की विश्व मोहिनी भी,

तेरा निःशेष हुआ उपेक्षित,

मात्र, एक कण है.

तू .

स्वयं में सर्वांगपूर्ण,

एक चिरंतन उद्दीप्त सम्मोहन है.

अपूर्वा.

तेरा स्वरूप,

अंतिम अवलंबन, अचूक मारण है.

अन्नपूर्णा सी तू अक्षयदात्री,

अमर-पुत्र भी करबद्ध विनीत,

तेरी अनुकम्पा का प्रार्थी.

लहराते गर्वोन्नत अमिय कलश का,

तू ही एकमात्र अलभ्य दिव्य दर्पण है.

तुझमें ही निज को निरख निरख,

वह,

करता अपना मूल्यांकन है.

अंतिम शोभा श्री का तू मापक.

यह विश्व अकिंचन,

तेरा याचक है.

सुषमा सौष्ठव सहिष्णुता, वात्सल्य प्रज्ञा की,

तू अलंघ्य सीमा है.

तेरी शक्ति का जागरण,

है संसार सृजन का कारण.

सृष्टि-चक्र के क्रम में भी,

कर रहा पुरुष,

तेरा ही अनुसरण.

उत्कर्ष के क्रमशः बढ़ते सोपानों पर भी,

अग्रसर रहे सदा तेरे ही चरण.

जिन विभूतियों के अभाव में,

पुरुष रहा, सदा से दीन अकिंचन,

उन दैवी संपदा,

शालीनता मानवीय उच्चता का,

आप्लावित सोच्छ्वासित उल्लास चरम,

तुझमें ही लहराया.

कभी, किसी बिंदु पर,

किसी स्तर पर,

सम्मुख आकर वह तेरा अतिक्रमण,

कदापि, नहीं कर पाया.

अनुत्तरे !

तू पूर्ण काम, स्वस्तिमय महान !

तू लावण्य-श्री का,

ज्वार पूरित गगन प्रच्छायित महो दधि .

तुझे सका कर कौन वरन .

तेरी छवि, प्रतिबिंबित करने में,

संकुचित, समस्त भुवन का दर्पण.

सीमा में असीम तेरा स्वरूप.

तुझमें ही, खंड प्रलय ! महा प्रलय !

तुझमें ही अगणित ब्रह्मांडों का,

उत्थान-पतन, संहार-सृजन विलयन.

जाने कितने विराट रूप.

आंक रहे तव आँखों में,

अपना, रूप ! अरूप .

तव, पद्म-पलाक्ष मदिर नील नयन का उन्मीलन !

दिवा-रात्रि का शयन जागरण.

तेरे पलकों के कज्जल अंतरिक्ष में

समस्त भुवन का अलसित संतरण.

हो रहा अणु-अणु में

नव स्फुरण का वर्तुल नर्तन.

मोह-रात्रि,काल-रात्रि, महा-रात्रि .

सब पर तेरी छाया.

तू प्रज्ञा पारमिता !

आदिशक्ति ! संचालिका !

कहाँ सुप्त तेरा वह सम्मोहन.

पुनः कर क्षीर-उदधि में ,

अमृत का दोहन.

कर अपने अपार शक्ति का जयघोष.

नारी जागरणके नीरस खोखले स्वर में,

भर दे ! भर दे ! अमल नवल संजीवन.

सृष्टि थिरकती जिस पर,

तू ही वह वेणु-वादन.

केन्द्रीभूत कर्षण पर तेरे,

अहर्निश कर रहे खगोल भूगोल अयन.

अंकुरित तेरे ही में,

संसृति का नव-नव प्रत्यावर्तन.

तेरे अरुण नवल कँवल सरिस अलक्तक सज्जित,

लास चपल चरणों की शिंजनी से

बिखर पड़े अगणित मुक्ता से,

जगमग-जगमग, ये नखत गण, तारक गण.

ओ कल्याणी !

परम वैभव शालिनी.

सम्पूर्ण शक्ति सम्भूते .

निरख.

निज विशाल व्याप्त अपार शक्ति का,

अच्युत ! अक्षीण ! अनन्त सम्मोहन !

Saturday, 15 September 2012

सर्ग एक : कृष्णा !

 

नील पहाड़ियों का यह वन प्रांत.

किसी मधुर कामना सा,

पूरित, सुषमा-श्री से अभिराम.

निश्चिन्त निर्भय यहाँ खड़े,

विशाल नील गगन के नीचे,

जहां तहां मैदानों में, पहाड़ियों के क्रोड़ों में

जलाशयों अथवा सरिताओं, झरनों के आसपास .

पाकड़, पीपल, करंज, मधुक, गुलचीन,

देवदारु, सेमल,वट, बकुल, मौलश्री,पादप रसाल.

वन-पक्षियों के कलरव से गूँज रहा,

उनका सुरभित पल्लवित कुसुमित अंतराल.

इन्हीं पहाड़ियों की छिपी अभिलाषाओं सी,

बहुरंगी कुल्यायें और निर्झर की,

निःसृत होती हैं उज्ज्वल धाराएँ.

क्षीण तन्वी सी अवतरित होती ये,

धरती पर पृथुल हो जाती हैं.

रंग बिरंगे जलजातों उज्ज्वल तिरते वक पातों से,

वे, सज्जित हो जाती हैं.

निकट ही तरुओं से लिपटी लतिकाएँ,

जल के दर्पण में निज रूप निरख,

निज पर मोहित होकर,

लहर लहर जाती हैं.

रूपगर्विता सी,

सौंदर्य को सहज चुनौती देती इठलाती हैं.

दूर पहाड़ियों पर,

कदली करंज पाकड़ की सघन पल्लवित पातों के माध्य,

कृष्ण सरि की चंचल धारा सरिस,

इठलाते बल खाते,

सांझ समय,

दिखते हैं समूह में ऊपर पहाड़ियों से उतरते,

अर्ध नग्न, अधोपत से लिपटे वनवासी.

काँधे पर फरस कुल्हाड़ी रखे,

माथे पर मोर पंख गुलचीन की माला बाँधे

समवेत स्वर में गाते धूम मचाते, हैं ये जाते.

कृष्ण गात हैं, उन्मुक्त हास हैं.

उज्ज्वल इनका मनः-प्रकाश है.

वर्तमान ही जीवन है,

आगत पर नहीं आस है.

नहीं रंचक विश्वास है.

नवयौवन ही जीवन विलास है.

जितना इनके मन को छूता नीला नभ.

उतना ही इनकी बाँहों में भरता,

सागर का नीला जल उछल उछल ,

प्रकृति का उर्जस्वित यौवन,

क्षण-क्षण उसके आते जाते परिवर्तन,

इनकी आँखों के लहराते नागपाश में

बंध जाते उसके, हर रमणीक  मदिर क्षण.

चिर यौवना प्रकृति प्रेयसी,

पल-पल में रूप बदलती और संवरती,

मात्र करती,

रस राज ऋतुराज का ही अभिनंदन.

फिर हम आदिवासी, वनवासी.

क्यों माने कोई बंधन.

यौवन ही जीवन है,

सारभूत सत्य है.

यह अमृत का, रस का, मधु-वर्षण है.

बचपन, मिट्टी में पलता है,

जरा, शुष्क कटंकित झंखाड़ों सा है.

यौवन ही सत्य सही जीवन है,

इसका क्षण अल्प,मदिर है.

इस अमृत का हर पल जी लेना

इनके जीवन का मूल मन्त्र है.”

नहीं मानते कोई बंधन,

मिथ्या नीति नैतिकता का आडम्बर.

सदा अपेक्षित,

यौवन का निर्बंध स्वच्छंद विचरण.

हर युवा बाल यहाँ बंसी वाला है,

हर किशोरी सज्जित पुष्पों से,

नर्तित ब्रजबाला है.

मनचाहे जीवनसाथी का

स्वंय करते चयन है.

इसमें व्यवधान या निषेध,

कदापि नहीं सहते हैं.

नहीं ललाट पर चिंता की रेखाएं,

नहीं दिवस-श्रम-भार की कोई बाधाएं.

सांध्य समय जब दिनकर,

क्षितिज के लहराते श्यामल आँचल में छिपता है,

और रात्रि का प्रियतम निशिकर,

ऊंची पहाड़ियों से नीचे दिखता है.

ऐसे में वनवासी नर-नारी किशोर बालायें,

समवेत स्वरों में गाती, समूहों में,

ऊपर से नीचे आती हैं.

कदली वन पाकड़ की श्यामल छाया में,

रंग बिरंगे पातों की मालाओं पुष्पों से

सज्जित, बन-पाखी सी लहराती आती हैं.

उनकी वह स्वर लहरी !

पर्वत-प्रान्तों का ह्रदय चीरती,

निर्झरनी की तीव्र गति सरिस,

कभी अति ऊंची उठती और पुनः

शनैः शनैः  धीमी होती,

अन्तर को छूती दूर कहीं खो जाती हैं.

शब्द अपरिचित, राग अनोखे

ताल निबद्ध स्वर के,

आगे हरण अवरोहण के मादक झोंके !

तन-मन विभोर कर जाते हैं.

सांझ समय का यह गायन वादन,

वंशी धुन,पद घुंघरू ढोल मजीरों का स्वर

प्रत्युष काल में थमता है.

आज भी,

वैसा ही सब बीता है.

निस्तब्ध गगन है, स्तब्ध वन-उपवन है.

केवल समीप की स्वर्णरेखा का जल.

पाषाणों से टकराता,

आज कुछ अधिक मुखर है.

मौन अभी तक,

खग-कुल-कल कूजन,

शान्त धरा, शांत पवन.

पर,

सिहरा सिहरा कम्पित है.

किसी अवांछित, अप्रत्याशित के प्रति

त्रस्त चकित है,

मन का एकाकी आँगन.

नित्य ही तो, ऐसा सब कुछ होता था,

मन, शान्त पड़ा सब सह जाता था.

किन्तु, आज क्यों ?

यह अधीरता. यह आकुलता है.

ज्वर चढ़े ताप से तपते मन की

अतल गहराई में,

कुछ रिसता है, कुछ दुखता है .

प्राणों के सोये हर रंध्रों पर

कुछ अनजाना सा गुंजन होता है.

मन, दूर कहीं भटका-भटका,

खोया खोया सा हो जाता है.

मन के भीतर भी शांति नहीं है,

बाहर की नीरवता भी बोल रही है.

प्रकृति भी मौन बनी,

अपने में ही कुछ गुनती सी है.

नभ पर भी घन भरे-भरे से हैं,

अब बरसे तब बरसे जैसे हैं.

सांस खींच गंधवाही भी बहता है,

बादल में छिपता दिखता पीला चाँद,

दुःख की एक इबारत जैसा है.

धरती भी कोहरों की एक मोटी चादर डाल,

शान्त पड़ी है.

सघन धुंध है, मलिन चन्द्र है.

इसी धुंध में चांदनी का मौन संतरण है.

सहसा देखा,

रजत रश्मियों के पारदर्शी पट से लिपटी,

सघन कोहरों के मध्य,

खड़ी थी एक अपूर्व सुंदरी.

आक्रोश-पूर्ण, अश्रु-पूरित, आकर्णमूल

रक्ताभ नयन कमल से,

वह,

अपलक देख रही थी मेरी ओर.

उसके स्वच्छ मुकुर से मुख पर

निर्झरनी सी प्रवाहित थी,

पीड़ा करुणा की उद्वेलित लहरें.

नील-नयन के नैराश्य-कृष्ण-क्षितिज पर,

नखतों से,

दो अश्रु-बिंदु चमकते से थे ठहरे.

विद्ध कर गयी दृष्टि की तीव्र चुभन !

हौले से पूछा मैंने-

कौन हो तुम रूपसी ?

क्यों हो इतनी विष्णण मन ?

कारण क्या ?

क्यों यह एकांत भ्रमण ?

तुम्हारी आँखों का पीड़ाकुल रोष,

ज्वाला में जलता उद्दीप्त क्षोभ ,

सद्दः-स्नात तव उच्छ्वसित अश्रु झरो में,

हो रहा अत्यंत मुखर दुस्तर.

अक्षम तू !

यह दुर्वह भार वहाँ करने में.

अधीर बना रही है मुझे.

अश्रु निमज्जित आँखों की तड़पन .

विद्रुम कंपते अधरों पर,

बाल खाती, लहरें लेती पीड़ा का आकुंचन .

नख से शिख तक,

कोमल वल्लरी सरिस,

लहर गया,

छलकती मदिरा सा,

उसका मादक मोहक तन.

बोली वह-

क्या बतलाऊँ मैं हूँ कौन!

मेरी जाति के प्रति,

धरती-आकाश सभी मौन.

मरकत प्याली में सज्जित नील मीठा सा,

यह वन-प्रांत .

क्या यहाँ आकर भी,

हो पायेगा यह व्यथित प्राण शान्त.

तू ही कह !

कौन हूँ मैं ?

किसी लगती हूँ तुझको ?

आँखों की तुला पर

तुल ना सका वह रूप .

कम्पित बोली मैं –

तुम !

तुम्हारे तन का यह सम्मोहक लोच.

हो गया विमूर्छित जिससे,

गहन निशा का निःस्वन .

कर गया झंकृत,

संसृति की शान्त पड़ी वीणा का स्वर.

तुम हो.

कृपाण की तीक्ष्ण धार.

पुष्प-धन्वा का अप्रत्याशित अचूक वार.

यह रूप !

रजत-चांदनी का लहरें लेता,

दुग्ध-धवल-पारावार.

नहीं जिसकी कोई तुलना,

नहीं आदि-अंत या कोई छोर.

कस्तूरी-मृग सी निज मद से चकित विभोर.

हो, अलंघ्य, अप्रतिहत, दुर्निवार.

तेरे, शोभा श्री के लावण्य-जलधि में,

आकंठ-निमज्जित तन-मन है,

विमुग्ध विस्मित.

ह्रदय-कमल के सद्दः विकसित मुकुलित

सहस्र-दलों के   

आकम्पित पुलकित सिहरन पर,

नर्तित तव नूपुर झंकृत

अल्त्तक लास चपल-चरण.

भंवरों के अलसित गुंजन सा,

शिंजनी की मृदुल मदिर रुनझुन.

सजल घन से,

श्यामल सघन कुंचित कृष्ण अलक जाल.

रत्न खचित छलकते अमिय-स्वर्ण-चषक से लिपटे,

मधु पीने को लहराते, आतुर कृष्ण व्याल.

तेरे तन मन की सुगंध.

पवन थपेड़ों से दोलित,

गंध-अंध-आकुल विकच विभोर .

कमल-दल का वन.

या मुग्ध चांदनी में उन्मन.

मसृण मृणाल सरिस कर-पल्लव में सज्जित,

ये रत्न जटित वलय.

रह गयी तेरे कर से लिपट ठगी चकित,

यह रूप गर्विता विद्युत, विमूर्छित.

निश्चय ही तुम हो,

कोई अप्सरा.

अथवा,

किसी महाकवि की भावुक मधुर बहकी कल्पना.

आई !

उसके डहडहे किंशुक अधरों पर,

विद्रूप की स्मित रेखा.

दिखी,

मुक्ताओं की मोहक पंक्ति सी,

प्रवाल सम्पुट के मध्य,

सजी दशनों की लेखा.

बोली उपालंभ से-

हूँ अप्सरा.

नहीं जानती वह बंधन.

कभी नहीं देखा उसने,

मूक ह्रदय की पीड़ा का दारुण मंथन.

होती है वह.

उन्मुक्त गगन सी , निर्बंध पवन सी,

अस्थिर त्वरित चपल तुहिन कणों सी.

उसके पलकों की तूलिका.

जहां भी जाकर थमती है.

क्यों न हो वह, आकाश-कुसुम ही

वह, सद्दः उसको ले लेती है.

और कल्पना.

प्रज्ञा के उज्ज्वल-दुग्ध-धवल-क्षितिज पर,

उड़ते जहां अगरु-धूम से,

तर्क वितर्क जिज्ञासाओं के घन सार.

सौर-कक्षा, नक्षत्र-ग्रहों में,

तन्मय होकर, शीश धंसा कर,

जब उलझे रहते हैं विज्ञान-ज्ञान.

विरस होकर इनकी नीरसता से

क्षण में कर आती सर्वत्र भ्रमण .

भर अंजलि में,

प्रकृति का सुरभित कुसुमित नवल हास,

करती,

सत्यम शिवम सुन्दरम् का अह्वान .

पुष्पों के केशर पराग से लिपटे,

उसके कोमल अंग-अंग.

जीवन उसका शाश्वत बसंत .

पुष्प-धनु है वह मादक.

विस्मृति में भूल गया जिसे अनंग.

स्वप्न-सरि में कुवलय सी डूबी उसकी आँखें,

ज्यों, मधु-सिक्त विकल मधुकर की पांखें.

वह.

क्या जाने पीड़ा की गहराई ?

देखा है उसने केवल,

जीवन की अन्यतम मधुर सुघराई.

देख इधर.

मेरी इन आँखों में

हिम-पात-ज्वलित-आहत इन जलजातों में.

जीवन रस इनका सूख गया है,

खिलते ही खिलते जो झुलस गया है.

शीतल होता है हिमकर

पर इन्हें ,

बुरी तरह से जला गया है.

देख जरा.

नयनों के तपते नील गगन में

अपनी ही ज्वाला से घिरकर,  

जल रहा, अरमानों का निशिकर.

मुमूर्ष पंख जले उज्ज्वल पक्षी सा तड़प रहा है,

निरभ्र, नील जलते नभ पर,

मन की उठती, इन ज्वार-संकुलित ऊंची लहरों को,

आकुल है, क्षण छू लेने को.

आकंठ डूबकर शीतल हो जाने को.

कैसे कहते हैं इसे सुधाकर ?

छलकते हुए हलाहल का,

यह, आप्लावित गागर है.

निज जीवन का व्यंग बना,

पराये प्रकाश का प्रतिबिंबित दर्पण है.

क्षण-क्षण इसका ही क्षरण हो रहा,

कहाँ इसमें मधु का वर्षण है.

निरख ! इसके अंतर के गहरे क्षत !

कितना यह, भीतर ही भीतर आहत है.

जिसमें अपना ही जीवन नहीं,

वह क्या संजीवन देगा ?

व्यर्थ, अपेक्षा करना अमृत का,

यह मात्र एक छलावा ! एक कल्पना है !

कोई नहीं जानता ?

वस्तुतः अमिय कहाँ है.

अनर्थक उसके अन्वेषण में ,

पागल से सब,

अंजलि भर रहे अपनी ही सैकत सी,

ज्वलित तृषा से,

मृग-जल ही जिसे कहते हैं.

मैंने भी कभी नहीं उसे देखा है.

किन्तु !

हलाहल की कटुता से,

उसकी मधुता को जाना है.

सुख !

किसे कहते हैं सुख ?

केवल, गहन पीड़ा की वह पड़ती परछाईं है.

वह,

सतह पर ऊपर लहराता पारद-कण है.

दुःख की जड़,

जाकर, अतल गहन गहराई में,

दूर कहीं समाई है.

उसकी चाहना मात्र दुराशा है.

अपनी ही ज्वाला से,

अंतर धू-धू कर जलता है अपने ही भीतर का कंकाल.

कितनी कटु भर्त्सना करता है.

हर नारी की यही करुण कहानी है.

वह अपनी अभिलाषाओं की है समाधि.

वह है अपना ही जीवित मृगजल.

सब प्रकार से कुचल गया उसे,

पतित समाज का गलित घृणित छल.

शाश्वत शोषण में भूल चुकी वह.

निज जीवन की धड़कन.

अपने मृत कंकाल का कर रही वह ,

फेंके गए, दया के टुकड़ों से पोषण.

अब भी, तू मौन बनी देख रही है,

मुझे गहरी आँखों से.

रंचक नहीं विचलित हो पायी,

तू मेरी इन बातों से.

या,

लुब्ध कर गए तुझे.

मेरे ये अलभ्य भव्य अलंकरण .

क्योंकि,

यह नारी की सबसे बड़ी दुर्बलता है.

कभी कैसी दशा में भी,

होता नहीं इसका लोभ संवरण .

किन्तु.

कितना गहरा मोल लिया है,

इसने नारी जीवन का !

इन्द्रायण फल सा मोहक मारक है यह.

नारी-स्वाभिमान गरिमा का.

कितनी महंगी कीमत भुना रहा,

इसे, किसी ने नहीं पहचाना.

ये !

रत्न-जटित स्वर्ण अलंकरण !

हैं यह निरे पुरुष बंधन.

कसे हैं,

लौह के छंद के छंद,

खुल न सकें,

ऐसे जटिल बंद.

मुग्ध देख रही इस पायल को,

सदियों से इससे घायल,

नारी के कोमल चरण,

कर रहे अनवरत रक्त क्षरण .

वह नहीं लाली,

नहीं चरणों के श्रृंगार !

वह मात्र प्रतीक है रक्त-रंजित, गति-रहित,

बंदी पराधीन जीवन के.

इनकी प्रत्येक खड़कती ध्वनि.

शिंजनी की नहीं,

बेड़ियों की हैं झंकार.

यह, करती है प्रहार,

ठोकर देती, स्मरण दिलाती है.

मर्दित स्वाभिमान नारी शोषण का .

इन नूपुरों का कल नाद,

इनकी रुनझुन, इनकी आवाज

यद्यपि प्रतिभासित करती है,

मुग्धता मनोरमता का मधुर संचार.

किन्तु,

कैसा दुहरा है व्यापार.

यह !

एक, गर्हित सामाजिक शोषण ,

पराधीन विवशता का

अहर्निश की

गतिविधियां, सीमा-संकेत, अवस्थिति-स्थिति

का करती रहती है,

संकेत.

स्वर्ण वलय हो या लौह श्रृंखला.

लक्ष्य एक ही है उसका.

इन रत्न जटित वलय में बंदी, कर .

उतने ही,

आगे ,पीछे ,हटते हैं.

जितना,

इनका सूत्रधार

इन्हें ढीलता या खींचता है.

सदियों से चला आ रहा है .

इन सजी निर्जीव कठपुतलियों का

व्यापार .

कितना सजग निपुण है इनका सूत्रधार.

निज अभिषिक्त स्थानों पर,

इन्हें स्थापित करता,

हटाता बढ़ाता सजीव अभिनय करवाता है.

देख !

सीमान्त पर जटित,

यह रक्त-चन्दन या सिन्दूर.

दमन के क्रूर असिधारों से ,

कर मांग पर गहरी चोट,

दिया उसे सिन्दूर का ओट,

कभी दर्प से उठ न सके ऊंचा भाल.    

किया ‘अहम’ चूर्ण लोहित लाल.

यह सिन्दूर !

नामांकित एक मुहर है.

ठोंक जिसे उसके माथे पर,

वह,

बिना उसे जताए, बिना बताये,

वह,

किसी अप्रत्याशित अज्ञात दिशा को भेजी जाती है.

उसकी यह अवधि रहित यात्रा !

मात्र, प्रेषक और प्रेषित को ही ज्ञात रहती है.

स्वयम्बर ! या स्वीकृति !

केवल एक दिखावा है.

उसकी स्वीकृति या अस्वीकृति ,

विरोध या रोष,

कोई अर्थ नहीं रखता.

यह है उसका प्रारब्ध .

दें है कुटिल नियति की .

स्वामी और क्रीत दासी का,

यह सम्बन्ध,

चिरंतन का बना बनाया होता है.

पाश में बाँध बलि का अज है वह .

उसकी मूक बलि चढ़ा कर,

विकृत समाज का यह अनीतिपूर्ण यज्ञ पूर्ण होता है.

अपनी ही अंतर-ज्वाला से जलती,

प्रति-पल मोम सरिस गलती,

इन सामाजिक अत्याचारों को, शोषण को,

मौन बनी अहर्निश सहती है.

पूछेगी तू .

मैं हूँ कौन ?

मैं !

 

मैं ! द्रुपद यज्ञ में अवतरित हुई,

द्रुप की दुहिता हूँ,

‘कृष्णा’

“कृष्णा !” चौंकी मैं सहसा !

महाभारत की अनिद्य-सुंदरी रूपसी !

लावण्य-जलधि की अप्रतिम विश्व मोहिनी !

सौंदर्य-उदधि के आप्लावित गर्वोन्नत,

ज्वार-संकुलित लहरों पर दोलित,

दो ही तो थे अपूर्व सहस्र-दल-जलजात !

“कृष्ण अथवा कृष्णा.”

नख से शिख तक निज को इंगित करती,

वह बोली-

वेदना-विगलित स्वर भर गहरी उसांस .

“ यह रूप !”

स्वयं ही कह रहा अपना इतिहास.

न होता यह पुष्प-धन्वा का मोहक पञ्च-शर !

होता फिर मुझे भला किसका भय या डर !

किन्तु,

अपनी मादकता से स्वतः आमंत्रण देता,

यह,

स्वर्ण-चषक में लहराता कालकूट हलाहल है.

दग्ध हो रही जिसकी ज्वाला से आब तक मैं.

कितना क्रूर अभिशाप बना है यह,

नारी के स्वाभिमान, मान मर्यादा का.

यदि होती मैं.

कोई किरात-कन्या, कृषक-कन्या अथवा वन-वासिनी.

निज मन के अनुकूल चली होती,

होता कुछ अन्य ही मेरा भविष्य.

पुरुष की,

दमन-नीति, रणनीति, राज-पद की,

मदांध लोलुपता की,

यों न होती मैं.

“नारी-मेघ-यज्ञ का हविष्य.”

मत सोच कि मैं वैभव में पली,

राज-कन्या, राज-महिषी अथवा

महाभारत की राज्य-श्री,

सम्राज्ञी हूँ.

सर्वसाधारण सी मैं भी,

एक दुर्बल नारी हूँ.

जिसकी गरिमा, शालीनता,

स्वाभिमान और अस्तित्व,

सदा से पुरुषों के द्वारा,

निर्ममता से पद-दलित, तिरस्कृत हुआ.

यह नारी,

जिसे, निज सर्वस्व समझकर

सम्पूर्ण समर्पित हो उसके प्रति,

उसके,

उसके स्वजनों के प्रति कर्तव्य परायण होकर,

रात्रि दिवस उनकी सेवा करती है.

जिन चरणों की वह ठोकर खाती,

निज कर से उन चरणों का प्रक्षालन कर,

पथ-श्रम-भार, हरण करती है.

प्रत्युत्तर में,

कटूक्तियां जलते विषाक्त व्यंग-बाणों को,

आँखों के आंसू के संग,

सस्मित पी जाती है.

पीड़ा के कंपते अधरों को,

कातर मुस्कानों से ढंकती है.

अंतर के रोदन के आवेगों को,

मिथ्या हासों से भरती है.

सबके सुख, साधन में पूर्ण निरत,

सबसे सदा भयभीत त्रसित रहती है.

उसके उत्पीड़न शोषण मूक रुदन से पुरुष का,

सदाबहार, नंदन कानन लहराता है.

अपने, साम दाम दण्ड भेद पर,

परम प्रसन्न वह

पड़ा-पड़ा, चैन की वंशी सदा बजाता है.

यह नारी !

कब किसने उसके सपनों को पूछा .

किसने देखा

कब फूल खिले थे अरमानों के,

कब हर पात-पात भींग गए अश्रुओं से,

कब जल गए इंद्र-धनुष सतरंगी आँखों के,

मन की जलती आहों से.

कब, हर खिली, अधखिली कलियाँ,

रह गयीं ठिठुर कर,

अदृष्ट के अप्रत्याशित हिम-पातों से.

कब कैद हो गए उत्सव अरमानों के,

किसी अज्ञात-काल की कारा में,

आशयों के जलते दीप बुझ गए,

मूक अश्रुओं की अजस्र बहती धारा में.

यह है सदियों की नारी.

नियति, भाग्य, अन्याय, अनीति, दमन, शोषण की मारी.

मैं भी ऐसी ही एक पीड़िता .

जाने कितने जन्मों की,

वरदान-वियुक्ता-अभिशप्ता.

आई हूँ तेरे पास.

तू भी तो एक नारी है.

भावों के मंथन उत्पीड़न आलोड़न के

निठुर निकष पर,

कभी तो उतरी होगी ?

घातों प्रतिघातों का पारावार,

कभी तो प्रतिशोधों में,

हुंकृत, उच्छ्वसित, आंदोलित होता होगा.

नारी !

क्या है नारी ?

एक प्रस्तर प्रतिमा.

एक सपाट शिला.

जैसा चाहा वैसी छवि उकेर दिया.

अपने ही मनमाने रंगों से,

जैसा तैसा भर कर,

किसी नाम से पुकार दिया.

कभी इसे उर्मिला बनाया,

कभी सीता या सावित्री,

कभी शिव-आज्ञा से पीड़ित,

सती या पार्वती.

कभी शाप-ग्रस्ता गौतमी पाषाणी.

या शरण मांगती,

नहुष-भय भीता शची इन्द्राणी

नारी-दासता का कितना गर्हित है यह रूप.

सटी की संज्ञा देकर उसे,

जलती चिता में बलात् चढ़ाकर,

जीवित ही भस्म कर डाला.

दासी जिसकी जब वाही नहीं,

अधिकार नहीं, तब जीने का.

बड़ी नृशंसता, घोर उपेक्षा से,

यह घोषित कर डाला.

पाशविकता के इस चरम पर आकार भी,

उसे संतोष नहीं,

अपनी अविवेकपूर्ण स्वार्थपरक बर्बरता के प्रति भी,

उसे किंचित क्षोभ नहीं.

सब प्रकार से भली-भांति,

प्रत्येक समय और अवसर के अनुरूप,

उससे मांग की जाती है.

निज कार्य-सिद्धि, प्रयोजन के हित,

नीति-अनीति धर्म-अधर्म की सारी विधा,

नियम और नैतिकता,

मौन पड़ी रह जाती है.

लक्ष्य-प्राप्ति के निमित्त, बिना हिचक,

उसकी भेंट चढती है.

कभी वह.

देव-पुत्रों की जननी कभी उनकी पत्नी बनती है.

या, राजनीति अथवा कूटनीति,

उसे,

शत्रु, मित्र दोनों को,

उपहार सरिस, समर्पित करती है.

कभी धर्म, कभी समाज,

कभी मान-मर्यादा के नाम पर,

कब तक,

पुरुषों के अत्याचार अन्याय दमन शोषण की

जघन्य इस बलिवेदी के यज्ञ में,

यह,”नारी-बलि” चढती रहेगी ?

वह,

निज अधिकारों से वंचित,

शोषित, पीड़ित और प्रताड़ित

आर्थिक परतंत्रता की रसना में जकड़ी,

मिथ्या दया की बैसाखी पर,

उसके उच्छिष्ट टुकड़ों पर पलती.

दीन, हीन, मलिन, विवश.

कब तक वह,

दासता के अंतहीन पथ पर,

अपाहिज सी रगड़ती, घसीटती रहेगी ?

मत भूल ! किसी छलावे में.

अनवरत जल रही है तू भी,

अपमान लांछना के उबलते लावे में.

चल उठ. बाहर आ.

पल नहीं, थम सक रही यहाँ मैं.

कर रहा विमूर्छित मुझे,

उत्पीडन, दमन, संत्रास का यह

बोझिल विषाक्त पवन.

सुलगते कड़वे काष्ठ धूम में,

कुंठा प्रतिहिंसा की है सघन घुटन.

सदियों की इस बासी सड़ांध में,

कैसे कोई मौन बना रह सकता है.

विकृतियों के गलित शवों के,

अनवरत हो रहे मौन हवन में

तिल-तिल,घुट-घुट कर मर जाना ही,

क्या कहलाता है जीव.

इस गृह कक्षा की,

काई लगी पत्थर की ऊंची प्राचीरों में,

कैद, प्राणों का पंछी.

पंख फड़फड़ाता, ऊपर उठकर,

ऊंचे उड़ने की निष्फल चेष्टा में,

बार-बार दीवारों से टकराता,

चोटें खाता लोहित, रक्त स्रावित,

धरती पर गिरता है.

ऊंची है सदियों की बीहड़,

ये पत्थर की ऊबड़-खाबड़ दीवारें.

असमर्थ विवश, चाह कर भी वह,

लांघ नहीं पाता.

जब भी प्रयास करता खुली हवा में सांस लेने का.

केवल आहत होकर हताश गिर जाता है.

तड़प-तड़प कर रह जाता है.

बोल कर शान्त हुई कृष्णा

देखा प्रश्न भरी आँखों से मेरी ओर.

सब सुनती, सब गुनती,

मन के आवेगों को सहज दबाती,

निश्चेष्ट पड़ी कहा मैंने हौले से –

“ जो कहना है यहीं कह.

मैं उठकर बाहर जाऊं ,

यह कदापि नहीं हो सकता.

सदियों के कैद कमजोर चरण ये,

क्या धरती पर जम पायेंगे ?

कैसे झटका दे दूँ इन्हें अचानक,

क्या ये भार वहन कर बढ़ पायेंगे ?

कहा कृष्णा ने दृढ़ता से –

यही आत्म-निर्बलता भीरुता नारी की,

कर रही दीमक सा, उसका आत्म-हनन.

इसी भीरुता से मेरा भी,

हुआ इस प्रकार आत्म-दहन.

यदि दृढ़ता से मैंने ,

स्वयम्बर का विरोध किया होता

सावित्री ने जैसे अपनाया सत्यवान को,

मैंने भी आगे बढ़कर

पार्थ का ही, बिना शर्त, चयन किया होता.

मेरी यह पीड़ित आत्मा.

अपना शाश्वत आश्रय पा जाती.

एक पार्थ को छोड़कर,

नहीं किसी अन्य की कहलाती.

कहा अनुनय से मैंने-

कृष्णे !

ढकी बर्फ से ज्वालामुखी को ,

तुम, मत यों ठोकर दो.

जो बीत चुका है उसका,

नहीं ब विश्लेषण हो.

आगत अज्ञात, अतीत लौटता नहीं,

वर्तमान ही झेला जाता है.

मैं कैसे दूँ साथ तुम्हारा.

जो क्रांति तुमको वांछित है ,

वह शुष्क तृण नहीं सह सकता है.

जो कहना है कह दे यहीं,

मत कर बाध्य बाहर जाने को. क्या नहीं जानती तुम.

इस गृह कक्षा में ही नहीं

प्रत्येक गृहों के भीतर

सदियों का अदुर्दमनीय पुरुष रहता है.

वह ऐसा गृह स्वामी है जो,

गृह का ही नहीं,

घर के बाहर भीतर का,

प्रत्येक कार्यकलापों प्रतिक्रियाओं,

प्रमाण साक्ष्य का,

सख्ती से लेखा-जोखा लेता है.

हर चलती स्वांस गृह की,

उसकी ही अनुमति है.

वह अपनी ही करता है,

नहीं किसी की सुनता है.

वह.

पिता है. पति है. भ्राता है. पुत्र है.  

पर है वह,

केवल वाही एक पुरुष.

इन सब छद्मवेशी परिवेशों से

वह निज को आवृत करता है.

नारी !

माता है. पत्नी है. बहन है. पुत्री है.

किन्तु,

है, वह वही.

युगों से उत्पीड़िता शोषिता नारी.

जाने कबसे निष्कंटक चली आ रही

निर्मम शोषण-कर्ता और निरीह विवश शोषिता की,

यह पीड़ित अश्रु-भरी करुण कहानी.

“ मैं चलूँ .”

यह कदापि नहीं हो सकता,

अपना विरोध,

उचित हो या अनुचित,

पुरुष कदापि नहीं सह सकता.

सदियों की निरंकुश कशा हाथों की,

क्षण न उसे थमने देगी.

तेरे लिए, अलंकरण हैं बंधन.

यहाँ तो अंतर के उद्वेलन भी, नहीं हैं स्वछन्द.

अधर पर अधर ही रह जाते हैं.

मन के उमड़ते उद्गार.

शब्द !

छिन्न-भिन्न, अस्फुट से ही, टूट-टूट कर

अधरों के भीतर ही बिखर जाते हैं.

कभी नहीं हो पाते साकार.

कठोर दृष्टि का ज्वलित वार

भस्म कर देते हैं पल्लवित उल्लास.

फिर किसी प्रकार की सक्रियता,

 कैसे हो पाए साकार.

निश्चय ही तुमने देखा होगा.

अभ्यागत कक्ष में,

सज्जित लघु मृण-पात्र में,

समाये,

विशाल वट-वृक्ष का एक लघु रूप.

तीक्ष्ण धार से,

काट-काट कर, छिन्न-भिन्न कर देते हैं,

उसके कोमल मांसल श्यामल अंग-अंग.

जड़ से लहराती नव पल्लवित झूमती फुनगी तक,

निर्ममता से चल जाती है तीक्ष्ण धार.

तड़प-तड़प कर गिरते हैं धरती पर

मसृण पतली-पतली टहनी, नव गुम्फित हरित पात.

कभी बढ़कर वे होते, पक्षियों के आश्रयदाता,

पथ-श्रम-थकित बटोही

उसकी छाया में शीतलता पाता.

किन्तु, पनपने के पूर्व ही उन्हें,

दुग्ध-पान करते शिशु सा,

धरती के वक्ष से खींच लिया जाता है.

स्नेह-स्निग्ध कोमल धरती से

जल पीती जड़ों को,

नोच-खसोट काट-काट कर

विलग कर दिया जाता है.   

फिर,

कंकड पत्थर रेतों की कड़ी शय्या पर

छोटे से मृण-पात्र में,

जबरन उसे कैद कर,

हाथ-पैर काट कर

कठिन कारावास दे देते हैं.

नहीं मिलती है उन्हें.

सघन श्यामल बादल की छाया.

नहीं मिलती स्नेहाद्र वसुधा की कोमल काया.

नहीं जानते वे .

अरुणोदय की लाली.

नहीं खेलती उनके पातों से,

रश्मियाँ सप्त रंगों वाली.

नहीं ढालती उनपर चांदनी,

तुहिनों की शीतल प्याली.

सन्देश नहीं दे पाता उसको

संध्या की काली आँखों का उन्मीलन.

प्रकृति के सारे आकर्षण से

वंचित हो जाता है उनका जीवन.

कृत्रिम प्रकाश के सम्मुख,

अपने ही जीवन का कटु व्यंग बना रह जाता है.

तेज दुधिया प्रकाश.

उनकी अपंगता, कुरूपता और विवशता,

बौनेपन पर बिखर-बिखर जाता है.

उनकी रचनात्मकता, सक्रियता, सजीवता को,

बंध्या बनाकर,

कला-नैपुण्य का नया रूप दे देते हैं.

उस, कटे हाथ-पैर वाले

बंदी अपाहिज वृक्ष को

अपनी जिंदगी का ममी बना,

कोने में, गुमसुम बैठा देखती हूँ.

मन क्षुब्ध हो जाता है.

एक टीस सी उठती है सीने में,

व्यर्थ है इस प्रकार जीने में.

क्यों है उसपर ऐसी पीड़ित ममता.

जब भी उसे देखती हूँ,

सहम जाती हूँ.

कुछ भी कहते-कहते

उस पर दृष्टि पड़ते ही,

थम जाती हूँ.

“मत कह मुझे चलने को.”

खुली हवा में साँसे रुकती हैं,

घबड़ा जाता है.

तू जा.

कैद पक्षी.

बंधन का अभ्यासी.

पिंजरे में ही सुख पाता है.

अर्गला खोलूंगी.

पूछेगा वह.

पदचाप सुनेगा,

उठ बैठेगा वह.

कहीं भी जाऊंगी,

छाया सा बढ़ जाएगा, वह.

मुख पर आते-जाते भावों, आवेशों का,

सम्मुख पथ रोक,

स्पष्ट दर्पण बन जायेगा, वह.

उसकी,

प्रश्न भरी चुभती दृष्टि.

तन मन जो भेदती,

मानस-क्षितिज पर,

जलती उल्का सी आतंक मचायेगी.

यह दृष्टि. यह अधिकार.

यह स्पष्टीकरण की मांग.

आज की नहीं.

किसी एक की नहीं.

उसकी है.

जिसे सब कहने का अधिकार,

पर, रंचक सुनना स्वीकार नहीं.

नारी से उत्तर माँगता, वह,

अपने उन सारे परिवेशों का परित्याग कर देता है. 

जिसकी संज्ञा है.

पिता, पति, भाई, पुत्र, स्वजन.

वह वास्तविक और सही अर्थों में,

मात्र, वही, पुरुष बनकर रह जाता है.

कोमलता की कोई परिस्थिति,

किसी धर्म-संकट की आपत्ति,

ममता की कोई कातर प्रतिक्रिया,

उसे, नहीं परिवर्तित करती है.

वह, कभी, कहीं, किसी स्तर पर,

समझौता या क्षमा नहीं करता है.

भले ही वह नारी.

आदर, स्नेह, प्रेम, वत्सलता का पात्र हो.

उसकी स्थिति या परिवेश.

उसकी कठिन परुषता में

किंचित कोमलता का समावेश नहीं करता है.

तेरे समीप से पुनः लौटकर,

संतोष के नहीं,

अपितु असंतोष आक्रोश के,

घिर आयेंगे तिमराछन्न सघन बादल.

कई प्रश्न भरी जलती आँखों को,

क्या उत्तर दे पाएगी,

मेरी असमर्थ दीन अश्रु भरी आँखें कातर.

दया कर. छोड़ दे मुझे.

तू जा ! कहीं अन्यत्र जा.

क्रोध भरी आँखों से देखा कृष्णा ने,

कंपे उसके आरक्त अधर.

बोली-

“दे ! अपनी मसि-निर्झरणी इधर बढ़ा,

दे मुझको सत्वर.

समय-प्रवाह को जो बांध न सके,

कर न सके समाज की पीड़ा का अवगाहन.

जल रहे जब आदर्श .

हो रहा मानवता का दीन पतन.

कायर है वह लेखक,

जो आँखें बंद करता है

उत्तरदायित्वों से पलायन.

और बंद करता है निज बौद्धिकता का

उन्मुक्त हुआ वातायन.

नहीं अक्षम को सुशोभित.

वाणी का यह पावन आशीष.

दे अपनी मसि-निर्झरणी

नहीं चाहती तुझसे भीख.

लेगा वही इसे.

जो मूल्य इसका जानेगा.

मुझको भी कहीं न कहीं,

नारी समस्याओं का निदान मिल जाएगा.

बोली मैं सस्मित –

जन्म-जन्म का मोल लिया है,

मेरी इस मसि-निर्झरणी ने.

अगणित जन्मों की पीड़ा मुखरित है

इसकी छोटी धड़कन में.

सारे आकर्षण मलिन पड़ गए,

इसे वरण करने में.”

चल. किस सीमा तक ले जायेगी,

वह भी मैं सह लूंगी.

यह मेरे प्राणों की वीणा

इसे नहीं विलग कर पाऊँगी.

हंस कर बोली कृष्णा-

देख जरा, क्या उथल-पुथल मची है

नारी-जन-जीवन में.

चल बाहर शान्ति से बातें होंगी

बैठ कहीं निर्जन में.

इस गृह कक्षा के भीतर,

कुछ भी कह पाना,

भला कहाँ संभव है.

सोने का अभिनय करता हर पुरुष,

सहन कर पाने में दुर्वह.

चल उठ. चल नील गगन के नीचे,

सर्प से भी गहरे कान पुरुष के,

सब सुन लेगा वह,

आँखे, मींचे-मींचे .