सृष्टि के मूल में ही नारी विद्दमान है और उसे केन्द्र में रखकर ही
सामाजिक-व्यवस्था की संरचना और उसका उत्तरोत्तर विकास हुआ है. सामाजिक-विकास के
क्रम में आने वाले परिवर्तनों के मूल में भी वे प्रयोग हैं जो नारी को केन्द्र में
रखकर किये गए. व्यवस्था और चिंतन का क्रम निरंतर चलता रहा तथा होने वाले परिवर्तन
सामाजिक विकास को यथा समय शक्ति प्रदान करते रहे, पर इतिहास साक्षी है कि नारी को
कभी भी शोषण से मुक्त नहीं किया जा सका. यह दूसरी बात है कि शोषण की मात्र एवं
स्वरूप में बराबर परिवर्तन होता रहा है. सामाजिक विकास के क्रम में मातृप्रधान
सत्ता की दुर्बलताओं को कम करने के लिए ही पितृ-प्रधान सत्ता को स्वीकृति मिली थी
और स्वच्छंद प्रेमाचार के दुर्गणों से समाज को बचाने के लिए ही विवाह संस्था का
निर्माण हुआ था. कालान्तर में राजसत्ता के मजबूत शिकंजों से समाज को इसलिए जकडा
गया कि एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण हो सके, पर क्या ऐसा संभव हुआ ? शोषण का
स्वरूप बदलता रहा और वह उत्तरोत्तर सामाजिक जीवन का अंग बनता गया. यह एक विचित्र
बात है कि प्रत्येक अवस्था में सर्वाधिक शोषण नारी का ही हुआ है, भले ही उसे
इतिहास द्वारा युग परिवर्तन का श्रेय दिया जाता रहा. रामायणकाल से लेकर महाभारतकाल
तक जितने भी महान युद्ध लड़े गए, सबके मूल में नारियाँ ही रहीं और उन्हें ही शोषण
का शिकार भी होना पड़ा.
उपलब्ध इतिहास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नारी शोषण का जो घिनौना स्वरूप आज समाज में वर्तमान है उसका
उतना घिनौना रूप इसके पूर्व कभी नहीं था. ‘अनुत्तरे’ की कवयित्री वर्तमान
नारी-शोषण से आहत हुई हैं, जिसकी सफल अभिव्यक्ति उसमें सहज ही देखी जा सकती है.
कवयित्री ने वर्तमान नारी समस्यायों के चित्रण के लिए आधुनिक अथवा कल्पित पात्रों
को अपनी इस कृति के लिए न चुनकर उसके लिए वैदिक, रामायण एवं महाभारतकाल को चुना
है. महाभारतकाल की सामाजिक जटिलताएं वर्तमान समाज की जटिलताओं से सर्वाधिक मेल
खाती हैं, यही कारण है कि कवयित्री ने ‘अनुत्तरे’ में अपने को महाभारतकालीन
नारियों और मुख्यतः ‘कृष्णा’ एवं ‘कुंती’ पर केंद्रित रखा है. प्राचीनता के प्रति सहज आकर्षण और इतिहास-रस की कमनीयता
के प्रति मोह का होना सहज-स्वाभाविक है, जिसका लाभ ‘अनुत्तरे’ में लिया गया है, अन्यथा
वर्तमान अथवा कल्पित नारी चरित्रों के माध्यम से भी ‘अनुत्तरे’ की
समस्यायों को प्रस्तुत किया जा सकता था . इतना अवश्य है कि ऐसा करने पर केवल
प्रगीतों और मुक्तकों पर ही संतोष करना पड़ता तथा ‘अनुत्तरे’ में
प्रबंधात्मकता का समावेश संभव न होता. ‘अनुत्तरे’ में जो कथात्मकता आ पाई
है, उसके मूल में पौराणिक सन्दर्भों का आख्यान ही है. इस आख्यान के माध्यम से
कवयित्री ने भारतीय नारी के शोषण और उसकी स्वतंत्रता की समस्या का ह्रदय- द्रावक
चित्र प्रस्तुत किया है .
रूप ही नारी की शक्ति और उसकी सीमा भी है. विधाता ने उसे शक्ति के रूप में जो
रूप का संभार दिया है वाही संभार उसकी सबसे बड़ी दुर्बलता का भी द्दोतक है. द्वापर
में कृष्णा के साथ जो कुछ भी हुआ; उसके मूल में उसकी सुंदरता ही तो थी ? नारी जबतक
भावुकता एवं भावना के अश्व पर सवार रहती है, उसे अपनी सीमाओं का ज्ञान नहीं
रहता पर ज्योंही उसकी बौद्धिकता सजग होती
है वह आत्म-विश्लेषण करती है. नारी का यह आत्म-विश्लेषण ‘अनुत्तरे’ में
अपनी पराकाष्ठा को पहुंची तो है, पर कोई समाधान निकलता नहीं जान पड़ता. हाँ, इतना
अवश्य है कि वह सहृदय पाठकों को करुणा में डुबा जाती है और समाज पुरुषवर्ग से
अपेक्षा करने कगता है कि वह नारी के सन्दर्भ में बर्बर और अमर्यादित न हो. यह
स्थिति तबतक बनी रहेगी जबतक कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक न होकर अलग-अलग
सामाजिक इकाई के रूप में बने रहेंगे. समाज को इस स्थिति तक ले जाने के लिए एक लंबी
लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है, जो आर्थिक विषमता और पाशविक प्रवित्तियों के तिरस्कार
के धरातल पर लड़ी जायेगी.
“ यह रूप !”
स्वयं ही कह रहा
अपना इतिहास.
न होता यह
पुष्प-धन्वा का मोहक पञ्च-शर !
होता फिर मुझे भला
किसका भय या डर !
रूप के कारण नारी समाज की राजस और पाशविक वृत्तियों का शिकार तो बनी है,
धार्मिक प्रवृत्तियों ने भी उसका कम अपकार नहीं किया है . लुभावने नारों और
बड़े-बड़े विशेषणों ने उसे छाला है अथवा यूं कहा जाय कि उसके ह्रदय पर अधिकार करने
के लिए ही पुरुष द्वारा समय-समय पर नारों और विशेषणों की सृष्टि की गयी. निश्चित
रूप से मरणधर्मी परम्पराओं पर सटीक चोट ‘अनुत्तरे’ में की गयी है. वैदिक
काल की नारी, रामराज्य की नारी एवं महाभारत की नारी पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए
नारी की गरिमापूर्ण कल्पना तथा उसकी सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक मूल मानदंडों से
क्रमशः ही होती नारी की छवि का बड़ा ही विश्वसनीय निरूपण इस कृति में हुआ है. अपनी
अभिव्यक्ति की प्रभावोत्पादकता के कारण ‘अनुत्तरे’ काव्य के नारी चरित्र
सहृदय पाठकों को आंदोलित किये बिना नहीं रह सकते. अतीत के आलोक में वर्तमान को
प्रकाशित करना कवयित्री का प्रमुख उद्देश्य जान पड़ता है, क्योंकि उसके निहित
संकेतों द्वारा सहज ही इसका अनुभव हो जाता है- कि नारी स्वातंत्र्य का जो स्वरूप
आज के सन्दर्भ में चित्रित हो रहा है; वह भारतीय संस्कृति के साथ किस सीमा तक मेल
खाता है- यह एक विचारणीय समस्या है. ‘अनुत्तरे’ के प्रथम सर्ग में कृष्णा
का काल्पनिक रूप साकार करते हुए नारी की रमणीयता की प्रशंसा तो कवयित्री ने की
है,पर द्वितीय एवं तृतीय सर्ग में उसके प्रति किये गए सामाजिक अन्याय एवं उत्पीडन
की जो कथा उसने कही है, उससे लगता है कि कव्यत्री का बौद्धिक आक्रोश पुरुष-शासित
समाज के प्रति इतना घनीभूत हो गया है कि वह सर्वत्र इस काव्य में झलक मार जाता है.
‘अनुत्तरे’ का यह चित्र :-
नारी !
क्या है नारी ?
एक प्रस्तर प्रतिमा.
एक सपाट शिला.
जैसा चाहा वैसी छवि
उकेर दिया.
अपने ही मनमाने
रंगों से,
जैसा तैसा भर कर,
किसी नाम से पुकार
दिया.
कभी इसे उर्मिला
बनाया,
कभी सीता या
सावित्री,
कभी शिव-आज्ञा से
पीड़ित,
सती या पार्वती.
कभी शाप-ग्रस्ता
गौतमी पाषाणी.
या शरण मांगती,
नहुष-भय भीता शची
इन्द्रानी.
नारी-दासता का कितना
गर्हित है यह रूप.
सती की संज्ञा देकर
उसे,
जलती चिता में बलात्
चढ़ाकर,
जीवित ही भस्म कर
डाला.
क्या भारतीय नारी की व्यथा-कथा नहीं कहता ? धरती की ही भांति नारी वीर-भोग्या
रही है. वह एक प्रकार से शक्तिशाली पुरुष की शिकार थी जिसे दूसरा शिकारी छू भी
नहीं सकता था और यदि शिकारी ने उसे छूने दिया तो उसे पुंसत्वहीन की ही संज्ञा दी
जाती रही है, भले ही वह महाभारत का विजेता पार्थ ही क्यों न रहा हो. कृष्णा मात्र
पार्थ की थी पर अन्य चार भाईयों की भी भोग्या बनी. महाभारत के इस सन्दर्भ को उठाकर
कवयित्री ने नारी-परक अन्य सामाजिक संभावनाओं को भी नकार दिया है. वासना के धरातल
पर पुरुष नितांत वैयक्तिक होता है, वह समझौता करना नहीं जानता. इस स्थिति से बचने
के लिए नारी को समाज के स्तर पर लाने की बात सोची जा सकती थी, पर समाज तो शक्ति
पाकर और भी अत्याचारी हो जाता; जैसा कि कृष्णा के साथ हुआ. इस प्रकार कुल मिलाकर
समाधान ढूढ़ंने के स्थान पर कवयित्री नारी शोषण की परम्परा के आलोक में पुरुष की
दुर्बलताओं और उसके नारी-विषयक अत्याचारों को सामने कर उसे बिलकुल नंगा कर देना
चाहती है. अतः इस सन्दर्भ को चुनौती के रूप में ही लेना चाहिए और आगे आने वाली
प्रबुद्ध पीढ़ी के सामने यह एक प्रश्न है जिसका उसे उत्तर देना है. स्त्री और पुरुष
को किसी एक ऐसे सात्विक बिंदु पर मिलना होगा जहाँ पर शोषण की प्रक्रिया को समाप्त
किया जा सकेगा . लगता है विवाह-व्यवस्था की छाया में पलने वाले दुर्गुणों ने नारी
को कहीं का नहीं रखा है. नारी को म्मार्यादित करने के लिए इस व्यवस्था का निर्माण
हुआ था, पर आगे चलकर इसने शोषण और कुत्सा को ही जन्म दिया है. नारियाँ भी पुरुषों
का शोषण कर्रती हैं, इतिहास इसका गवाह है पर कवयित्री का ध्यान इस ओर नहीं गया और
वह ‘अनुत्तरे’ में एकपक्षीय आक्रमण करती जान पड़ती हैं. इस महत्वपूर्ण काव्य
में नारी-स्वातंत्र्य और शोषण पर विचार करते समय इस दृष्टि से भी विचार कर लेने की
आवश्यकता थी, इसे स्वीकार कर लेने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती थी कि
पुरुषों की अपेक्षा नारियों का पलड़ा भारी है और वे अपनी हीनावस्था के कारण समाज की
करुणा को अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित करती हैं. ‘अनुत्तरे’ के इन हृदयग्राही
स्थलों पर नारी विद्रोह को हवा दे पाने में या तो कवयित्री को सफलता नहीं मिली है,
अथवा उसने इसकी आवश्यकता का अनुभव नहीं किया. वह हृदयद्रावक चित्रों को प्रस्तुत
कर प्रबुद्ध नारियों को सावधान करती हुई पुरुषों को आत्मविश्लेषण के लिए आमंत्रित करती जान पड़ती हैं :-
सीमान्त पर जटित,
यह रक्त-चन्दन या
सिन्दूर.
दमन के क्रूर
असिधारों से ,
कर मांग पर गहरी
चोट,
दिया उसे सिन्दूर का
ओट,
कभी दर्प से उठ न
सके ऊंचा भाल.
किया ‘अहम’ चूर्ण
लोहत लाल.
यह सिन्दूर !
नामांकित एक मुहर
है.
इस प्रकार पुरुष-पालित सामाजिक व्यवस्था के प्रति घोर असोंतोश व्यक्त करते हुए
उसके द्वारा निर्मित मर्यादायों को स्वार्थ-प्रेरित घोषित कर ‘अनुत्तरे’ में
कवयित्री ने प्रतिवाद के लिए भी कोई स्थान नहीं छोड़ा है, क्योंकि यह एक ऐसा सत्य
है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता .
नारी अपनी कोमलता के कारण ही प्रतिद्वंद्विता में हार जाती है और पुरुष का
वर्चस्व उसे स्वीकार कर लेना पड़ता है. पुरुष की हेकड़ी उस समय भूल जाती है जब वह
अपने से बीस पड़ने वाले लोगों से घिर जाता है, वह दुर्बलों के लिए ही पुरुष है और
सबल पुरुषों के सामने भींगी बिल्ली बनते उसे देर नहीं लगती. दुःशासन के सामने
पांडवों की ऐसी ही स्थिति दिखलाई पड़ती है:
पुरुष का पौरुष भी,
कुछ अर्थों में ही
होता है.
एक ओर दीन अबला पर,
अपना पौरुष
नीच दुःशासन
कर रहा था
प्रदर्शित.
दूसरी ओर,
अपने स्वजन, ये
पांडव.
कर रहे थे प्रकट निज
पौरुष,
रह कर मौन.
यह पुरुष !
अपना समस्त पौरुष !
अपना शौर्य !
निर्बल पर ही निचोड़
देता है ?
नारी का पुरुष ने न केवल वासना-तृप्ति के लिए ही शोषण किया है, बल्कि पुरुष ने
अपने वृहतर स्वार्थों की सिद्धि में भी उसको हथियार बनाया है. आज का महानगरीय
भौतिकवादी जीवन साक्षी है कि किस प्रकार वस्तुरूप में उपहारस्वरूप नारी का उपयोग
कर लोग अपने यश, अर्थ और राजनीतिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में लगे हुए हैं. इस
वर्तमान सत्य को पुराण और इतिहास से जोड़कर यह सिद्ध कर दीया गया है कि नारी की स्थिति में उत्तरोत्तर ह्रास ही
हो रहा है :
“ नारी !
मात्र एक अस्त्र है,
पुरुष की,
राजनीति, कूटनीति,
घातों-प्रतिघातों की !
यह !
पत्नी बनती है.
प्रेयसी बनती है. विषकन्या बनती है.
जब जैसी होती है
मांग समय की,
वह,
उसके अनुरूप सहज ही ढलती
है. “
युद्धस्थल पर मरणासन्न कर्ण के सम्मुख कुंती को खड़ाकर कवयित्री ने नारी की
मातृत्व-भावना पर ही प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया है. इस प्रसंग के साथ ही
पूर्वार्द्ध की कथा मोड़ ले लेती है और इस मोड़ के साथ ही सहृदय पाठक के मन में
नए-नए विचार उठने लगते हैं. कुंती का कर्ण के साथ किया गया व्यवहार नारी-जाती के
लिए कलंक है पर उसपर भी मुलम्मा चढाने का प्रयत्न ‘अनुत्तरे’ में इस प्रकार
किया गया है कि पुरुष-शासित समाज के कारण ही नारी निरुपाय है और कुंती क्रोध के
स्थान पर करुणा की ही अधिक सृष्टि करती है.
कुंती-कर्ण सन्दर्भ के पूर्व नारी-स्वातंत्र्य और शोषण की समस्यायों को लेकर
जो चित्र प्रस्तुत किये गए हैं, वे भी अपनी निज मौलिकता के कारण अपनी निजी पहचान
बनाते हैं, इसमें संदेह नहीं. ऐतहासिक और पौराणिक पात्रों को आधुनिक सन्दर्भों में
प्रस्तुत करने की ओर इस बीच कवयित्री का
ध्यान गया है और रामायण तथा महाभारत के पुरुष-पात्रों को वर्तमान चिंतन के
कटघरे में खड़ा होना पड़ा पर नारी पात्रों को लेकर कोई ऐसी उल्लेखनीय कृति सामने
नहीं आ पायी है जिसे ‘अनुत्तरे’ के समकक्ष रखा जा सके. इस प्रकार का सफल
प्रयास स्व० जयशंकर प्रसाद ने अपनी लंबी कविता “प्रलय की छाया” में किया था और उसे छायावाद-युग की एक अनोखी
रचना के रूप में लोगों ने सराहा भी था. पर वह महज एक लंबी कविता थी और उसपर
कल्पना का रंग इतना गाढ़ा था कि उसे एक विशेष बौद्धिक-स्तर के लोग ही समझ सकते थे.
‘अनुत्तरे’ के साथ ऐसी कोई बात नहीं है . प्रख्यात पौराणिक नारी एवं
पुरुष-पात्रों को आधुनिक समस्यायों के समानांतर रखते हुए ‘अनुत्तरे’ में जो
विवेचन प्रस्तुत हुआ है उसमें प्रबंध-काव्य की कथात्मकता का रस भी है और वर्तमान
सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्यायों के समाधान की ओर संकेत भी है.
प्रायः ऐसा देखा जाता है कि रचनाकार जब सृजन की समाधि में बैठता है तो उसके
चरित्र उसके नियंत्रण को नकार देते हैं और अपनी पारंपरिक शक्ति तथा लोकप्रियता के
कारण स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास करने लग जाते हैं. ऐसी स्थिति में रचनाकार के
संकल्पित उद्देश्य में भी अंतर आ ही जाता है और ‘अनुत्तरे’ के साथ भी ऐसा ही हुआ है. रचना के शीर्षक और उसके
प्रतिपादन के तेवर से स्पष्ट है कि कवयित्री नारी-शोषण के विरुद्ध और उसकी
स्वतंत्रता की पक्षधर है. ‘अनुत्तरे’ का पूर्वार्द्ध तो कवयित्री के
उद्देश्यों की पूर्ती में सहायक है, पर उत्तरार्द्ध में कुंती और कर्ण के अवतरण से
स्थिति में परिवर्तन आ जाता है. यदि शोषित नारियाँ पुरुषों से उत्तर की अपेक्षा
रखती हैं , तो कर्ण भी नारियों के मातृत्व को चुनौती देता है और उसके प्रश्नों का
उत्तर मिलना आज भी शेष है. दूषित सामाजिक-व्यवस्था और नारी-दुर्बलता पर जितनी
करारी चोट कर्ण कर्ता है, उतनी करारी चोट ‘अनुत्तरे’ का कोई भी अन्य पात्र नहीं कर पाया है. वीरान
युद्धस्थल में मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए कुंती को सामने पाकर कर्ण का यह कहना
कि – “ सदा ही छला गया हूँ माँ !” एक अर्थ रखता है. “ चोट कहाँ खा रही है माँ की
ममता !” तथा “ माँ की ममता में रंचक भी भेद नहीं !” जैसे कुंती के वाक्य क्या कर्ण
के इस प्रश्न का उत्तर दे आते हैं कि – “ कर्त्तव्य माँ का भी क्या पक्षपातपूर्ण
होता है ?” यदि कुंती कर्ण को अपने उत्तर से संतुष्ट कर पाती तो जीवन के अंतिम दौर
में वह नास्तिकों का सा प्रलाप नहीं कर्ता. कर्ण को जितना छाला गया है उसे देखते
हुए उसका जो आक्रोश सामाजिक आदर्शों अथवा राम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों पर है
उससे उसके कथन के प्रति आस्था उत्पन्न होती है. उत्पन्न होती यह आस्था समूची
भारतीय- पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था एवं धार्मिक-चेतना पर प्रश्नचिह्न लगाती है जो
भयावह है. नवीन व्यवस्था के अभाव में प्राचीनता का विध्वंस कभी भी श्रेयस्कर नहीं
होता.
कुंती के आग्रह पर अंतिम क्षणों में कर्ण उस पार्थसारथी कृष्ण को स्मरण करने
को तैयार नहीं, जिसके कारण ही वह युद्धस्थल में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहा है.
उस पर्यादा पुरुषोत्तम ‘ दयानिधान रघुवर
श्री राम’ का भी स्मरण वह नहीं करेगा क्योंकि उसने जनकसुता के साथ जो व्यवहार किया
था उससे न तो उसने पद की गरिमा की ही रक्षा की और न तो एक आदर्श राजा की. सारी
धर्म-व्यवस्था की निःस्सारत प्रकट करनेवाला
कर्ण का यह उद्घोष :
“ अतः मत लो !
इन छलियों का नाम !
महाशून्य से आया हूँ ,
महाशून्य में जाऊँगा .
यदि होगी कोई शक्ति वहाँ अधिष्ठित ,
उसे ही शीश नवाऊंगा . “
इससे तो स्पष्ट होता है कि ‘अनुत्तरे’ में न केवल नारी-शोषण और नारे-स्वातंत्र्य की ही समस्या है, बल्कि इसमें समूची
परम्परा और उसकी सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था को ही ललकारा गया है. यश दूसरी बात
है कि सबके मूल में कवयित्री ने नारी को ही प्रतिष्ठित किया है. ‘अनुत्तरे’ का उत्तरार्द्ध इतना प्रभावोत्पादक एवं
विचारोत्तेजक है कि उसकी एक अलग पहचान बन जाती है. ऐसा लगता है कि पूर्वार्द्ध और
उत्तरार्द्ध की जमीन पर दो अलग-अलग स्वतन्त्र रचनायों का प्रणयन की आवश्यकता थी. ‘अनुत्तरे’ का कर्ण-प्रसंग शैली
की दृष्टि से दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ और चरित्र की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’
की याद दिलाता है, पर जहां तक प्रस्तुतीकरण का प्रश्न है, ‘अनुत्तरे’ ने ‘रश्मिरथी’
को काफी पीछे छोड़ दिया है.
सम्पूर्ण रचना को समाप्त कर लेने के पश्चात बहुत कुछ भूल जाता है और जो स्मृति
शेष रह जाती है उसे ही रचना का प्रतिपाद्द अथवा प्रणत्व के रूप में स्वीकार करना
पड़ता है. ‘अनुत्तरे’ का सबकुछ भूल सकता है, पर उसका कुंती-कर्ण सन्दर्भ भुलाया नहीं जा सकता, जिससे
स्पष्ट है कि नारीपरक काव्य होते हुए भी ‘अनुत्तरे’ का केन्द्रीय चरित्र कर्ण बन जाता है. नारीपरक अथवा
भावपरक शीर्षकों को लेकर प्रबंध-काव्य लिखने की परम्परा पुरानी है,पर छायावाद युग
की ‘ कामायनी’ जैसी रचनायों ने न केवल उसे नया आयाम प्रदान किया, बल्कि उन्होंने
महाकाव्य की परिभाषा में संशोधन के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया. आकार-प्रकार और
विषय को महत्व न देकर युग-सत्य की अभिव्यक्ति करनेवाले काव्य को आधुनिक आचार्यों
ने महाकाव्य की संज्ञा दी है. इस दृष्टि
से ‘अनुत्तरे’ एक महाकाव्य है.
परम्परित सिद्धांतों के आलोक में ‘महाकाव्य’ को देखने वाले आचार्य एवं पाठक यदि
इसे महाकाव्य मानने में संकोच करते हैं , तो ‘महान काव्य’ के रूप में इसे स्वीकार
करने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती.
आधुनिक युग की सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना के आलोक में नारी
स्वातंत्र्य और शोषण की ज्वलंत समस्यायों को आत्मसात कर निहित संकेतों द्वारा ‘अनुत्तरे’ ने जो सशक्त एवं
प्रासंगिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है उससे इसका ऐतहासिक महत्व है. भाषा, भाव,
अभिव्यक्ति एवं युगबोध सभी दृष्टियों से ‘अनुत्तरे’ एक अत्यंत पूर्ण एवं सफल कृति है और मैं इस कृति का
अभिनन्दन करता हूँ.
प्रो० त्रिभुवन सिंह
आचार्य एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग,
काशी हिंदू विश्वविद्दालय, वाराणसी-५.
वाराणसी
१५ अगस्त १९८८
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