बाहर उपवन में,
बादल से घिरे गगन के नीचे
ले आई वह मुझे एक शिला के समीप.
आवेगों से उच्छ्वसित था, कम्पित उसका गात.
बोली वह लेकर गहरी उसांस.
क्या है नारी जीवन !
एक शाश्वत करुण अकथ अथक कहानी है.
अपने जाने किस विवश पीड़ा के क्षणों में,
निज उबलते जलते आंसुओं से,
निर्मित कर उसे,
किया सृष्टि ने, बड़ी ही नादानी है.
नील नभ में, जितने ये,
अश्रुपूरित डब-डब
करते हैं नखत,
भरे हुए नारी के अंतर में,
उतने ही गहरे हैं क्षत.
कहीं नहीं, किसी पल ने उसके,
पाया है किंचित भी विश्राम.
हर सांस, छली गयी उसकी
हर क्षण ह्रदय रहा अशांत.
जाने कबसे घूम रही मैं,
गिरी-कांतर,
वन, उपवन, सैकत सागर,
इसी प्रकार उद्भ्रांत.
कहाँ नहीं गयी.
हो, देश-विदेश, कोई सभ्यता,
समाज, जाति.
पाया नहीं कहीं मैंने.
नारी-जनजीवन,
स्वस्थ सुरक्षित.
कोई भी हो परिवेश.
कोई भी हो भाषा.
एक ही स्वर सब में बजता है,
लेकर घन भूत दुराशा.
घिरी वह,
अपनी ही गहन विवशता में
मग्न छलकते आंसू मौन व्यथा में.
हर सभ्यता की मिथ्या चकाचौंध में
कौंध रही है उसकी पीड़ा,
उसके आंसू की.
निर्मूल कथन है यह.
कि, प्राप्त उन्हें उन्मुक्ति,
आर्थिक परतंत्रता और नारी दासता से.
समानाधिकार से दूर,
साधारण अधिकारों से भी है वंचित.
पूरब हो या पश्चिम.
सर्वत्र पुरुष ही है महामहिम.
इतना ही कहने मैं आई हूँ.
देख मुझे.
अब भी नारी ऐसी ही है.
उसकी ज्वलंत समस्याएं
अब भी पूर्ववत, वैसी हे हैं.
तू नारी है.
तू ही मुझे समझेगी.
पुरुष.
व्यथा नहीं जानेगा.
मेरा पक्ष कदापि ग्रहण नहीं करेगा.
क्रौंच-वध
की व्याकुल विरहिणी कुररी की,
मर्मान्तक पीड़ा का रस, सानंदित वह
शनैः-शनैः
लेगा. अहेरी
!
दया क्या जाने.
उसके बिखरे दाने, चुगने के नहीं,
प्राण लेने के हैं.
मिथ्या संवेदन प्रदर्शन कर,
मेरे ही तर्कों से, निज तर्क सबल बनाएगा.
इसी से, आई हूँ तेरे समीप,
बोल.
क्यों हुई मैं पांडव-पत्नी
?
क्यों नहीं वह मत्स्य-नयन-भेदी,
वरण-पुरुष
हुआ मेरा.
उसने, तेल में मत्स्य की छाया देखी,
मैंने, अपने विचलित, आंदोलित मानस-सर की,
लहराती लघु-लोल
लहरियों में,प्रतिबिंबित,
उसकी अगणित मोहक माया देखी.
मत्स्य-नयन-भेदी, उसका शर.
तत्क्षण ह्रदय बेध गया मेरा,
घायल हिरनी सी मैं तड़पी,
पुष्प-धन्वा
की रति, वही बनी.
पितृ-गृह
ने, गुरुजनों ने, अभ्यागत स्वजनों ने,
तथा, उपस्थित जन-संकुलित भरी सभा ने,
वहीँ, मन्त्र-पूत ऋचाओं से अभिषिक्त,
उसी क्षण मुझको,
एकमात्र अर्जुन की थाती, पत्नी माना.
मैंने भी, रोम-रोम से पुलकित,
तन-मन-जीवन से सम्पूर्ण समर्पित
निज को उसकी ही जीवन संगिनी
और उसे अपना जीवन धन, स्वामी माना.
सारे पथ भर, उसका अनुसरण करती,
उस सिंह-पुरुष
के चौड़े स्कंध,
ग्रीवा पर लहराते केशरी के अलक-जाल,
प्रशस्त उज्ज्वल उन्नत भव्य भाल,
वक्ष पर सुशोभित,
रक्षा कवच ढाल
पृष्ठ पर अटके तुरीन-कमान,
मुग्ध देखती आई.
नर-नारायण
की मधुर भूमिका में,
वह,
प्राणोपम नूर था मेरा.
पुलकित प्राणों के मधु वर्षण ने,
अलसित, सुरभित स्वांस-स्वांस ने,
इस नए अतिथि को,
ह्रदय वेदिका पर
अचल, अडिग, अधिष्ठित पाया.
मदिर आँखों ने देखा.
सुहाग-कुमकुम
बिखेरता,
आलोकित, पद्म रागी सौभाग्य-स्वर्ण-सवेरा.
मैंने भी, उसके अवगाहन में,
अंजलि भर-भर
दोनों हाथों से,
आशाओं अभिलाषाओं के ,
सद्दः कुसुमित, विकसित हरसिंगार बिखेरा.
उसी क्षण, ऐसा विदित हुआ,
मैं.
निज साकार प्राण की छाया हूँ.
वह.
मेरा आदि पुरुष
मैं, उसकी शाश्वत माया हूँ.
किन्तु. अदृष्ट,
एक क्रूर विडम्बना है.
पूजन का सज्जित थाल,
पथ में ही, ठोकर खाकर बिखर गया.
समय के रथ का अनवरत चल रहा वज्र चक्र,
समस्त नैवेद्यों को,
निर्ममता से कुचलता चला गया.
अभिलाषाओं की वह जगमग दीवाली.
उल्लासों का वह आनंद-महोत्सव,
सहसा आकर, किसी शून्य पर ठहर गया.
चक्कर खाता वह
घूर्णित घन अन्धकार के कुहासों में,
अर्ध निमीलित आँखों ने,
देखा, अप्रत्याशित ह्रदय विदारक भविष्य.
नहीं ज्ञात था मुझे.
मैं थी.
पूजन का वर्जित निषिद्ध फूल.
नारी-गरिमा
का दारुण दुखद मूल.
टीस रहा है अभी तक ह्रदय में,
उस क्षण का विधा हुआ, वह,
अजर अमर तीक्ष्ण शूल.
वे आशाओं के ओस सिक्त डह-डह हरसिंगार.
गिरते तन पर बन कर जलते अंगार.
क्या सोचा था क्या पाया मैंने.
जाने कितने जन्मों का, पीड़ित पाप.
असमय में आया, यों बदला लेने.
तू ही कह.
क्या मैं जड़ वस्तु थी ?
या, मणियों में थी मेरी गणना.
मैं क्या कोई खाद्य वस्तु थी,
जो टुकड़ों में बंट जाती.
मैं !
अंगराग का अनुलेपन थी,
जो जिस-तिस
के अंग लग जाती.
”माँ
की आज्ञा.”
क्या थी आज्ञा ?
“ जो
वस्तु लाये हो पाँचों बाँट लो.”
मैं वस्तु नहीं थी.
मैं जड़ पदार्थ नहीं थी.
मैं !
भावनाओं, संस्कारों,संवेदनाओं से
पूरित,
एक सुसंस्कृत अभिजात्य कुल की,
विदुषी नारी थी.
स्वयम्बर के शर्तों के विजेता पार्थ को,
मात्र समर्पित थी.
क्यों नहीं, पार्थ ने ही
इस अनुचित आज्ञा का विरोध किया.
क्यों नहीं कहा- पत्नी
बटने की वस्तु नहीं.
यदि उपहार ही मैं थी
तो मात्र पार्थ का पुरस्कार थी.
किसी अन्य का, मुझपर था रंचक अधिकार नहीं.
क्यों नहीं पार्थ अड़ा रहा.
क्यों नहीं मेरे पक्ष में खड़ा रहा.
कहा नहीं था इसी पार्थ ने कृष्ण से-
“ न
कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानी च.
एतन्न हन्तुमिच्छामिघ्नतोऽपि मधुसूदन.
अपि त्रैलोक्य राजसी हेतोः किं नु महीकृते.”
व्यर्थ था जय-पराजय.
नगण्य था वैभव त्रैलोक्य का भी,
यदि वह भी,
स्वजनों के ही रक्त से रंजित हो.
ऐसे विचारों वाले व्यक्ति को,
कैसे था मान्य ?
वह करे नारी के नारीत्व का अपमान.
इस प्रकार जघन्य नृशंस हनन.
मौन रहने पर पार्थ के,
क्यों नहीं इस अधर्म का
सत्यव्रती युधिष्ठिर ने किया विरोध.
इस आज्ञा के पालन अथवा अनुमोदन में,
क्या इसके परोक्ष में,
यह, पुरुष-अन्याय की निर्लज्ज पाशविकता नहीं थी.
इसमें, तर्क, विवेक, औचित्य,
नैतिकता,
अथवा, किंचित भी मानवता थी ?
तू ही कह .
क्या एक पर केंद्रित भावनाएं
क्या कभी विभाजित हो सकती हैं ?
कोई तुला बनी है ऐसी, जो,
मन को सम-भागों
में कर दे.
या, एक गले की जयमाला को,
एक बराबर, कई टुकड़ों में कर दे.
प्रकृति के,
अटल निश्चित नियमों के विपरीत,
क्या कोई अन्य विधान हुआ है ?
मन के मापक का अबतक
कोई अन्य समाधान हुआ है.
मेरा आराध्य !
रागी मानस के बहुरंगी क्षितिज पर,
पूर्ण चन्द्र सा उदित हुआ था.
प्यासे चकोर सा, यह विमुग्ध विभोर मन .
उस आप्लावित सौंदर्य-सुधा
में आकंठ डूब,
उसकी मादकता से विद्ध हुआ था.
यह, दुग्ध-धवल सी खिली चाँदनी .
भले ही, हिमाच्छादित शैल शिखर, गिरी-कांतर, अथवा, गहन
गह्वर,
अबाध सागर की लहरों पर बिखरी हो.
या, कांतर कटंकित वन के काँटों से
बिंधकर,
खंड-खंड
में ,
छिन्न-भिन्न
होकर
उतरी हो.
वह. सर्वत्र
हर रूपों में बिखर कर भी, अविच्छिन्न शाश्वत एक है.
मेरा, यह अधीर आकुल मन.
सहस्र टुकड़ों में होकर भी,
मनके सा एक सूत्र में गुथा रहा.
जो था मेरा साकार प्राण.
निराधार, निरालम्ब,
उसके ही चरणों पर पड़ा रहा.
वह ! मेरे
अविरल बह रहे अश्रुओं से भी,
किंचित द्रवित नहीं हुआ.
मेरी निरीहता देख कर भी ,
वह, किंचित विचलित नहीं हुआ.
वह सम्मोहक.
मेरी प्राणों की वंशी पर,
सारभूती ब्रह्म नाद सा उतरा था.
प्रणय-प्रलय-सिंधु में एकाकी,
आकंठ डूबती मैंने देखा.
वट-पत्रशायी
विष्णु सा,
मेरा पार्थ वहाँ अकेला था.
किन्तु.
पुरुष.
होती है उसमें कठोरता.
अवसरवादिता.
सर्वस्व निछावर था जिसपर.
था इतना गहन अटल विश्वास
जिसकी अनुगामिनी होकर मैंने,
पितृ गृह से यहाँ किया प्रवास.
उसकी इस मूक उपेक्षा .
अपनी निरीह विवशता पर.
मेरा, उर्जस्वित गर्वोन्नत अहम्
वहीँ ध्वस्त होकर,
मणिःहीन सर्प सा दीन हुआ.
अरमानों का सज्जित इठलाता जलयान.
नैराश्य-ज्वाल
में जलता,
आपत्ति भंवर में फँसकर चक्कर खाता,
तत्क्षण वहीँ जलमग्न विलीन हुआ.
पांडव-द्वार
पर आते ही,
मेरा पथ यों अवरुद्ध हुआ.
एकाकी मन ! विह्वल
पागल सा रोया,
फिर वह,
समस्त मान्यताओं के विरुद्ध हुआ.
मेरा निराश हठी मन !
इतना होने पर भी,
निष्कम्प पूजन-दीप
सा,
उसके ही चरणों तले जलता रहा.
वह पाषाण ! पिघल
नहीं पाया.
पर यह मन.
उड़ते घन-सारों
सा,
उसके चरणों को घेर, वहीँ पड़ा रहा .
अर्जुन को छोड़ किसी अन्य को,
यह पीड़ित मन सहन नहीं कर पाया.
मन के विपरीत, इन अत्याचारों ने,
मुझे विद्रोही सतत बनाया.
ली गहरी सांस कृष्णा ने,
पुनः वह बोली-
प्रश्न हुआ था मुझसे !
“ पाँचों
के प्रति समान धर्म नहीं निभाकर,
मैंने घोर अधर्म कमाया.”
इस विडंबित धर्म की
इस गहन विभीषिका पर .
मेरा आहत मन तड़पा अकुलाया.
यह धर्म ! अधर्म
! यह नीति,
अनीति.
इसकी आधार-शिला
क्या है?
क्या है इसकी परिभाषा ?
यह पुरुष .
अपनी सुविधाओं को
प्रथम प्राथमिकता देकर,
धर्म, अधर्म, नीति, अनीति,
बदलता है सबकी परिभाषा.
आत्मकेंद्रित स्वार्थपरक नींव पर
अनीति अधर्म ही पनपता है.
इनकी गर्हित पाशविकता ने,
क्यों मुझे इस प्रकार अपना अहेर बनाया.
धर्म की इस निर्मूल अवधारणा ने
मुझे क्रुद्ध सर्पिणी सा क्षुब्ध बनाया.
धर्म अथवा नियम नैतिकता.
सत्यम शिवम पर आधारित होती है.
उदार चेता.
विशाल संवेदनपूर्ण दृष्टिकोण वाले
सुव्यवस्थित विधानों में,
सब वर्ग की सुविधाएँ,
एक सामान घोषित होती है.
किन्तु !
विकृत समाज की इस गलित व्यवस्था को,
झेल लेना, मात्र थी, मेरी दीन विवशता.
मेरे इस, प्रलय हुंकृत ज्वार संकुलित मानस में,
केवल, पार्थ अकेला अडिग खड़ा था.
यह हठी मन.
उसको ही आबद्ध कर अड़ा रहा.
बार-बार
एक ही प्रश्न.
एक ही उत्तर.
मुझे पागल विक्षिप्त बनाते थे.
मात्र पार्थ को छोड़ नहीं किसी से,
मेरे सम्बन्ध बन पाते थे.
बार-बार
मन पूछ रहा था,
कहाँ गए ?
वे बड़े-बड़े
विशाल वृहद नैतिक प्रबंध.
कहाँ गए वे धर्म-ग्रन्थ.
किस शास्त्र में किसने लिखा है ?
नारी का हो ऐसा निर्लज्ज घृणित मूल्यांकन.
सती या सीता की आकांक्षा
कैसे कोई कर सकता है ?
किसी शिला को चूर्ण-चूर्ण
कर,
क्या कोई, प्रतिमा साबित गढ़ सकता है?
क्या है परिभाषा सती की.
“मन-वचन-कर्म” से एकनिष्ठ होना.
माद्री ! नकुल-सहदेव की जननी ,
अश्विनी कुमार पिता थे जिनके,
मृत पांडू के साथ फिर क्यों जली चिता पर.
चिता पर मात्र जल जाना ही,क्या सतीत्व है ?
यह व्याख्या धर्म की भी नहीं
कुटिल समाज की यह संरचना है.
नारी कितनी ही सात्विक हो.
बलात् विवश कर उसे,
मत्स्य-गंधा
से योजन-गंधा.
यही पुरुष बनाता है.
अपवाद के घने कुहासों में उसे घेर.
फिर उसके ही भाग्य पर उसे निराधार छोड़,
उसे त्याग कर जाता है.
फिर भी वह निर्दोष है.
दोषी सबल नहीं, निर्बल ही होता है.
इस एक धर्म के घृणित उद्घोष ने अंतर में,
प्रश्नों के अगणित शल्य एक साथ चुभाया .”
इनके संग कैसा है मेरा व्यवहार.
“ आह ! इन मर्मान्तक प्रश्नों का,
क्या था आधार.
मैं एकाकिनी सी उस हिरनी सी,
जो अपने झुण्ड से बिछड जाती है .
अकेली, विवश होकर वह,
वधिक के विषैले वाणों से,
बिंध-बिंध
कर तड़प-तड़प
कर मर जाती है.
नारी भी कर सकती है,
नारी से ऐसा परिहास.
क्यों नहीं फटी धरती.
क्यों नहीं गिरा जलता आकाश.
क्यों नहीं ले गया इन्हें समेटकर,
जल-निधि
का क्रोधित अट्टहास !
रोते मन ! जलती
आँखों से ,
देखा मैंने उसकी ओर.
गरिमा के उच्च मंच पर गर्वोन्नत अधिष्ठित,
कर रही वमन विष घोर.
फिर भी.
सारा विष आत्मसात कर,
सस्मित बोली मैं-
“देवी ! अमिय, हलाहल, एक
सहोदर हैं,
किन्तु प्रारब्ध, प्रकृति की है,
उनमें, गहन विषमता.
एक निरंतर अपने विष की ज्वाला से जलता है,
दूसरा, अपनी मधुरता,
शीतलता संजीवनी से मुग्ध मदमाता है.
एक के सुख !
दूसरे के दुःख, से दोनों अपरिचित हैं.
यद्यपि दोनों ही अपने चरम में
अवस्थित, बहुचर्चित हैं.
इन दोनों में कही नहीं समता है.
कैसे समझा दूँ. कैसे
कह दूँ.
जहां स्थित हूँ मैं.
इस पर, नहीं किसी की ममता है.
क्या बीत रहा है, क्या है बीता,
कैसे कोई समझेगा ?
निश्चय ही देखा होगा,
सज्जित, पूजित मृण-प्रतिमाओं का,
समारोह के संग,
बहते जल प्रवाह में विसर्जन.
कहाँ गए वह रूप-रंग
?
कहाँ गए वे सौंदर्य-प्रसाधन
?
फिर किसने किया
इसका किंचित भी चिंतन ?
डूबा ! पुनः
नहीं लौटता है.
वह, घुल-घुल कर ही मिटता है.
व्यर्थ समाज मिथ्या संवेदना प्रगट कर,
झूठे अश्रु विमोचन करता है.
इस प्रकार निज कुलिश कठोरता का,
नया रूप प्रदर्शन करता है.
यही नहीं,
किसी साम्राज्य की मृत सम्राज्ञी को,
सज्जित कर, एक उचित स्थान दे देते हैं.
मृत्यु और जीवन के मध्य,
एक फासले का, फैसला ले लेते हैं.
मृत्यु को सज्जित कर,
और भयानक कर देते हैं.
किन्तु ! उस
शव का क्या ?
चेतना रहित, निष्प्राण है वह.
आदि, व्याधि, हर बाधाओं के,
पार है वह.
उसे, पूजन कर चन्दन से चर्चित कर दो.
या चरणों की ठोकर से द्वार के बाहर ,
घनी उपेक्षा और घृणा से,
श्वान, श्रृगालों के सम्मुख फेंको.
कुछ नहीं उसका जाता है.
कर्ता ही, इन सबका, अंतिम फल पाता
है.
उस दिन से अब तक मैं !
विक्षिप्त सी घूम रही हूँ.
यह दुर्निवार आक्रोश मुझे.
सतत उद्भ्रांत बनाता है.
क्या तड़पेगी जीवित मृग जल की तड़पन.
थमी न क्षण भर को,
मेरी यह भटकन.
कैसे, किस विधी, कितने तीक्ष्ण
प्रहारों से,
लूं प्रतिशोध,
इन, धर्म के क्षद्मवेशी परिवेशों के मानव से .
नहीं समझ में आता है.
अहर्निश आंदोलित हुंकृत मन का यह ज्वार.
रंचमात्र को थमा नहीं,
इसकी जिज्ञासाकुल अबाध लहरों को,
सीमा का आधार मिला नहीं.
अनवरत चल रहे अंतर के वड़वाग्नि-चाक पर,
यह अधीर मन का सागर.
पागल सा, लहरों की अंजलि उछाल उछाल कर,
मूर्त-अमूर्त
अगणित प्रतिमाएं गढ़ता है.
वांछित छवि, नहीं उभरती.
सब, पटक-पटक, चूर्ण-चूर्ण कर देता है.
फिर उन्मत्त सा, सर धुन-धुन कर,
क्रोधित लहरों में रोता, पच्छाड़ें खाता
है.
नारी-गरिमा
का जलता प्रश्न !
वहीँ, उसी प्रकार अचल अटल रह जाता है.
क्या है नारी ?
एक शून्य !
जिसमें समस्त श्रृष्टि समाई है.
क्या वह ! ऐसा
प्रश्न है ?
जिसका उत्तर .
संहार, सृजन, विलय में,
शाश्वत ‘विलुप्त’ हो गया ?
वह एक, चिरंतन चली आ रही समस्या है जिसका कहीं निदान
नहीं.
क्या वह ! महाकाल
का वह अंतिम क्षण है .
जिससे आकार, कोई मुहूर्त नहीं मिलता.
अरक्षणियाँ है वह.
अनिणॅनीता है,
जिसका रक्षक,
जिसका निर्णायक.
स्वयं सर्वनियन्ता भी नहीं.

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