यह नील पहाड़ियों से भरा वन प्रदेश ऐसा लगता है जैसे किसी की मधुर कामना से भरी
अत्यंत सुन्दर एवं मन को हर लेने वाली प्रभा का दृश्य हो. नीले विशाल आकाश के नीचे
निडर एवं निश्चिन्त जहां-तहां मैदानों एवं पहाड़ियों से निकलते प्रपात एवं सरिताएं
ऐसी प्रतीत हो रही हैं जैसे दो पहाड़ अपनी बाहों में लेने के लिए खड़े हों.
वहीँ पर पाकड़, पीपल, करांच, मधुक, गुलचीन, देवदार, सेमल, वाट एवं आम के रस भरे
वृक्ष हैं. वन पक्षियों के शोर से सारा प्रान्त गूँज रहा है. वह सुगन्धित पुष्पित
वन प्रांत पक्षियों के कलरव से गूँज रहा है. इन्ही पहाड़ियों की छिपी अभिलाषाओं की
तरह विभिन्न छोटी-बड़ी कृत्रिम नदियान्निर्ज्हर निर्द्वंद बहती हैं जिससे उसका रंग
सफ़ेद सा प्रतीत होता है. ऐसा लगता है कि वह उन्ही पहाड़ियों के लिए इच्छा प्रदर्शित
कर रही हो. तीखी, दुबली एवं पतली अंगों वाली सुन्दर स्त्री सी प्रतीत होती नदियाँ
आगे जाकर विशाल रूप धारण कर लेती हैं. वह रंग-बिरंगे जल-जीवों से एवं उज्जवल बगुलों
की पंक्तियों से सुसज्जित हो जाती हैं. पास ही वृक्षों से लिपटी लताएँ उसी जल के
ऊपर ऐसी झुकी हैं जैसे वह दर्पण में अपना रूप देख रही हों. वायु के मंद वेग से वे
हिलती हैं तो ऐसा जान पड़ता है जैसे दर्पण में अपने सुन्दर रूप को देख कर स्वयं
मोहित हो गयी हों. इसी से खुशी से हिल रही हैं. वह अपने रूप पर घमंड करती सुंदरता
को चुनौती देती इत्र रही हैं.
केला,करांच और पाकड़ के घने पत्तों के बीच श्याम नदी की चंचल धार के सामान
इठलाते इतराते शाम के समय पह्हद के बीच से वनवासी जो कि सिर्फ अंग ढंकने वस्त्र
लिप्ताएं पहाड़ियों से उतर रहे हैं. उनके कंधे पर फरसा और कुल्हाड़ी है. सर पर
मोरपंख और गले में गुलचीन की माला पहने एक स्वर में सभी मिलकर गाते धूम नचाते चले
आ रहे हैं. इनका शरीर श्याम वर्ण का है. वे जी खोल कर हंस रहे हैं और उनका दिल भी
पारदर्शी प्रकाश स्वरूप है.
इनके मन को जितना नीला आकाश अपनी ओर खींचता है, सागर का नीला जल भी मानू ऐसे
ही उछल-उछल अपनी बाहों में इन्हें भरने की चाह कर रहा हो. प्रकृति का प्रकाशमान
तेजरुपी यौवन में क्षण-क्षण परिवर्तन आते-जाते से दिखाई दे रहे हैं. आँखों की
चमकती हिलती पुतलियाँ ऐसी लग रही हैं मानों नाग कुंडली मारे बैठा हो. यह दृश्य
मनभावन मादकता से भरा है.
युगों से यौवन को सँभाले प्रेयसी के रूप में प्रकृति क्षण-क्षण में अपने रूप
को बदलती और संवारती है. वह सिर्फ ऋतुओं के राजा बसंत का ही स्वागत करती है.
फिर हम आदिवासी भी आज़ाद स्वभाव वाले क्यों बंधन स्वीकार करें.
यह यौवनावस्था अमृत रस की मधुर वर्षा है. बचपन मिटटी में खेलकूद कर बड़ा होता
है. बुढ़ापा रसहीन कांटे की झंखाड़ों की तरह है. यौवन ही सही मायने में जीवन का
शाश्वत और सुन्दर पल है. इसकी उम्र लंबी नहीं होती परन्तु मादकता से भरी होती है.
इनके जीवन का मुख्य लक्ष्य है इस यौवन के हर पल को आनंद लेकर जीना. यह अवस्था किसी
प्रकार का बंधन नहीं मानती. ये जीवन का मूल्य एवं सामाजिक नियम-कानून के आडम्बर
नहीं मानते हैं. उन्हें हमेशा स्वतन्त्र होकर जहां-तहां घूमना पसंद है. यहाँ के हर
युवा वंशीधर हैं. यहाँ की हर लडकियां फूलों से सजी ऐसी नाचती हैं जैसे ब्रज की
गोपिकाएं हों. ये मनचाहे जीवनसाथी का स्वयं चयन करते हैं. इसमें किसी प्रकार का
,किसी का हस्तक्षेप अथवा मनाही कभी सहन नहीं करते हैं. उनके ललाट पर कभी चिंता की
रेखाएं दिखाई नहीं देती ना ही अधिक परिश्रम के भार उनकी जीवन क्रिया में बाधा
डालते हैं.
संध्या के समय जब सूर्य लहराती श्याम वर्ण के आँचल में छिपता है और रात का
प्रियतम अन्धकार ऊंची पहाड़ियों से नीचे दिखता है, ऐसे में वनवासी, नर-नारी किशोर
बलाएँ एक साथ गातीं समूहों में ऊपर से नीचे उतरती हैं.
केले और पाकड़ के वृक्षों की श्यामल छाया में रंग-बिरंगे पुष्पों की मालाओं से
सजी हैं, उनकी वह स्वर तरंगे पक्षियों सी लहराती आती हैं. नदियों का पानी पर्वत
एवं उसके प्रान्तों की बीच से ऐसा निकल रहा है जैसे पहाड़ों का ह्रदय चीरता हुआ
बाहर निकल रहा हो. झरने की गति कभी तीव्र होती हुई ऊपर की ओर उठती तोकभी धीरे-धीरे
नीचे धीमी गति से बहने लगती है और दिल को छूती हुई कहीं दूर आँखों से ओझल हो जाती
है.
ताल बंधे स्वर शब्द अनसुने और सुने संगीत के उतार-चढाव वाले मंद गति के अनोखे
राग नशे का तेज झोंका पैदा कर रहे हैं. यह तन-मन विभोर कर जाते हैं. शाम के समय का
यह गाना-बजाना तन-मन दोनों को मुग्ध कर देता है. शाम के समय का गाना-बजाना, वंशी
की धुन, पैरों में बंधे घुँघरू, ढोल एवं मंजीरे रात भर बजते रहते हैं. सुबह
सूर्योदय के समय इनकी ध्वनि विराम लेती है,
आज भी वैसा ही सब कुछ बीता है. आज आकाश शान्त सा प्रतीत हो रहा है. वन-उपवन भी
शान्त हैं. आज सिर्फ निकट में स्वर्णरेखा का जल पत्थरों से टकराता कुछ ज्यादा ही
आवाज़ कर रहा है. आज पक्षी भी मौन हैं, उनकी आवाज़ आज चारों तरफ गूँज नहीं रही है.
आज पृथ्वी और पवन भी मनो ठहर सी गयी है. लेकन शान्त अकेला मनरुपी आँगन न जाने
क्यों अनहोनी घटना होने की संभावना से डरा हुआ है.
ऐसा हमेशा होता था लेकिन मन चुप पड़ा सब सह लेता था पर आज ऐसा क्यों ? यह मन
अधीर और व्याकुल क्यों है. ऐसा लग रहा है जैसे ज्वर से तपते मन की गहराई में कुछ
अंदर ही अंदर रिश्ता जा रहा है, जिससे मन व्यथित है , हर साँसे चोट खाने से घायल
हैं.
प्राणों की सुप्तावस्था में भी उसके हर सुराखों में हलकी सी आवाज़ होती है. मन
दूर कहीं भटक गया सा प्रतीत होता है. मन के भीतर भी शान्ति नहीं है. मन में शान्ति
नहीं हो तो बाहरी वातावरण भी अशांत सा प्रतीत होता है. आकाश में काले बादल छा से
गए हैं. ऐस लगता है जैसे कभी भी वह बरस सकता है. वायु भी बीच-बीच में अपनी स्वांस
तेज खींच कर बह जाती है. बादल में छिपता-दिखता पीला चाँद दुःख की एक इबारत जैसा लगता
है. धरती कोहरों से ऐसे ढकी है कि उसका सही रूप दिखाई नहीं देता. कोहरे की मोटी चादर
ओढ़े धरती भी शान्त चुपचाप पड़ी है.
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