दो शब्द


‘अन्नुतरे’ विद्वत्गण एवं मनीषी साहित्यकारों के सम्मुख है. वे ही इसका मूल्यांकन करेंगे.
मुझे इतना ही कहना है कि आज यह चेतना जागरूक हो रही है कि नारी स्वातंत्र्य, समानाधिकार,आर्थिक स्वतंत्रता एवं समुचित शिक्षा उन्हें अनिवार्य रूप से प्राप्त होनी आवश्यक है. किन्तु उनके शोषण त्रासदी, दैन्य और उत्पीडन की यह परंपरा कब से चली आ रही है, क्यों ऐसा हो रहा है, उसके मूल कारण क्या हैं और निवारण के निदान भी क्या-क्या सुलभ हो सकते हैं. पौराणिक कथाओं में निरुपित प्रीता, कृष्णा एवं कर्ण तथा इसी प्रकार के अनगिनत व्यक्ति विकृत समाज की रूढ़िगत अन्य नीतियों से पीड़ित हुए हैं. ये किसी एक देश , वर्ग, समाज का प्रातिनिधित्व नहीं कर रहे हैं. सर्वत्र नारियों का और दलित वर्गों का आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक शोषण हो रहा है.
नारी नियति की सबसे बड़ी विडम्बना है. वह किस प्रकार कितने रूपों से पीड़ित हो रही है इसके प्रत्यक्ष प्रमाण मिस्र के पिरामिड्स में जीवित चुन दी जाने वाली रानियाँ, दासियाँ अथवा सामूहिक रूप से उनके हाथ-पैर तोड़कर भूगर्भ में समाधिस्थ कर देना तथा यहाँ की सती प्रथा, जौहर, सब एक ही श्रृंखला के परिवर्तित रूप हैं.मात्र जीवित जला देना ही नृशंसता नहीं है, क्षण-क्षण का मानसिक रूप से दमन और शोषण भी है. अब भी जब देश स्वतंत्रता के नारे लगा रहा है उसके मस्तक पर देवराला के देह दहन और दहेज के नाम पर बलि चढाई जाने वाली कुसुम-कलियों के रक्त की रोली लग रही है.
पृथा और कृष्णा के परोक्ष में उसी दमन, शोषण और अन्याय को मुखर किया गया है.
कर्ण दलित वर्ग का प्रतिनिधि है. वह सब प्रकार से पांडवों से कहीं अधिक शूरवीर, गुणज्ञ, मानवीय संवेदनायों से पूरित उच्चमना, उदारचेता ठगा.पांडवों के प्रत्येक कार्य-कलापों का उसके पास सबल उत्तर था किन्तु वह अनार्यता के नागपाश में जकडा अत्यंत विवश और उत्पीडित था.
समाज ने पृथा और कृष्णा को वर्जित रेखा पर अवस्थित किया किन्तु सीता के प्रति भी कौन सी दया बरती ? सबको एक ही तुला पर एक बराबर संतुलित किया.
मैंने अन्नुतरे में जो कुछ कहना चाहा है संभव है वह उतना ज्वलंत न उभरा हो.
अंत में मैं आदरणीय श्री त्रिभुवन जी के प्रति भी अत्यंत आभारी हूँ जिन्होंने इसमें सक्रिय योगदान देकर इसे सम्भाला, सवांरा और प्रकाश में लाकर उपस्थित किया. मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र श्री डा० विजय सिंह को भी हार्दिक धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने इसके प्रकाशन का भार वहाँ कर मुझे प्रोत्साहित किया .
-    सावित्री
४११, अशोक नगर,
पथ संख्या – बी ५, रांची
२६.०६.१९८८ 

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