Monday, 30 July 2012

सर्ग छः : कृष्ण




निविड़ अंधकार में, निःशब्द, निभृत,
निःसंग गहन निशा में,
थी पृथा अर्धशयित ।
निज एकाकी कक्ष में ।
विषण्ण मन, क्लांत श्रांत,
विवीर्ण मुख पर थी,
जाने अनजाने कितने आहत,
थकित, बीते क्षण,
सिहरे, सिमटे,शायित शांत ।
अबोल व्यथाओं से फटती जलती आँखों में,
उबल रहे थे, जलकण ।
मोटी रोई पलकें थी असमर्थ
उन्हें वहन करने में ।
थी टिकी स्थिर कातर आँखें,
बुझते दीपाधारों पर ।
थी लीन किसी गहन चिंतन में,
अथवा, टूट रही थी अपने ही अंतर्द्वंदों में ।
शुष्क रक्त होठों पर, बिखर रहे थे अस्फुट स्वर ।
“ क्षमा ।” “
वह करेगी मुझे अवश्य क्षमा ।”
किन्तु यह “ क्षमा । ”
कितने पड़ाव,
कितने बहाव इसने देखे हैं ।
कितने-कितने परिवेशों को,
कितने उच्छवासों, आबेशों, सघर्षणों को,
भावों की उठती-गिरती बनती-मिटटी उत्ताल तरंगों को,
इसने झेला है ।
किन रूपों में किसके सम्मुख गयी ।
किसे अभिमंत्रित, तिरस्कृत किया ।
इसने नहीं जाना ।
यह, बहुआयामी, बहुभाषी हो गयी ।
आमूल, बदल गयी, इसकी परिभाषा ।
क्षमा !
अहम का ज्ञापन । आत्मसंतुष्टि का उद्बोधन है ।
निरंकुश, नृशंस, प्रभुता-अम्पन्न परम बलशाली, की,
थाती धरोहर है ।
उसकी इच्छा, उसकी आज्ञा,
उसके उद्दीप्त अहम की पूर्ति है ।
दम्भ्भरी नम्र स्वीकृति है ।
भूला भटका क्षण है ।
भरे हुए अग्निपात्र का बिखरता हुआ,
दलित चूर्ण एक कण है ।  
कुंडल मारे फुंकारित मणिधर का,
कभी-कभी दिख जाने वाला मणि है ।
अक्षम की असमर्थता को इंगित करता,
विष बुझा मीठा स्वर है ।
अहम के उसके, मिजाज का,
रूप बदलता तेवर है ।
उसकी मिथ्या अनुकम्पा से
पीड़ित, दलित, मर्दित स्वाभिमान को ,
क्षमा कह, वह और ठेस पहुंचता है ।
अवश प्रणत के खुले पृष्ठ पर यह क्षमा,
निर्ममता से पड़ती हुई कशा है ।
समर्थ की क्षमा !
निरुपाय, निरीह की पीड़ित घोर विवशता है ।
यह ।
आडम्बरपूर्ण कृत्रिम शिष्टता की,
कूटनीतिमय सुनियोजित संभली सी भाषा है ।
उदास भावनाओं की यह कोमल धरा,
सज्जन ह्रदय का आशीर्वचन है,
स्वस्तिमय वरदान सरिस है ।
यह क्षमा ही नहीं, उ
नकी निष्ठा की सुरभि बन जाती है ।
अमिय-कन सी झर जाती है ।
और दलित शोषित का,
अहर्निशी लानत देता,
ज्वलित अभिशापित दावानल है ।
और, कृष्णा !
उसके पास क्षमा कहाँ है ?
अहर्निशी का जलता अंतर है ।
आंसू से भींगा आँचल है ।
क्षमा, क्रूर नियति का कठोर व्यंग है ।
जो सब प्रकार से दलित, त्रस्त विवश,
वह भला क्षमा करेगा क्या ?
टूट गए पंख जिसके, वह,
नभ की उन्मुक्त उड़ान भरेगा क्या ?
“शोषण के प्रतिक्रियात्मक पश्चाताप” को कदापि वह,
“क्षमा” की संज्ञा नहीं देगी ।
धरती ! कहते हैं, क्षमाशीला है ।
बाहर भीतर से संत्रसिता पद-दलिता है ।
किन्तु, असंवेदनशील तो नहीं । 
इसने उसके,
मर्मान्तक प्राणान्तक अंतर-भेदन को देखा ।
पृथ्वी घिरी हुई जलनिधि से,
दबी हुई, हिम शैल शिखर, जीव-जंतु, वनस्पतियों से ।
अबाध असीम नीला अम्बर ।
दोनों के सम्पुट में, तड़प रही, उबल रही,
शुक्ति-कैद-स्वाति कन सी ।
किसने झाँका उसके अंतर में,
मौन पड़ी ज्वालामुखियों को,
स्नेह-उबलती सरिताओं को ।
भीतर ही भीतर,
शिला-खंडो के प्रहारों से प्रताड़ित,
अविराम झरित अग्नि-झरों से ज्वलित,
समय का कठोर निर्मम हाथ,
किस निर्दयता से, मसल—मसल कर रहा चूर्ण,
संभाल कर संजोयें इतिहासों को,
गौरव के ध्वस्त अवशेषों को ।
उसके अंतर में,
कितने फडफडाते पीड़ा के आंसू से भींगे खुले पृष्ठ ।
कितनी गौरव की गाथाओं के, ताजे क्षत खुले पड़े ।
अंतर की व्यथा मौन निहित,
बाहर भी, संघर्षं के अंधे दौर अमित ।
बड़े-बड़े टूट गिरते शिलाखण्डों के क्षत,
नर-संहारों के भैरव उत्सवों से आहत ।
प्रकृति प्रकोप भूचालों जल प्लावन से,
वह दलित त्रस्त पीड़ित ।
ऐसी ही तो नारी है !
वह नियति भाग्य से हारी है ।
किस साहस को लेकर
मैं जाऊं कृष्णा के समीप ।
कृष्णा !
जिस आज्ञा को नितांत असंगत जान,
विरोध नहीं कर पायी ।
इतना भी आत्मबल नहीं जुटा पाई ।
वह ! निरीह नारी थी ।
तडपी, अकुलाई, और भाग्य को ही,
स्वयम को, समर्पित कर पायी ।
वह अबला !
जिसकी आँखों से अश्रु नहीं रक्त छलकते हैं ।
प्रतिशोध की प्रज्वलित ज्वाला में,
अरमानों के ध्वस्त महल सुलगते हैं ।
उन्मुक्त खुले रुक्ष कृष्ण केश ।
चुनौती देते, फुंकारित नागों से लहराते हैं ।
शोषण के ऊष्ण रक्त से भरे छलकते खप्पर को,
वह, अमिय चषक नहीं कहेगी ।
सदियों की इस नृशंसता को,
वह, कड़े दाम में भुनाएगी ।
यह सन्देश, कदापि न,
कृष्णा तक ले जा पाऊंगी ।
उसके तीक्ष्ण प्रश्नों के शल्यों से,
क्योंकर स्वयं को बचा पाऊंगी ।
उसकी आँखों के सागर में,
सोये प्रश्नों के सहस्र फन,
एक साथ फुंकार उठेंगे करने को,
विषाक्त दंशन ।
वह भरी हुई फट पड़ने , जैसी,
एक मौन ज्वालामुखी है ।
प्राणों के साथ ही,
खुल पड़ेंगे उसके खुले क्षत ।
लहरा उठेगा उसकी आँखों में,
पीड़ा का वडवानल ।
यह, “क्षमा !”
मात्र उपहास करेगी उसका ।
उसकी अभिशापित पीड़ित चीत्कार,
नहीं सहन कर पाऊंगी ।
नहीं ! नहीं ! कदापि नहीं !
मैं जाऊंगी उसके पास ।
यह क्षमा,
यदि शुभ नक्षत्र सरिस, रणागन में चमकी होती,
प्रतिहिंसा की ज्वाला से पीड़ित,
प्रतिशोधों के कृष्ण धूम से,
पथ भ्रमित, विगलित, युद्ध-शलभों को,
उचित मार्ग इगित की होती ।
और, पार्थ !
स्वजनों को निरख जो, रोमांचित हो आया ।
कम्पित तन ! व्यथित मन !
शस्त्र त्याग, खडा रहा विषण्ण ।
क्यों उसे कृष्ण ने, निज विराट रूप दिखाया ।
समस्त ब्रह्माण्ड को, एक तृण सदृश्य जतलाया ।
उस महाकाल के, विस्फारित मुख गह्वर में,
पक्ष-विपक्ष दोनों दल,
एक ग्रास का, कण मात्र ही बन पाया ।
जब वह । मन्वन्तर, संवत्सर, युग-वर्ष, ऋतू,
ऋषिगण, नक्षत्र, कविगण,
सबमें था श्रेष्ठ ।
वह नखतों में सूर्य ।
कवियों में उशना ।
ऋतुओं में रसराज,
देवताओं में था देवराज ।
तब क्यों नहीं बदल पाया,
विकृत होता यह समाज ।
क्यों नहीं दी सुमति ।
क्यों नहीं किया उदध विरत ।
गृह-कलह से बड़ी, इस युद्धाग्नि में,
वेदान्त-दर्शन के घृत की आहुति,
डाल-डाल कर, स्वयम प्रज्वलित करने में,
सामधानी का कार्य किया ।
होता अत्याचार किसी का,
होता कोई भी अविवेकी ।
यदि एक उसे, क्षमा कर पाता ।
अमर हो जाती उसकी वह सदभावना  
स्वर्णाक्षरों में अंकित होती वह सौहार्दपूर्ण नेकी ।
वह विराट रूप अथवा विरक्त ।
हुआ जिससे पार्थ स्तंभित ।
एक ही रक्त के, इन बहूरूपों को,
क्या दिखलाना वासुदेव के पक्ष में,
किंचित भी रहा उचित ?
महाकाल !
क्या समय, वस्तुविशेष, जाती वर्ग विभेद,
का करता है विश्लेष्ण ।
एक साथ ही, एक समय में,
उसमें विलीन नहीं हो जाते सचराचर ।
क्या हुआ उन वनिताओं का,
दप-दप दीपित जिनके सिन्दूर मिटे,
हर उल्लसित गृहों के, जगमग दीप बुझे ।
टूटी शंख की सजी चूड़ियाँ ।
निराधार, निरालम्ब गिरी धरा पर,
सुद्दढ़ तरु से बिछु, कोमल नव कुसुमित वल्लरियाँ ।
घन अन्धकार पूरित भविष्य में,
मौन खड़ी, ये जीवित निष्प्रभ छाया ।
अप्रत्याशित वैधव्य और,
हिमपात प्रताड़ित नव-वय की काया ।
यह विराट रूप !
विराग नहीं था ।
यह थी कामदेव की माया ।
जिसने अनर्थक रची,
युद्ध संग्राम के चक्रव्यूह की माया ।
क्या उत्तर है , किसी के पास ?
निराधार क्षुधातुर आर्त विकल, है
भटक रहे, स्त्री-पुरुष, वृद्ध, बल, अबाल ।
यदि यह धर्म युद्ध रहा,
किसी पक्ष ने,
धर्म नहीं अपनाया ।
अवसर पाते ही, मात्र छल से ही,
सफल हो पाया ।वह रणागन ।
मृत, मृतप्राय, क्षत-विक्षत,
आहत, निरुपाय, पड़े कराह रहे ।
ये प्रत्यक्ष जलते तडपते प्रश्न ।
और पत्थर से निश्छल,
मौन खड़े अधूरे उत्तर ।
रौंद रहा समय,
इतिहासों के लोहित उड़ते पृष्ठ ।
क्या यही लक्ष्य रहा जीवन का,
या, यही रही इतिश्री ।
धर्म-अधर्म के द्वन्दयुद्ध में,
प्राप्त यह कुरूप अभीष्ट ।
इस, कटु सत्य के, वीभत्स श्मशान में,
है, धर्म का राज्यारोहण ।
क्या कभी इन टूटी स्वांसों को लेकर,
बढ़ पायेंगे, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के,
गंभीर चरण ।
असत्य की वैसाखी पर,
विकलांग सदा सत्य,
खोज रहा इस श्मशान में,
कहाँ बिखर गया जीवन का सत्य ।
सत्य !
यदि शिवम् है ।
तब वह संहारक नहीं ।
यदि यही वास्तविकता है,
तो वह,
शिवम सुन्दरम का धारक नहीं !



Thursday, 26 July 2012

सर्ग सात : सूर्य



मन्त्रपूत यज्ञ की जलती ज्वाला में,
पद्मरागी प्रज्वल्लित ज्वाल शतदल के मध्य,
किसी सुकर्म के श्रेष्ठ श्रेय सी,
अमलां अमल शाश्वत शुभ वरदान सी,
सौन्दर्य-सुधा-कमनीयता की अप्रतीम प्रतिमा,
किजल्क-केशर की तरुण अरुण कलि,
अवतरित हुई थी ।
अगरु धूम हविश्यानों के सुरभित सौरभ-सुगंध से आवेष्ठित,
द्रुपद-सुता ।
म्लान न कर पाई दग्ध तप्त ज्वाला,
उसकी शुचिता, कमनीयता ।
प्रखर प्रदीप्त रही उसकी मुखर तेज़स्विता ।
लावण्या-सुधा के गगन विचुम्बित ज्वारों के अंतराल से,
दे रही  थी वह चुनौती,
किसी भी अप्रतीम सौन्दर्य-प्राग्लाभ्य को ।
अगणित ऋतूराजों के नव पल्लवित आनंद-महोत्सव सी,
उन्मत्त प्रमत्त विकच थी,
उसकी अभिलाशाओं की कलिकाएँ ।
झुक रही थी नव-नव अभिलाषायों के,
रस से पूरित,
उसकी आशाओं के नव-गुम्फित लतिकाएँ ।
नारी की, किन प्रतिष्ठित मान्यताएं, उल्लासों के साथ,
हाथों में हाथ दुए, गहन विश्वास लिए,
रखा था उसने प्रथम चरण ।
इस लीलाभूमि-कर्मभूमि के प्रांगण में ।
नहीं ज्ञात था उसको ।
उसके, आकर्णमूल पद्मप्लाक्षों के उन्मीलन से,
जहां, अलसित सस्मित खोल रहे थे पात के पात ।
अगणित जलजात अवदात ।
वहां उन्ही अरमानों के कुवलयों में,
कुंडल डाले बैठा था, छिपा, विषधर नाग ।
उसकी विषाक्त ज्वलित फुन्कारों से,
जल उठे किजल्क जाल ।
डस गया उन्हें, विष से पागल कृष्ण व्याल ।
कल्पना के आप्लावित मादकता से, टकराई,
यथार्थता की तीखी कटु कटुता ।
कोमलता को कुम्हला गयी,
निठुर यथार्थ की कठिन परुषता ।
जो हर घूँट गले से उतरी ।
वह, तृप्ति की नहीं,
अदम्य जलती बढती ज्वाला की थी ।
जिस करुवाहट को घूँट घूँट करती पान,
तन-मन के रिसते विष से,
थे थर-थर कम्पित प्राण ।
वह विक्षिप्त बेसुध,
शनैः-शनैः मन ही मन बिखर बिखर,
जीवन पथ पर बढती जाती थी ।
क्रांति, विद्रोह, आक्रोश की साक्षात,
प्रतिमा सी थी, द्रुपद-सुता ।
और पृथा !
किसी दिव्य अलभ्य ज्योति की,
दोनों ही थी, आगे, पीछे पड़ती छाया ।
एक दुःख 1
एक शाप !
एक ही मनः ताप !
एक ही विषाक्त शल्य था,
बेधित दोनों के अंतर में ।
किसी कठिन राग के आरोह अवरोह सी,
दोनों की थी, एक ही कथा,
एक ही व्यथा ।
वह पृथा !
जिसका धर्मनिष्ठ जीवन होता था व्यतीत,
अध्ययन, पूजन-अर्चन और स्तवन में ।
था शुभ कर्मों में जीवन यापन,
देवगणों, ऋषिओं का विधिवत आराधन ।
था मधुर शुचि किशोर भोलापन ।
नव-वयस की निश्छल जिज्ञासा ।
मन्त्र-पूत सृका से सूर्यदेव का आहावन ।
कर गया वज्रपात ।
हो गया क्षार ।
असंस्पर्षित कुमारी-कुसुमदल का लहराता उपवन ।
यदि वस्तुतः सत्य में, सात्विकता, शुद्धता
देवत्व की महत भावना, रही होती, इन देवगणों में ।
लोलुप से नहीं ये विचरते ।
गौतम के तपोवन में,
बृहस्पति के आश्रम में,
नहीं खड़े रहते, च्यवन ऋषि, का सुन्दर स्वरूप बनकर,
सुकन्या के वर-चयन में,
या तुलसी-वृंदा के राजभवन में ।
सदा आत्मा का उद्भासित प्रखर प्रकाश,
करता इन्हें निषेध,
अनुचित, अमर्यादित कार्य करने को ।
किन्तु, ये देवगण !
कितना दीन, अकिंचन, हीन, पतित हैं ।
इनका स्वेच्छाचारी मन ।
दशानन ने भी किया था,
जनक-सुता का हरण ।
किन्तु सदा, निज पत्नी के सम्मुख,
किये उससे संभाषण ।
वह भी मर्यादा और सीमा में था ।
यह सूर्य !
कहने को असुर नहीं, सुर था ।
अपनी तेजस्विता में प्रखर, प्रबल था ।
निषेध कर सकता था, भोली सुकुमारी को ।
परिणाम अवगत कर,
आवाहन के निमित्त प्रतिरोध, लगा सकता था ।
उसकी प्रतिष्ठा सुरक्षित रख
अपना सम्मान बढ़ा सकता था ।
पर कहीं पर भी हो,
रमणी !
उचित अनुचित संगत असंगत सब भूलकर,
इस आकर्षण में,
नहीं होता इनसे,
निज संयम का संवरण ।
पृथा का अपना ही सौन्दर्य हो गया अभिशाप ।
डस गया उसे विषधर व्याल ।
मातृत्व की मौन कारा में,
निर्ममता से कुमारी को डाल,
चला गया सदा के लिए,
कठोरता से उसे त्याग ।
तड़पती रही पृथा,
शाश्वत अपमान लांछना तिरस्कार की,
असह्य ज्वाला में ।
क्या था अधिकार,
समस्त ज्ञान के अध्येता पारंगत देव को,
यह साहस करने का,
छलने का निश्छल भोले कौमार्य को ।
करना था उसे ग्रहण उत्तरदायित्व,
एक कुमारी माता, अनाम पिता के पुत्र का ।
देना था परिचय अपने आत्मबल का
अपनी उच्चता का ।
किन्तु, कृष्णा और पृथा,
दो जलती हुई अलभ्य रेखा है ।
जल उठे समस्त तर्क,
ज्ञान-विज्ञानं, इतिहास, धर्मग्रन्थ और पुराण ।
रख दिया इन्होने सबके सम्मुख ।
कितनी नगण्य है नारी,
क्या है उसका सम्मान ।
कोई भी स्पष्टीकरण निर्मूल है ।
संस्कृति के ह्रदय में चुभा,
यह एक भयानक शूल है ।
इन्होने सहा ही नहीं अपितु,
परोक्ष में प्रतिनिधित्व किया है ।
नारी की, मर्दित मर्यादा, दलित स्वाभिमान,
और दारुण पीड़ा का ।
इस स्थिति में इस प्रकार,
किसने इन्हें पहुँचाया था ।
उन्हें, क्रमशः अपमानित, लांछित कर,
निर्ममता से,
उच्च पुनीत-पूजन-पीठिका से,
बर्बरता से नीचे गिराया ।
अपितु, इतना हे नहीं,
नए सन्दर्भों, नयी परिभाषाओं के साथ,
सतीत्व और पातिव्रत का पाठ पढ़ाया ।
गरिमा, शालीनता, प्रतिष्ठा, तेज़स्विता के,
उच्च मंच पर अवस्थित, नारी को,
वर्जित नाम । निषिद्ध रेखा पर ठहराया ।
दोषी कौन ?
यज्ञ की ज्वालाओं में अम्लान कलि सी,
अवतरित, वह देवि !
पूजन आराधन, यज्ञ हवन को पूर्ण समर्पित,
वह राजकुमारी ।
उनकी पावनता शुचिता का,
ऐसा घृणित विनिमय क्यों हुआ ?
इस पाशविकता-पूर्ण मूल्यांकन का
उत्तरदायित्व किस पर है ?
यह निति नैतिकता धर्म की पाखंडिता
कब क्या रूप लेगी ?
इनकी विकलांगता, अपंगता, स्वार्थ-परक हाथों में,
कितनी क्षत-विक्षत आक्रांत, होती रहेगी ।
इनकी धर्म, सतीत्व और पतिव्रता की,
बदलती विकृत परिभाषा में,
क्या कोई भी द्रुपद-सुता,
सीता की भांति द्दढ़ता से कह सकेगी ?
“ कर्मणा, मनसा, वाचा,यथा, नातिचराम्यहम ।
राघव सर्व धर्मज्ञ तथा माँ पातु पावकं । ।”
एक ही स्थिति और स्वरूप में,
इनके द्विरेफिय अथवा बहुमुखी,
परिवर्तित होते विधान ।
नारी को, कुम्हार के अनवरत चलते,
चाक पर अवस्थित कर ।
कितने और किन रूपों में
बनाता, बिगाड़ता, फेंकता रहेगा ?
हर बार, कुचलती, पिसती,
नए-नए रूपों में उतरती,
कबतक, विवश, निरुपाय,
दिग्भ्रांत भटकती रहेगी ?
किस बिंदु पर आकर, सहसा,
इनके सब नियम भंग हो जाते हैं ।
कब अपनी अपंग निति पर,
ये, उतर जाते हैं ।
सर्वत्र बिखरी है इनकी दम्भपूर्ण, नृशंस अंधी निति ।
मात्र झंकृत होती हैं, इनकी बेड़ियों से,
बंदिनी, नारी की बेड़ियाँ सभीत ।
समस्त, बौद्धिकता की उर्वरता,
नारी-शोषण में ही केन्द्रित कर,
अपने पौरुष की कठोर उर्वरता को जतलाया है ।
अन्यथा, धर्म की किस निति और व्याख्या पर,
पांडू की, धर्म समाज-स्वीकृति मुहर लगाकर,
पांडव, देव-पुत्र होकर भी,
पांडव कहलाये ।
और कर्ण !
देव-पुत्र होकर भी,
सब अधिकारों से वंचित रह जाए ।
पृथा-पुत्र तो सब ही थे,
यद्वपि वे देव-पुत्र थे ।
किन्तु सारे नियम मात्र सूर्य-पुत्र ही पर आकर,
क्यों इस प्रकार, विराम पा जाए ।
क्योंकि कर्ण !
लंछिता, भयभीता, किसी गहन अन्धकार में छिपी,
निरीह सहमी हिरनी का, अबोध मृग-शावक था ।
नहीं शीश पर उसके , कोई सुद्दढ़ वरद-हस्त था ।
नहीं कोई, उच्च राजवंश उसका अभिभावक था ।
कैसी पक्षपातपूर्ण निर्णयोंक्ति थी, इन धर्म-वेत्ताओं की ।
कौन सी कुलीनता, निष्कलंकिता,
शेष बची थी, इन राजवंशों में ।
किस जाती,धर्म, सभ्यता, समाज, वर्ण का रक्त,
नहीं प्रवाहित था इनकी रगों में ।
मेनका, उर्वशी, गन्धर्व, किन्नर,
जाने कितनी नृत्यांगनायें, अप्सराएं,
अथवा शूद्र कन्यायें थी,
इनके पूर्वजों की पत्नियां और माताएं ।
कैवर्त कन्या, योजनगंधा, सत्यवती, शांतनु की पत्नी ।
व्यास थे जिसकी संतान ।
पिता थे उनके पराशर मुनि महान ।
उसी शांतनु की पुत्र-वधुओं के आत्मज थे,
ये, व्यास से उत्पन्न, धृतराष्ट्र, पांडू, विदुर ।
नहीं किसी ने उठाया अपवाद ।
नहीं किसी ने किया विवाद ।
ये प्रभुता संपन्न, सुद्दढ़, अडिग, यशस्वी,
बलशाली शासनकर्ता थे ।
शासन की डोर थी इनके हाथों में ।
ब्राह्मण धर्म समाज,सबके पोषक,
सब प्रकार से उनके पालक,
उनके दाता थे ।
इनमें इनका छिद्रान्वेष्ण करने
अथवा इनकी कुलीनता निष्कलंकिता को
चुनौती देने का साहस,
इन चाटुकारों में नहीं था ।
इनपर राजसत्ता की ठोस मुहर लगी थी ।
सोते हुए सिंह को जगाने की, भला किसे पड़ी थी ।
धब्बो वाले प्रचंड सूर्य के, दाग को कौन देखता है ।
किन्तु, शीतल चांदनी बिखेरता चाँद,
अपने क्षतों से कलंकी ही कहा जाता है ।
दोषी, सत्यवती नहीं थी ।
उस कैवर्त कन्या की,
भीष्म के ब्रह्मचर्य का मूल्य देकर,
शांतनु ने ग्रहण किया था ।
मेनका भी अपराधिनी नहीं थी ।
उसका तो कार्य ही तपःभंग था ।
और विश्वामित्र-मेनका की आत्मजा शकुंतला,
वह भरत वंश की प्रथम श्रृंखला थी ।
पुरुरवा की प्रियतमा उर्वशी ।
वह भी दोषी नहीं ।
उसकी संताने भी निष्कलंक थी ।
क्योंकि सम्राट की मोह-रज्जू,
गलत नहीं हो सकती ।
समर्थशाली दोषी नहीं होता ।
मात्र, दोषी थी ।
कृष्णा !
दोषी थी ।
पृथा !
क्योंकि, ये उन सुविधाओं से वंचित थी,
जिससे, सत्यवती, मेनका, उर्वशी, शकुंतला, सुरक्षित थीं ।
अतः !
इन अरक्षिता, पीडिता, एककिनी, नारियों के संवेदक,
न देवगण थे, न राजवंश, न समाज ।
अपनी सत्यता के मूक साक्ष्य से
ये निरुपाय, असहाय थी ।
जलती धरती, जलती बौछारों में,
समस्त दोषारोपण को, विवश,
मौन सहन करने के लिए,
बलात खड़ी रहीं ।