Thursday, 20 September 2012

आमुख



नारी !

समस्त ब्रह्माण्ड की आदि शक्ति हो तुम !

तुम हो,

अमृत पावन की धारा .

तेरे,

स्वस्तिमयकल्याणमयप्रचंड तेज को,

निज,

श्यामल,सघनआकाश सरिस विस्तृत,

उड़तेकृष्ण जलद से अलक जाल में,

उज्ज्वल मौक्तिक माल सदृश,

सहर्षसोल्लासित होकर,

शिव ने,

सत्वरसनतसाभार सम्हाला .

तू !

अनुपम, अप्रतिम, शाश्वत सौंदर्य की,

पावन प्रज्वलित आलोकित दीप शिखा .

ब्रह्मांड विमूर्छित,

चौदहों भुवन चकित,

सम्मोहन का यह मादक रूप अमिट,

कर गया चेतना को जो व्यथित थकित.

तुझ सा अपूर्व,

अन्यत्र न कोई अन्य दिखा.

अमृत-मंथन की विश्व मोहिनी भी,

तेरा निःशेष हुआ उपेक्षित,

मात्र, एक कण है.

तू .

स्वयं में सर्वांगपूर्ण,

एक चिरंतन उद्दीप्त सम्मोहन है.

अपूर्वा.

तेरा स्वरूप,

अंतिम अवलंबन, अचूक मारण है.

अन्नपूर्णा सी तू अक्षयदात्री,

अमर-पुत्र भी करबद्ध विनीत,

तेरी अनुकम्पा का प्रार्थी.

लहराते गर्वोन्नत अमिय कलश का,

तू ही एकमात्र अलभ्य दिव्य दर्पण है.

तुझमें ही निज को निरख निरख,

वह,

करता अपना मूल्यांकन है.

अंतिम शोभा श्री का तू मापक.

यह विश्व अकिंचन,

तेरा याचक है.

सुषमा सौष्ठव सहिष्णुता, वात्सल्य प्रज्ञा की,

तू अलंघ्य सीमा है.

तेरी शक्ति का जागरण,

है संसार सृजन का कारण.

सृष्टि-चक्र के क्रम में भी,

कर रहा पुरुष,

तेरा ही अनुसरण.

उत्कर्ष के क्रमशः बढ़ते सोपानों पर भी,

अग्रसर रहे सदा तेरे ही चरण.

जिन विभूतियों के अभाव में,

पुरुष रहा, सदा से दीन अकिंचन,

उन दैवी संपदा,

शालीनता मानवीय उच्चता का,

आप्लावित सोच्छ्वासित उल्लास चरम,

तुझमें ही लहराया.

कभी, किसी बिंदु पर,

किसी स्तर पर,

सम्मुख आकर वह तेरा अतिक्रमण,

कदापि, नहीं कर पाया.

अनुत्तरे !

तू पूर्ण काम, स्वस्तिमय महान !

तू लावण्य-श्री का,

ज्वार पूरित गगन प्रच्छायित महो दधि .

तुझे सका कर कौन वरन .

तेरी छवि, प्रतिबिंबित करने में,

संकुचित, समस्त भुवन का दर्पण.

सीमा में असीम तेरा स्वरूप.

तुझमें ही, खंड प्रलय ! महा प्रलय !

तुझमें ही अगणित ब्रह्मांडों का,

उत्थान-पतन, संहार-सृजन विलयन.

जाने कितने विराट रूप.

आंक रहे तव आँखों में,

अपना, रूप ! अरूप .

तव, पद्म-पलाक्ष मदिर नील नयन का उन्मीलन !

दिवा-रात्रि का शयन जागरण.

तेरे पलकों के कज्जल अंतरिक्ष में

समस्त भुवन का अलसित संतरण.

हो रहा अणु-अणु में

नव स्फुरण का वर्तुल नर्तन.

मोह-रात्रि,काल-रात्रि, महा-रात्रि .

सब पर तेरी छाया.

तू प्रज्ञा पारमिता !

आदिशक्ति ! संचालिका !

कहाँ सुप्त तेरा वह सम्मोहन.

पुनः कर क्षीर-उदधि में ,

अमृत का दोहन.

कर अपने अपार शक्ति का जयघोष.

नारी जागरणके नीरस खोखले स्वर में,

भर दे ! भर दे ! अमल नवल संजीवन.

सृष्टि थिरकती जिस पर,

तू ही वह वेणु-वादन.

केन्द्रीभूत कर्षण पर तेरे,

अहर्निश कर रहे खगोल भूगोल अयन.

अंकुरित तेरे ही में,

संसृति का नव-नव प्रत्यावर्तन.

तेरे अरुण नवल कँवल सरिस अलक्तक सज्जित,

लास चपल चरणों की शिंजनी से

बिखर पड़े अगणित मुक्ता से,

जगमग-जगमग, ये नखत गण, तारक गण.

ओ कल्याणी !

परम वैभव शालिनी.

सम्पूर्ण शक्ति सम्भूते .

निरख.

निज विशाल व्याप्त अपार शक्ति का,

अच्युत ! अक्षीण ! अनन्त सम्मोहन !

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