Monday, 30 July 2012

सर्ग छः : कृष्ण




निविड़ अंधकार में, निःशब्द, निभृत,
निःसंग गहन निशा में,
थी पृथा अर्धशयित ।
निज एकाकी कक्ष में ।
विषण्ण मन, क्लांत श्रांत,
विवीर्ण मुख पर थी,
जाने अनजाने कितने आहत,
थकित, बीते क्षण,
सिहरे, सिमटे,शायित शांत ।
अबोल व्यथाओं से फटती जलती आँखों में,
उबल रहे थे, जलकण ।
मोटी रोई पलकें थी असमर्थ
उन्हें वहन करने में ।
थी टिकी स्थिर कातर आँखें,
बुझते दीपाधारों पर ।
थी लीन किसी गहन चिंतन में,
अथवा, टूट रही थी अपने ही अंतर्द्वंदों में ।
शुष्क रक्त होठों पर, बिखर रहे थे अस्फुट स्वर ।
“ क्षमा ।” “
वह करेगी मुझे अवश्य क्षमा ।”
किन्तु यह “ क्षमा । ”
कितने पड़ाव,
कितने बहाव इसने देखे हैं ।
कितने-कितने परिवेशों को,
कितने उच्छवासों, आबेशों, सघर्षणों को,
भावों की उठती-गिरती बनती-मिटटी उत्ताल तरंगों को,
इसने झेला है ।
किन रूपों में किसके सम्मुख गयी ।
किसे अभिमंत्रित, तिरस्कृत किया ।
इसने नहीं जाना ।
यह, बहुआयामी, बहुभाषी हो गयी ।
आमूल, बदल गयी, इसकी परिभाषा ।
क्षमा !
अहम का ज्ञापन । आत्मसंतुष्टि का उद्बोधन है ।
निरंकुश, नृशंस, प्रभुता-अम्पन्न परम बलशाली, की,
थाती धरोहर है ।
उसकी इच्छा, उसकी आज्ञा,
उसके उद्दीप्त अहम की पूर्ति है ।
दम्भ्भरी नम्र स्वीकृति है ।
भूला भटका क्षण है ।
भरे हुए अग्निपात्र का बिखरता हुआ,
दलित चूर्ण एक कण है ।  
कुंडल मारे फुंकारित मणिधर का,
कभी-कभी दिख जाने वाला मणि है ।
अक्षम की असमर्थता को इंगित करता,
विष बुझा मीठा स्वर है ।
अहम के उसके, मिजाज का,
रूप बदलता तेवर है ।
उसकी मिथ्या अनुकम्पा से
पीड़ित, दलित, मर्दित स्वाभिमान को ,
क्षमा कह, वह और ठेस पहुंचता है ।
अवश प्रणत के खुले पृष्ठ पर यह क्षमा,
निर्ममता से पड़ती हुई कशा है ।
समर्थ की क्षमा !
निरुपाय, निरीह की पीड़ित घोर विवशता है ।
यह ।
आडम्बरपूर्ण कृत्रिम शिष्टता की,
कूटनीतिमय सुनियोजित संभली सी भाषा है ।
उदास भावनाओं की यह कोमल धरा,
सज्जन ह्रदय का आशीर्वचन है,
स्वस्तिमय वरदान सरिस है ।
यह क्षमा ही नहीं, उ
नकी निष्ठा की सुरभि बन जाती है ।
अमिय-कन सी झर जाती है ।
और दलित शोषित का,
अहर्निशी लानत देता,
ज्वलित अभिशापित दावानल है ।
और, कृष्णा !
उसके पास क्षमा कहाँ है ?
अहर्निशी का जलता अंतर है ।
आंसू से भींगा आँचल है ।
क्षमा, क्रूर नियति का कठोर व्यंग है ।
जो सब प्रकार से दलित, त्रस्त विवश,
वह भला क्षमा करेगा क्या ?
टूट गए पंख जिसके, वह,
नभ की उन्मुक्त उड़ान भरेगा क्या ?
“शोषण के प्रतिक्रियात्मक पश्चाताप” को कदापि वह,
“क्षमा” की संज्ञा नहीं देगी ।
धरती ! कहते हैं, क्षमाशीला है ।
बाहर भीतर से संत्रसिता पद-दलिता है ।
किन्तु, असंवेदनशील तो नहीं । 
इसने उसके,
मर्मान्तक प्राणान्तक अंतर-भेदन को देखा ।
पृथ्वी घिरी हुई जलनिधि से,
दबी हुई, हिम शैल शिखर, जीव-जंतु, वनस्पतियों से ।
अबाध असीम नीला अम्बर ।
दोनों के सम्पुट में, तड़प रही, उबल रही,
शुक्ति-कैद-स्वाति कन सी ।
किसने झाँका उसके अंतर में,
मौन पड़ी ज्वालामुखियों को,
स्नेह-उबलती सरिताओं को ।
भीतर ही भीतर,
शिला-खंडो के प्रहारों से प्रताड़ित,
अविराम झरित अग्नि-झरों से ज्वलित,
समय का कठोर निर्मम हाथ,
किस निर्दयता से, मसल—मसल कर रहा चूर्ण,
संभाल कर संजोयें इतिहासों को,
गौरव के ध्वस्त अवशेषों को ।
उसके अंतर में,
कितने फडफडाते पीड़ा के आंसू से भींगे खुले पृष्ठ ।
कितनी गौरव की गाथाओं के, ताजे क्षत खुले पड़े ।
अंतर की व्यथा मौन निहित,
बाहर भी, संघर्षं के अंधे दौर अमित ।
बड़े-बड़े टूट गिरते शिलाखण्डों के क्षत,
नर-संहारों के भैरव उत्सवों से आहत ।
प्रकृति प्रकोप भूचालों जल प्लावन से,
वह दलित त्रस्त पीड़ित ।
ऐसी ही तो नारी है !
वह नियति भाग्य से हारी है ।
किस साहस को लेकर
मैं जाऊं कृष्णा के समीप ।
कृष्णा !
जिस आज्ञा को नितांत असंगत जान,
विरोध नहीं कर पायी ।
इतना भी आत्मबल नहीं जुटा पाई ।
वह ! निरीह नारी थी ।
तडपी, अकुलाई, और भाग्य को ही,
स्वयम को, समर्पित कर पायी ।
वह अबला !
जिसकी आँखों से अश्रु नहीं रक्त छलकते हैं ।
प्रतिशोध की प्रज्वलित ज्वाला में,
अरमानों के ध्वस्त महल सुलगते हैं ।
उन्मुक्त खुले रुक्ष कृष्ण केश ।
चुनौती देते, फुंकारित नागों से लहराते हैं ।
शोषण के ऊष्ण रक्त से भरे छलकते खप्पर को,
वह, अमिय चषक नहीं कहेगी ।
सदियों की इस नृशंसता को,
वह, कड़े दाम में भुनाएगी ।
यह सन्देश, कदापि न,
कृष्णा तक ले जा पाऊंगी ।
उसके तीक्ष्ण प्रश्नों के शल्यों से,
क्योंकर स्वयं को बचा पाऊंगी ।
उसकी आँखों के सागर में,
सोये प्रश्नों के सहस्र फन,
एक साथ फुंकार उठेंगे करने को,
विषाक्त दंशन ।
वह भरी हुई फट पड़ने , जैसी,
एक मौन ज्वालामुखी है ।
प्राणों के साथ ही,
खुल पड़ेंगे उसके खुले क्षत ।
लहरा उठेगा उसकी आँखों में,
पीड़ा का वडवानल ।
यह, “क्षमा !”
मात्र उपहास करेगी उसका ।
उसकी अभिशापित पीड़ित चीत्कार,
नहीं सहन कर पाऊंगी ।
नहीं ! नहीं ! कदापि नहीं !
मैं जाऊंगी उसके पास ।
यह क्षमा,
यदि शुभ नक्षत्र सरिस, रणागन में चमकी होती,
प्रतिहिंसा की ज्वाला से पीड़ित,
प्रतिशोधों के कृष्ण धूम से,
पथ भ्रमित, विगलित, युद्ध-शलभों को,
उचित मार्ग इगित की होती ।
और, पार्थ !
स्वजनों को निरख जो, रोमांचित हो आया ।
कम्पित तन ! व्यथित मन !
शस्त्र त्याग, खडा रहा विषण्ण ।
क्यों उसे कृष्ण ने, निज विराट रूप दिखाया ।
समस्त ब्रह्माण्ड को, एक तृण सदृश्य जतलाया ।
उस महाकाल के, विस्फारित मुख गह्वर में,
पक्ष-विपक्ष दोनों दल,
एक ग्रास का, कण मात्र ही बन पाया ।
जब वह । मन्वन्तर, संवत्सर, युग-वर्ष, ऋतू,
ऋषिगण, नक्षत्र, कविगण,
सबमें था श्रेष्ठ ।
वह नखतों में सूर्य ।
कवियों में उशना ।
ऋतुओं में रसराज,
देवताओं में था देवराज ।
तब क्यों नहीं बदल पाया,
विकृत होता यह समाज ।
क्यों नहीं दी सुमति ।
क्यों नहीं किया उदध विरत ।
गृह-कलह से बड़ी, इस युद्धाग्नि में,
वेदान्त-दर्शन के घृत की आहुति,
डाल-डाल कर, स्वयम प्रज्वलित करने में,
सामधानी का कार्य किया ।
होता अत्याचार किसी का,
होता कोई भी अविवेकी ।
यदि एक उसे, क्षमा कर पाता ।
अमर हो जाती उसकी वह सदभावना  
स्वर्णाक्षरों में अंकित होती वह सौहार्दपूर्ण नेकी ।
वह विराट रूप अथवा विरक्त ।
हुआ जिससे पार्थ स्तंभित ।
एक ही रक्त के, इन बहूरूपों को,
क्या दिखलाना वासुदेव के पक्ष में,
किंचित भी रहा उचित ?
महाकाल !
क्या समय, वस्तुविशेष, जाती वर्ग विभेद,
का करता है विश्लेष्ण ।
एक साथ ही, एक समय में,
उसमें विलीन नहीं हो जाते सचराचर ।
क्या हुआ उन वनिताओं का,
दप-दप दीपित जिनके सिन्दूर मिटे,
हर उल्लसित गृहों के, जगमग दीप बुझे ।
टूटी शंख की सजी चूड़ियाँ ।
निराधार, निरालम्ब गिरी धरा पर,
सुद्दढ़ तरु से बिछु, कोमल नव कुसुमित वल्लरियाँ ।
घन अन्धकार पूरित भविष्य में,
मौन खड़ी, ये जीवित निष्प्रभ छाया ।
अप्रत्याशित वैधव्य और,
हिमपात प्रताड़ित नव-वय की काया ।
यह विराट रूप !
विराग नहीं था ।
यह थी कामदेव की माया ।
जिसने अनर्थक रची,
युद्ध संग्राम के चक्रव्यूह की माया ।
क्या उत्तर है , किसी के पास ?
निराधार क्षुधातुर आर्त विकल, है
भटक रहे, स्त्री-पुरुष, वृद्ध, बल, अबाल ।
यदि यह धर्म युद्ध रहा,
किसी पक्ष ने,
धर्म नहीं अपनाया ।
अवसर पाते ही, मात्र छल से ही,
सफल हो पाया ।वह रणागन ।
मृत, मृतप्राय, क्षत-विक्षत,
आहत, निरुपाय, पड़े कराह रहे ।
ये प्रत्यक्ष जलते तडपते प्रश्न ।
और पत्थर से निश्छल,
मौन खड़े अधूरे उत्तर ।
रौंद रहा समय,
इतिहासों के लोहित उड़ते पृष्ठ ।
क्या यही लक्ष्य रहा जीवन का,
या, यही रही इतिश्री ।
धर्म-अधर्म के द्वन्दयुद्ध में,
प्राप्त यह कुरूप अभीष्ट ।
इस, कटु सत्य के, वीभत्स श्मशान में,
है, धर्म का राज्यारोहण ।
क्या कभी इन टूटी स्वांसों को लेकर,
बढ़ पायेंगे, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के,
गंभीर चरण ।
असत्य की वैसाखी पर,
विकलांग सदा सत्य,
खोज रहा इस श्मशान में,
कहाँ बिखर गया जीवन का सत्य ।
सत्य !
यदि शिवम् है ।
तब वह संहारक नहीं ।
यदि यही वास्तविकता है,
तो वह,
शिवम सुन्दरम का धारक नहीं !



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