मन्त्रपूत यज्ञ की जलती ज्वाला में,
पद्मरागी प्रज्वल्लित ज्वाल शतदल के मध्य,
किसी सुकर्म के श्रेष्ठ श्रेय सी,
अमलां अमल शाश्वत शुभ वरदान सी,
सौन्दर्य-सुधा-कमनीयता की अप्रतीम प्रतिमा,
किजल्क-केशर की तरुण अरुण कलि,
अवतरित हुई थी ।
अगरु धूम हविश्यानों के सुरभित सौरभ-सुगंध से आवेष्ठित,
द्रुपद-सुता ।
म्लान न कर पाई दग्ध तप्त ज्वाला,
उसकी शुचिता, कमनीयता ।
प्रखर प्रदीप्त रही उसकी मुखर तेज़स्विता ।
लावण्या-सुधा के गगन विचुम्बित ज्वारों के अंतराल से,
दे रही थी वह चुनौती,
किसी भी अप्रतीम सौन्दर्य-प्राग्लाभ्य को ।
अगणित ऋतूराजों के नव पल्लवित आनंद-महोत्सव सी,
उन्मत्त प्रमत्त विकच थी,
उसकी अभिलाशाओं की कलिकाएँ ।
झुक रही थी नव-नव अभिलाषायों के,
रस से पूरित,
उसकी आशाओं के नव-गुम्फित लतिकाएँ ।
नारी की, किन प्रतिष्ठित मान्यताएं, उल्लासों के साथ,
हाथों में हाथ दुए, गहन विश्वास लिए,
रखा था उसने प्रथम चरण ।
इस लीलाभूमि-कर्मभूमि के प्रांगण में ।
नहीं ज्ञात था उसको ।
उसके, आकर्णमूल पद्मप्लाक्षों के उन्मीलन से,
जहां, अलसित सस्मित खोल रहे थे पात के पात ।
अगणित जलजात अवदात ।
वहां उन्ही अरमानों के कुवलयों में,
कुंडल डाले बैठा था, छिपा, विषधर नाग ।
उसकी विषाक्त ज्वलित फुन्कारों से,
जल उठे किजल्क जाल ।
डस गया उन्हें, विष से पागल कृष्ण व्याल ।
कल्पना के आप्लावित मादकता से, टकराई,
यथार्थता की तीखी कटु कटुता ।
कोमलता को कुम्हला गयी,
निठुर यथार्थ की कठिन परुषता ।
जो हर घूँट गले से उतरी ।
वह, तृप्ति की नहीं,
अदम्य जलती बढती ज्वाला की थी ।
जिस करुवाहट को घूँट घूँट करती पान,
तन-मन के रिसते विष से,
थे थर-थर कम्पित प्राण ।
वह विक्षिप्त बेसुध,
शनैः-शनैः मन ही मन बिखर बिखर,
जीवन पथ पर बढती जाती थी ।
क्रांति, विद्रोह, आक्रोश की साक्षात,
प्रतिमा सी थी, द्रुपद-सुता ।
और पृथा !
किसी दिव्य अलभ्य ज्योति की,
दोनों ही थी, आगे, पीछे पड़ती छाया ।
एक दुःख 1
एक शाप !
एक ही मनः ताप !
एक ही विषाक्त शल्य था,
बेधित दोनों के अंतर में ।
किसी कठिन राग के आरोह अवरोह सी,
दोनों की थी, एक ही कथा,
एक ही व्यथा ।
वह पृथा !
जिसका धर्मनिष्ठ जीवन होता था व्यतीत,
अध्ययन, पूजन-अर्चन और स्तवन में ।
था शुभ कर्मों में जीवन यापन,
देवगणों, ऋषिओं का विधिवत आराधन ।
था मधुर शुचि किशोर भोलापन ।
नव-वयस की निश्छल जिज्ञासा ।
मन्त्र-पूत सृका से सूर्यदेव का आहावन ।
कर गया वज्रपात ।
हो गया क्षार ।
असंस्पर्षित कुमारी-कुसुमदल का लहराता उपवन ।
यदि वस्तुतः सत्य में, सात्विकता, शुद्धता
देवत्व की महत भावना, रही होती, इन देवगणों में ।
लोलुप से नहीं ये विचरते ।
गौतम के तपोवन में,
बृहस्पति के आश्रम में,
नहीं खड़े रहते, च्यवन ऋषि, का सुन्दर स्वरूप बनकर,
सुकन्या के वर-चयन में,
या तुलसी-वृंदा के राजभवन में ।
सदा आत्मा का उद्भासित प्रखर प्रकाश,
करता इन्हें निषेध,
अनुचित, अमर्यादित कार्य करने को ।
किन्तु, ये देवगण !
कितना दीन, अकिंचन, हीन, पतित हैं ।
इनका स्वेच्छाचारी मन ।
दशानन ने भी किया था,
जनक-सुता का हरण ।
किन्तु सदा, निज पत्नी के सम्मुख,
किये उससे संभाषण ।
वह भी मर्यादा और सीमा में था ।
यह सूर्य !
कहने को असुर नहीं, सुर था ।
अपनी तेजस्विता में प्रखर, प्रबल था ।
निषेध कर सकता था, भोली सुकुमारी को ।
परिणाम अवगत कर,
आवाहन के निमित्त प्रतिरोध, लगा सकता था ।
उसकी प्रतिष्ठा सुरक्षित रख
अपना सम्मान बढ़ा सकता था ।
पर कहीं पर भी हो,
रमणी !
उचित अनुचित संगत असंगत सब भूलकर,
इस आकर्षण में,
नहीं होता इनसे,
निज संयम का संवरण ।
पृथा का अपना ही सौन्दर्य हो गया अभिशाप ।
डस गया उसे विषधर व्याल ।
मातृत्व की मौन कारा में,
निर्ममता से कुमारी को डाल,
चला गया सदा के लिए,
कठोरता से उसे त्याग ।
तड़पती रही पृथा,
शाश्वत अपमान लांछना तिरस्कार की,
असह्य ज्वाला में ।
क्या था अधिकार,
समस्त ज्ञान के अध्येता पारंगत देव को,
यह साहस करने का,
छलने का निश्छल भोले कौमार्य को ।
करना था उसे ग्रहण उत्तरदायित्व,
एक कुमारी माता, अनाम पिता के पुत्र का ।
देना था परिचय अपने आत्मबल का
अपनी उच्चता का ।
किन्तु, कृष्णा और पृथा,
दो जलती हुई अलभ्य रेखा है ।
जल उठे समस्त तर्क,
ज्ञान-विज्ञानं, इतिहास, धर्मग्रन्थ और पुराण ।
रख दिया इन्होने सबके सम्मुख ।
कितनी नगण्य है नारी,
क्या है उसका सम्मान ।
कोई भी स्पष्टीकरण निर्मूल है ।
संस्कृति के ह्रदय में चुभा,
यह एक भयानक शूल है ।
इन्होने सहा ही नहीं अपितु,
परोक्ष में प्रतिनिधित्व किया है ।
नारी की, मर्दित मर्यादा, दलित स्वाभिमान,
और दारुण पीड़ा का ।
इस स्थिति में इस प्रकार,
किसने इन्हें पहुँचाया था ।
उन्हें, क्रमशः अपमानित, लांछित कर,
निर्ममता से,
उच्च पुनीत-पूजन-पीठिका से,
बर्बरता से नीचे गिराया ।
अपितु, इतना हे नहीं,
नए सन्दर्भों, नयी परिभाषाओं के साथ,
सतीत्व और पातिव्रत का पाठ पढ़ाया ।
गरिमा, शालीनता, प्रतिष्ठा, तेज़स्विता के,
उच्च मंच पर अवस्थित, नारी को,
वर्जित नाम । निषिद्ध रेखा पर ठहराया ।
दोषी कौन ?
यज्ञ की ज्वालाओं में अम्लान कलि सी,
अवतरित, वह देवि !
पूजन आराधन, यज्ञ हवन को पूर्ण समर्पित,
वह राजकुमारी ।
उनकी पावनता शुचिता का,
ऐसा घृणित विनिमय क्यों हुआ ?
इस पाशविकता-पूर्ण मूल्यांकन का
उत्तरदायित्व किस पर है ?
यह निति नैतिकता धर्म की पाखंडिता
कब क्या रूप लेगी ?
इनकी विकलांगता, अपंगता, स्वार्थ-परक हाथों में,
कितनी क्षत-विक्षत आक्रांत, होती रहेगी ।
इनकी धर्म, सतीत्व और पतिव्रता की,
बदलती विकृत परिभाषा में,
क्या कोई भी द्रुपद-सुता,
सीता की भांति द्दढ़ता से कह सकेगी ?
“ कर्मणा, मनसा, वाचा,यथा, नातिचराम्यहम ।
राघव सर्व धर्मज्ञ तथा माँ पातु पावकं । ।”
एक ही स्थिति और स्वरूप में,
इनके द्विरेफिय अथवा बहुमुखी,
परिवर्तित होते विधान ।
नारी को, कुम्हार के अनवरत चलते,
चाक पर अवस्थित कर ।
कितने और किन रूपों में
बनाता, बिगाड़ता, फेंकता रहेगा ?
हर बार, कुचलती, पिसती,
नए-नए रूपों में उतरती,
कबतक, विवश, निरुपाय,
दिग्भ्रांत भटकती रहेगी ?
किस बिंदु पर आकर, सहसा,
इनके सब नियम भंग हो जाते हैं ।
कब अपनी अपंग निति पर,
ये, उतर जाते हैं ।
सर्वत्र बिखरी है इनकी दम्भपूर्ण, नृशंस अंधी निति ।
मात्र झंकृत होती हैं, इनकी बेड़ियों से,
बंदिनी, नारी की बेड़ियाँ सभीत ।
समस्त, बौद्धिकता की उर्वरता,
नारी-शोषण में ही केन्द्रित कर,
अपने पौरुष की कठोर उर्वरता को जतलाया है ।
अन्यथा, धर्म की किस निति और व्याख्या पर,
पांडू की, धर्म समाज-स्वीकृति मुहर लगाकर,
पांडव, देव-पुत्र होकर भी,
पांडव कहलाये ।
और कर्ण !
देव-पुत्र होकर भी,
सब अधिकारों से वंचित रह जाए ।
पृथा-पुत्र तो सब ही थे,
यद्वपि वे देव-पुत्र थे ।
किन्तु सारे नियम मात्र सूर्य-पुत्र ही पर आकर,
क्यों इस प्रकार, विराम पा जाए ।
क्योंकि कर्ण !
लंछिता, भयभीता, किसी गहन अन्धकार में छिपी,
निरीह सहमी हिरनी का, अबोध मृग-शावक था ।
नहीं शीश पर उसके , कोई सुद्दढ़ वरद-हस्त था ।
नहीं कोई, उच्च राजवंश उसका अभिभावक था ।
कैसी पक्षपातपूर्ण निर्णयोंक्ति थी, इन धर्म-वेत्ताओं की ।
कौन सी कुलीनता, निष्कलंकिता,
शेष बची थी, इन राजवंशों में ।
किस जाती,धर्म, सभ्यता, समाज, वर्ण का रक्त,
नहीं प्रवाहित था इनकी रगों में ।
मेनका, उर्वशी, गन्धर्व, किन्नर,
जाने कितनी नृत्यांगनायें, अप्सराएं,
अथवा शूद्र कन्यायें थी,
इनके पूर्वजों की पत्नियां और माताएं ।
कैवर्त कन्या, योजनगंधा, सत्यवती, शांतनु की पत्नी ।
व्यास थे जिसकी संतान ।
पिता थे उनके पराशर मुनि महान ।
उसी शांतनु की पुत्र-वधुओं के आत्मज थे,
ये, व्यास से उत्पन्न, धृतराष्ट्र, पांडू, विदुर ।
नहीं किसी ने उठाया अपवाद ।
नहीं किसी ने किया विवाद ।
ये प्रभुता संपन्न, सुद्दढ़, अडिग, यशस्वी,
बलशाली शासनकर्ता थे ।
शासन की डोर थी इनके हाथों में ।
ब्राह्मण धर्म समाज,सबके पोषक,
सब प्रकार से उनके पालक,
उनके दाता थे ।
इनमें इनका छिद्रान्वेष्ण करने
अथवा इनकी कुलीनता निष्कलंकिता को
चुनौती देने का साहस,
इन चाटुकारों में नहीं था ।
इनपर राजसत्ता की ठोस मुहर लगी थी ।
सोते हुए सिंह को जगाने की, भला किसे पड़ी थी ।
धब्बो वाले प्रचंड सूर्य के, दाग को कौन देखता है ।
किन्तु, शीतल चांदनी बिखेरता चाँद,
अपने क्षतों से कलंकी ही कहा जाता है ।
दोषी, सत्यवती नहीं थी ।
उस कैवर्त कन्या की,
भीष्म के ब्रह्मचर्य का मूल्य देकर,
शांतनु ने ग्रहण किया था ।
मेनका भी अपराधिनी नहीं थी ।
उसका तो कार्य ही तपःभंग था ।
और विश्वामित्र-मेनका की आत्मजा शकुंतला,
वह भरत वंश की प्रथम श्रृंखला थी ।
पुरुरवा की प्रियतमा उर्वशी ।
वह भी दोषी नहीं ।
उसकी संताने भी निष्कलंक थी ।
क्योंकि सम्राट की मोह-रज्जू,
गलत नहीं हो सकती ।
समर्थशाली दोषी नहीं होता ।
मात्र, दोषी थी ।
कृष्णा !
दोषी थी ।
पृथा !
क्योंकि, ये उन सुविधाओं से वंचित थी,
जिससे, सत्यवती, मेनका, उर्वशी, शकुंतला, सुरक्षित थीं ।
अतः !
इन अरक्षिता, पीडिता, एककिनी, नारियों के संवेदक,
न देवगण थे, न राजवंश, न समाज ।
अपनी सत्यता के मूक साक्ष्य से
ये निरुपाय, असहाय थी ।
जलती धरती, जलती बौछारों में,
समस्त दोषारोपण को, विवश,
मौन सहन करने के लिए,
बलात खड़ी रहीं ।

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