Sunday, 1 July 2012

सर्ग 8 : शुभ आह्वान !


अब भी
समाज की रूपरेखा, मानसिकता,
न बदली है और न बदलेगी ।
परिवर्तित होता है मात्र परिवेश ।
वह, यों ही परिवर्तित होता रहेगा ।
सामाजिकता, सभ्यता, रूढ़िवादिता,
अपनी विकृतियों के साथ,
नित्य,
प्राचीनता की जीर्णावस्था पर,
आधुनिकता का क्षद्म्वेशी रूप,
डालती रहेगी ।
गलित समाज की धमनियों में,
दौड़ता दूषित रक्त,
कभी भी स्वच्छ वायु से,
स्वस्थ न हो पायेगा ।
साक्ष्य दिया जाता है,
कौरव-पांडव के द्यूत-कला का ।
लानत दी जाती है,
उस युग की पतितवस्था,
और सामाजिक सरंचना की ।
किन्तु क्या ?
द्यूत-कला के रूप, अब भी ,
उसी प्रकार,
मानवता का व्यंग नहीं बने हैं ।
क्या किंचित भी वह परिवर्तित हो पाए ?
नाना-विधि के समारोहों के मिस,
मंगल कृत्यों के माध्यम से,
अब भी वही क्रम चलता है ।
समय की शतरंजी पर,
अवसर-वादिता का दाँव लगता है ।
पद-गौरव, प्रोन्नति, वांछित प्रलोभनों की उपलब्धिओं के हित,
हर पांडव, बिना झिझक, बिना हिचक,
स्वाभिमान और लज्जा को त्याग कर,
स्वयं सम्मुख आकर,
अपनी द्रुपद-सुता को,
सहर्ष दाँव पर लगाता है ।
आश्चर्य !
इन बाह्य चकाचौंध में भ्रमित चकित,
ये नारियां !
सदियों से तिरस्कृत होती हुई भी,
निज वांछित अभिसिप्त सम्मान अधिकार को,
पहचान नहीं पायीं ।
विश्वमोहिनी बनाने की दीन स्पर्धा में,
गृह-लक्ष्मी की गरिमा खोती गयीं ।
नित बदलती नयी मान्यताएं,
नयी उपलब्धियां ।
नए दृष्टिकोण ।
बिना उन्हें समझे । बिना उन्हें तौले ।
आँख मूँद कर,
केवल है एक लक्ष्य ।
पुरुषों से होड़ ।
पर यह क्यों ?
जिन्होंने सब प्रकार से कुचला, अपमानित किया,
उन्हीं की पतित भावनाओं को,
उनके ही अनुरूप बनाने की,
उनको ही लक्ष्य बनाकर,
उनके समीप पहुँचने को,
यह कैसी आकांक्षा है ?
तुम्हारा स्वयम का अप्रतीम स्वरूप,
क्या किसी से कम है ?
निज संस्कृति, सभ्यता को हेय समझकर,
बाह्य रंग-रूप, परिवेश भाषा अपनाना,
मात्र, हीन भावना से पूरित दासता है ।
शिक्षा का तात्पर्य,
ज्ञान का संवर्धन, संस्कारों का परिष्करण,
उच्च भावनाओं का परिमार्जन है ।
संकीर्ण, स्वार्थ-परक आत्मकेन्द्रित मनोवृत्तियों,
का निवारण है ।
बाह्य परिवेश, आचार विचारों का, अविवेकपूर्ण अनुसरण,
न आधुकनिकता है, न बौद्धिकता है ।
तुम ! कहती हो !
तुम आधुनिक हो ।
समय की धडकन पहचानती,
उसके अनुरूप विचार ग्रहण करती हो ।
और जैसी होती है पुकार समय की,
वैसा ही उत्तर देती हो ।
किन्तु देखो !
निज स्वाभिमान का गला दबाती,
उसको पैरों से कुचलती,
उसपर ही खडी,
बाहर-भीतर से नितांत खोखली ।
क्या तुम, आधुनिक विदेशी रंगों से सज्जित,
रंगी हुई, काठ की पुत्तलिका नहीं हो ?
कहाँ है तुम्हारा अपना रूप ?
कहाँ है विश्व को चमत्कृत करता,
बौद्धिकता की प्रखरता का,
गरिमामय वह स्वरूप ?
यज्ञ वेदिका के सम्मुख,
स्वरचित मन्त्रों और ऋचाओं से,
पुरुष के समकक्ष एक साथ,
करती थी तुम प्रज्वलित,
 मंत्रपूत यज्ञ की ज्वालायें ।
तुम्हारी बौद्धिकता, अकाट्य तर्क से रहते थे,
बड़े-बड़े ब्रह्मवेत्ता, आत्मतत्वज्ञा, त्रस्त चकित ।
मैत्रेयी, घोषा, अपाला और गार्गी से,
किसका था साहस, तर्क करने अथवा टकराने का ।
इसी मैत्रेयी ने प्रश्न किया था-
“ ये नाहं नामृतास्या किमहं तेन कुर्यां” ।
न ही वांछित नश्वरता का वैभव, जो है मात्र आत्म-पराभव ।
प्राप्त हो सके अमरत्व जिससे,
प्रदत्त करें वह ज्ञान ।
और वचक्तु-आत्मजा गार्गी ।
“अक्षर-ब्राह्मण” की निष्णात विवेचिका ।
याज्ञवल्क्य जैसे आत्मवेता को भी,
उसकी ही अंतिम निर्णयोंक्ति स्वीकृति थी ।
इस प्रकार विद्वता, बौद्धिकता के,
उच्च मंच पर वह अधीष्ठित थी ।
समस्त निरुत्तर हुए आत्मवेत्ताओं से
विजयी याज्ञवल्क्य का,
मात्र वही एक अकाट्य उत्तर थी ।
यह “नारी मुक्ति” का घोष कितना बेसुरा है ।
जब स्वयम ही अपनी दुर्बल मानसिकता में तुम बंदी हो ।
‘मुक्ति’ !
कहाँ  है मुक्ति ?
आज के सन्दर्भों में ।
कर्तव्य, उत्तरदायित्वों से पलायन ।
अदूरदर्शितापूर्ण अंध-अनुकरण ।
उद्देश्यरहित, निरंकुश जीवन,
व्यर्थ में पाश्चात्य आडम्बरों का अनुमोदन ।
यह मुक्ति नहीं है ।
मुक्ति है !
उन्मुक्त करो ज्ञान के अवरुद्ध कपाट ।
अपने स्वाभिमान, गौरव, प्रतिष्ठा का,
अपने जीवन की मूल्यों का,
पुनः करो स्थापन, मूल्यांकन ।
अधिकार !
दया से, दुर्बलता से, नहीं प्राप्त होता ।
अपनी योग्यता स्वतः उसे,
प्राप्त कर लेती है ।
कोई अवरोध नहीं रुद्ध कर सकता ।
शक्ति, शक्ति को खींच लेती है ।
निरखो !
सब ओर से ध्यान खींचकर,
एकाग्रचित्त होकर, निज मन के दर्पण में,
अपाद-मस्तक, निज छवि ।
इस महान संसृति की तुम हो सर्वोच्च कला ।
सृष्टि की प्रथम नव-स्फुरण को,
तुम्हारा ही अलभ्य उपहार मिला ।
तुम आदि शक्ति,
पुरुष की प्रकृति ।
सम्मोहन की अनुपम कृति ।
तुम सोम-सुधा ।
तुम स्वाति का कण ।
क्षण-क्षण रूप बदलती रमणीयता की,
तुम अमल नवल धड़कन । निरख !
सर्वांगपूर्ण लावण्यमयी इस प्रतिमा को कहा श्रृष्टि ने-
“कला-नैपुण्य का यह है अंतिम रूप ।”
“पूर्णमिदम” की इस संज्ञा में,
नहीं कोई भी कहीं चूक ।
अजेय असुरों के, अनिवार्य अटल पराजय का कारण ।
अमोघ सम्मोहन ! अचूक मारण !
तेरे सम्मोहन के, गर्वोन्नत लहराते लावण्य-जलधि में,
विश्व-मोहिनी का रूप संवारने के निमित्त,
विष्णु ने भी आकर,
निज रीती गागर यहीं भरे ।
रूप अजेय है नारी का,
नहीं कोई अन्य विकल्प,
असुर पराजय का ।
अतः, बनकर भुवन मोहिनी,
किया विमुग्ध, सुर, असुर, देव, किन्नर, सचराचर ।
तू वह शक्ति !
कर रही संतरण जिसमें,
संहार-सृजन ।
अगणित जीवन और मरण ।
तू !
इस चिरंतन सृष्टि का,
है अथ, इति ।
महाप्रलय के हुन्कृत ज्वारों में,
गूंजता वह एक ही स्वर-
“ॐ” ,
तू ही है ।
तू शुभ स्वस्तिमय मधुमय वरण ।
सृष्टि का, उत्तर-रहित अंतिम चरण ।
तू ! शिव के मस्तक पर लहराती गंगा ।
तू कृष्ण की राधा ।
अग्नि-परिक्षा की सीता ।
तू दक्ष-यज्ञ की सती ।
यम को निरुत्तर करने वाली सावित्री ।
तेरी एकनिष्ठता, कर्त्तव्यपरायणता,
वत्सलता, शालीनता और कोमलता,
स्पर्श-रहित है ।
उसकी पराकाष्ठा कोई छू नहीं सकता ।
समस्त परीक्षाएं पुरुषों के लिए नहीं,
मात्र तेरे प्रति रही ।
कहीं भी तू थमी नहीं ।
तेरा तेज़ ! तेरा सत्य !
कोई सह सका नहीं ।
सदा त्रस्त रहे, देव, दानव, असुर, किन्नर ।
अतः इसी से, पा
षाणी अहल्या का दण्ड,
शालिग्राम बनकर,
विष्णु को ग्रहण करना पडा ।
तुलसी वृंदा के सत्य-तेज़ के सम्मुख
पत्थर बनकर रहना पडा ।
तूने अनुसुइया बनकर,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को,
माता सरिस, निज गोद में खिलाया ।
कहाँ कोई तुझसे बच पाया ।
ओ ! कल्याणी !
सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी !
सभी, तुझमे समाहित हैं ।
द्द्ढ़ संकल्पों से बढ़ा निज,
अलत्तक-रंजित, शिंजिनी झंकृत,
शुभ स्वसिमय चरण ।
सुन्दरम सत्यम शिवम् का कर मधुमय वरण ।
संस्कृति के अमल विमल सुप्रभात का,
तू ही है, अलभ्य आभरण ।
मत निरख अकिंचन से,
अस्ताचल की, डूबती, लुभावनी अंतिम किरण ।
पूर्व के ही प्रखर उदित प्रकाश में,
कर रहा विश्व संवरण ।
सबके याचक से फैले हाथों में,
दिया हमने ही है, ज्ञान का जीवन-कण ।
अतः अग्रसर हो आगे ।रख,
निश्चित, निर्भीक, सुद्द्ढ़ कदम ।
अन्नपूर्णे ! सम्पूर्ण शक्ति सम्भूते !
कर अमित-कलश से,
जीवन-दान ।
कर !
सत्यम, शिवम्, सुन्दरम का शुभ आह्वान !



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