ज्ञात
है तुझे !
नीच
दुःशासन ने,
किस
प्रकार अपमानित किया मुझे !
अन्तःपुर
से, केश पकड़ आँचल खींचता ,
मुझ
गिरती पड़ती, रगड़ती,
धरती
पर घिसटती , नारी को,
वह
पतित.
भरी
सभा के मध्य ले आया.
उस
निर्लज्ज के अट्टहास के प्रतिघातों से ,
प्रस्तर की ऊंची
प्राचीरों का भी,
अंतरतम
तक थर्राया .
लज्जानत
थी जन-संकुलित सभा.
अशोभन
कृत्य के प्रति !
घोर
निस्तब्धता थी छायी.
इन
सबके के ऊपर, कुटिल नियति की,
काली
छाया थी लहराई.
वहाँ
उस विशाल प्रांगण में,
अपने-पराये,
स्वजनों, गुरुजन, पति, पुत्र,
सब
स्तब्ध, करबद्ध ,
पत्थर
से निश्चल, मौन खड़े थे.
घोर
लज्जा,आक्रोश, विवश अपमान से,
रुदन
करती अश्रु से निज मुख धोती,
रक्षा
हेतु एक बार देखा मैंने
कातर
दृष्टि से सबकी ओर.
किसी
में तो साहस होगा ,
उबलता
होगा असंयत शेष. पक्ष-विपक्ष,
कोई
तो प्रदर्शित करेगा,
इस
अधर्म के प्रति गहरा क्षोभ.
किन्तु
वाह री विडम्बना !
किसी
ने भी आगे बढ़कर नहीं किया
इस
घोर पाशविकता का विरोध.
पुरुष
का पौरुष भी,
कुछ
अर्थों में होता है.
एक
ओर दीन अबला पर,
अपना
पौरुष.
नीच
दुःशासन कर रहा था प्रदर्शित.
दूसरी
ओर, अपने स्वजन,
ये
पांच पांडव.
कर
रहे थे प्रगट निज पौरुष, रह कर मौन.
यह
पुरुष ! अपना समस्त पौरुष !
अपना शौर्य. निर्बल पर ही निचोड़ देता है.
जो
दुर्बल हुआ, उसे दलित कर,
पीसकर
झकझोर देता है.
जब
मैं .
आशाओं
अभिलाषाओं की खिली कली सी,
पांडव-द्वार
पर आई थी.
“
माता की आज्ञा”
पाँचों
पांडव पर,
मुझे
उपहार समझ,
आशीष
सरिस मुस्काई थी.
उस
दिवस मैं आहत आक्रांत त्रस्त विपन्न.
जब
प्रांगण में दीन खड़ी थी.
कहाँ
गयी थी “ माता की आज्ञाएं”
क्यों
वे मूक रही ?
“
माँ की आज्ञा.” उचित, अनुचित,
सब
स्थिति में सर्वोपरि थी.
क्यों
नहीं गांधारी ने,
निषेध
किया दुर्योधन को,
अथवा,
यह
कार्य नितांत अप्रिय है उसकी माता को.
यह
भी जान, किया क्यों नहीं परित्याग,
अपनी
इस मदान्धता का .
और
ये.
आज्ञाकारी
पांडव !
मात्र
पति बन सकते थे.
माँ
की आज्ञा के परोक्ष में,
घोर
अधर्म कमा सकते थे.
इनकी
दृष्टि में, नारी . पत्नी ही नहीं,
लक्ष्य-सिद्धि
का माध्यम भी थी.
वह
उपहार सरिस,
हस्तांतरित
हो सकती थी .
दांव
पर लग सकती थी.
मैं
! वहाँ अकेली,
जन-संकुलित
सभा के मध्य,
एक
जलता प्रश्न .
एक
सबल चुनौती नहीं थी ?
इतनी
नगण्य थी नारी.
पृथ्वी
पर भू लुंठित वह.
निज
लज्जा के रक्षार्थ तड़प रही थी.
अपरिमेय
परम बलशाली, सर्वश्रेष्ठ योद्धा ,
उस
युग के, शांत निश्चेष्ट मौन खड़े,
न्याय,
धर्म की विजय देख रहे थे.
उनकी
वह नारी.
जो,
द्रुपद-यज्ञ के मन्त्रपूत
ऋचाओं
हविश्यानों के मध्य अवतरित हुई,
उनके
अदम्य पौरुष,
युद्ध
नैपुण्य की पारितोषिक थी.
वही,
उनसे उनके शत्रुओं से,
शरण
मांगती, दया की भीख मांगती
असहाय
सी ,
धरती
पर अपने बिखरे केश रगडती,
बिलख
रही थी.
जिनके
अत्याचारों से वह पीड़ित थी ,
उन्ही
से वह,प्रतिकार चाह रही थी.
सत्य,
धर्म, न्याय के भी ऊपर,
नारी
की लज्जा कहीं बड़ी थी.
पति
ने, पत्नी का अधिकार नहीं दिया.
अपनी
सबल भुजा
उजर्स्वित
पौरुष का, आधार नहीं दिया.
उस
घर्षण संघर्षण में,
टूटकर
गिर रहे थे सुहाग शंख के चूड़े.
यदि
हो उठते विषधर तक्षक नाग.
कहती
उनसे फुन्कारों.
निज
विषाक्त ज्वाल से ,
भस्म
करो, निर्लज्ज सभा को आज .
होती
कोई कशा इन हाथों में,
इन
मिथ्या न्याय धर्म
सत्य
के पाखंडी पुजारियों का,
यह
कायरतापूर्ण मौन .
कर
देती भग्न, तीव्र कशाघातों से.
ये
अहंकारी पुरुष. सत्य के नाम पर,
सत्य
का ही गला कुचलते खड़े थे .
वह
धर्मराज युधिष्ठिर .
कहाँ
गया था उनका वह सत्य.
जब
पार्थ की पत्नी पर
अपना
भी सत्व जताया था.
कहाँ
गया था धर्म ?
जब
अपनी आश्रिता को.
दांव
पर लगाया था.
ये
गलित पतित , दम्भी .
पत्नी
को उपहार समझकर
कई
का उपभोग्य बना सकते थे .
राज्य-लिप्सा
की मदान्धता में
भरी
सभा में अपनी नारी को
लज्जारहित
देख सकते थे.
ये
अपनी ही आत्मा का हनन करने वाले.
अपनी
ही नैतिकता के पतित होते
नागपाश में आबद्ध, विवश मौन थे.
धर्म
और सत्य के नाम पर नहीं.
ये
आत्मबलरहित कायर अकर्मण्य थे.
मेरी
कर्त्तव्यपरायणता सहिष्णुता के प्रति भी
किंचित आभार नहीं प्रगट किया.
इस
घृणित अत्याचार का,
प्रतिकार
नहीं किया.
अपितु,
ये स्वाभिमानरहित .
दांव
लगी पत्नी की दयनीयता.
हारी
बाजी की निर्लज्ज विवशता.
न्याय
धर्म का मिथ्या मुखौटा पहने
मौन
जड़ देख रहे थे.
मानवता
की उच्च-पीठिका से पतित ये पांडव.
अत्यंत घृणित विकृष्ट कांतिहीन हुए थे.
यही
नहीं !
इस
आभिजात्य कुल
कौरव-दल
के गौरव का,
प्रचंड,प्रकृष्ट,प्रखर,
जाज्वल्यमान मार्तण्ड .
कलंक
कालिमा के राहू से ग्रस्त,
मलिन
होकर दीन छविहीन हुआ था.
समस्त
ज्ञानदर्शन के मनीषी अध्येता.
पंडित
ब्रह्मवेत्ता गुरुजनों को,
मेरी
इस घोर विपत्ति में भी,
आसन्न
कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं हुआ.
किन्तु
उन्हें तत्क्षण
कौरव-राजकुल
का “नमक” स्मरण हो आया .
उसी लहराते लवण-सागर में,
उन्होंने,निज
स्वाभिमान, आत्मबल,
नीति, अनीति, औचित्य को सहज डुबाया.
क्योंकि,
निर्बल
सबका भक्ष्य है.
उसका
रक्षक कोई नहीं.
प्रकृति
भी निर्बल को ही अहेर बनाती है
और
, सबल को भेंट चढाती है.
व्याघ्र
के मुख में मृग,
बाज
के पंजों में शुक होता है.
यदि
ये मेरा पक्ष लेते,
राजकुल
से प्राप्त, सुख स्मृद्धि से,
तत्काल
वहीँ वंचित होते .
किन्तु
उन्हें निज वैभव संपदा का,
दारुण
लालच घिर आया.
अनोखा
ही कोई होता है.
जो
सत्य धर्म, निभाने के हित,
संकट
में घिर जाता है.
यदि
चाहते तो वे,
निज
अप्रसन्नता विरोध और रोष जताकर,
मेरा
जाता सम्मान बचा लेते.
पक्ष
नहीं लेते विपक्षी पांडव का,
पर
कौरव के कालिख लगते मुख को,
उज्जवल
कर जाते.
सबकी
ओर से दृष्टि हटाकर देखा,
अंतिम
अवलंब,
सूर्य-पुत्र
की ओर.
जिसकी
दानवीरता के भार से,
स्खलित
हुआ देवराज का सिंहासन भी, गौरवशाली !
स्वर्ग
और धरा दोनों ही,
भूचालों
से हो उठे थे विचलित,
सुर,
नर,गन्धर्व, किन्नर
सब
हो उठे स्तंभित !
वह
! सत्य दान दया का वैभवशाली.
क्या
यश याचक दृष्टि.
लौटेगी
उसकी समीप से भी खाली ?
मौन
था सूर्यपुत्र !
पर
फट पड़ने जैसा था,
उसका
अदुर्द्मनीय रोष,
आरक्त
नयन.
था
क्रोध से कम्पित तन-मन-गात.
थे
कसे जबड़े.
दांतों
से दबे अधर.
एक
बार घूम कर उसने देखा
जन-संकुलित
सभा की ओर.
अस्त्र
की ओर बढ़ते उसके कर.
रुके
सहसा,
घोर
विषाद की छाया,
मुख
पर घिर आई.
झुका
उसका उन्नत शीश.
जल
उठे, आरक्त नयन
आये
जल कण .
पलक
नत धरती पर जम गयी.
यह
अंतिम संबल भी टूट गया.
सब
ओर से मैंने निज को.
घोर
विपत्ति में घिरा पाया.
अब
भी मेरे पूज्य पति !
मौन
खड़े थे.
सोचा
होगा.
मूल्य
नहीं जिसका,
व्यर्थ
उसकी चिंता करना.
नारी
! मात्र एक अस्त्र है,
पुरुष
की, राजनीति,
कूटनीति,
घातों-प्रतिघातों का .
यह
!
पत्नी
बनती है .
प्रेयसी
बनती है.
विषकन्या
बनती है.
जब
जैसी होती है मांग समय की,
वह,
उसके अनुरूप सहज ही ढलती है.
वह
तो, कार्यसिद्धि का मात्र एक प्रयोजन है.
चाहे
वह,
देवी
हो ! अप्सरा हो ! किन्नरी हो ! मानवी हो !
उसका उपयोग बड़ी सुगमता से,
सुर,
असुर, दानव, मानव, किन्नर , गन्धर्व, सबने,
निज
लक्ष्य प्राप्ति के हित में किया है.
राज्य,
स्त्री, वैभव !
कभी
किसी एक का नहीं हुआ.
नारी
को !
निज
भुजाओं के बल की चुनौती देता
कोई
भी,
सबके
मध्य से हरण कर ले जाता है.
एक
रक्त-चन्दन के ऊपर निज हाथों से,
सीमन्त
पर,
दूसरा
रक्त चन्दन जड़ देता है.
यह
सिन्दूर !
अपनी
समस्त पवित्रता, गरिमा का,
स्वयं
, कुटिल व्यंग्य बन कर रह जाता है.
यह
सम्पूर्ण निरर्थकता !
अदुर्दमनीय बर्बरता की संत्रासमयी
निरंकुशता
के परुषता की
करुण
कथा कह जाती है.
यदि
वस्तुतः
कुछ
भी मूल्य रहा होता उसका अपना !
निश्चय
ही,
सत्य
धर्म के संरक्षकों ने
औचित्य
के नाम पर,
“नारी
मुक्ति” का घोष किया होता ?
उनकी
दृष्टि में,
वह
!
एक
पारितोषिक, एक उपहार,
हस्तांतरित
होने वाली
असंवेदनशील
वस्तु मानी गयी .
जिसका
उपयोग,
शत्रु-मित्र
दोनों के हित में था.
किन्तु
! वे महापुरुष !
जिनकी
कीर्ति का जय-घोष !
आकाश
और अंतरिक्ष विदीर्ण करते थे.
जो,
धर्म दर्शन नीति के पारंगत थे,
वे
मनीषी ! मानव-संवेदनाओं से पूरित,
उच्च
बौद्धिकता की गरिमा से अधीष्ठित .
धर्म,
ब्राह्मण , वेदों,
उपनिषदों
की दुहाई देने वाले !
धर्मज्ञ
ब्रह्मवेत्ता नैतिकता के पोषक.
गुरुजन
और स्वजन !
ऐतेरेय
ब्राह्मण के
इस
श्लोक को भी भूल गये थे !
“सा भावयित्री भावयित्वा भवति.”
अथवा
“पतिर्जाया प्रविष्टि गर्भो भूत्वा मातरम् .”
इसे
ही स्मरण कर,
अपनी
जननी
अपने
आत्मजों की माता पर दयाकर,
रक्षा
नहीं कर सकते थे ?
कहाँ
गया था उनका ?
संसार-चमत्कृत
करने वाला,
वह
अदम्य पौरुष !
उस,
उफनाते महार्णव के भंवर में
चक्कर
खाती, आकंठ डूबती,
मैंने
.
उस
कल्मष-रहित
हिरण्यगर्भ
अनादि अनन्त ,
चिर
शाश्वत प्राणों के स्वामी.
अशरण-शरण
अन्तरयामी को,
दीन
आर्त होकर वहीँ पुकारा.
“
मेरे आँसू !
तेरी
आँखों से छलक रहे हैं.
मेरी
पीड़ा, तेरी पीड़ा है .
फिर
क्यों प्राण यों तड़प रहे हैं.
तेरा
ही हूँ अंश.
मात्र
एक कण हूँ .
उस
लहराते महार्णव की
छोटी
सी बनती मिटती लघु लोल लहर हूँ.
अपने पर
यह कैसी निर्ममता है.
मुझमें
तुझमें कहाँ विषमता है ?
निःसंग
तूने भेजा.
निःसंग
मुझे यहाँ किया.
ममता
के सारे बंधन, निर्ममता से टूट गए,
सभी, भरोसे के सुदृढ़ हाँथ,
घोर
विपत्ति में छूट गए.
सारी
ममताओं से आहत एकाकी.
मैं
तेरे चरणों पर हूँ यहाँ पड़ी.
जन्म-जन्म
का केवल ,
तेरा
मेरा नाता है.
तुझे
छोड़ अन्यत्र कौन कहाँ जा पाता है.
मैं
परित्यक्ता दीन अरक्षिता हूँ .
तू
मेरा स्वामी ! मेरा दाता है.
स्वजनों
ने बड़ी कठोरता से,
खींच
लिया किनारा.
मात्र
तू ही, एक सहारा.”
सहसा
!
उस
घन-अन्धकार के जल-प्लावन में
किसी
ने अति कोमलता से मुझे सम्भाला .
कभी
निज घायल ऊँगली में बंधे,
मेरे
आँचल के चीर को,
वह
उचित समय पर लौटाने आया .
एक
चीर !
सहस्र
चीर !
अगणित
चीर !
सर्वत्र
बिखर कर ,
आकाश
,धरा तक लहराया .
वह
!
मेरा
जन्म-मरण का चिरंतन स्वामी.
मेरी
रक्षा को,
कड़े
समय में, दौडा आया .
अधर्म
के,
मलिन
कलुषित वीभत्स प्रांगण में,
दिव्य
प्रकाश आलोकित कर्ता,
शुभ-स्वस्तिमय
कुंकुम बिखेरता,
अजेय
चिरंजयी धर्म का,
मंगलमय, महामिलन, मुस्काया.

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