Tuesday, 7 August 2012

सर्ग चार : कर्ण



एक अतीव सुंदरी गरिमामयी नारी !
अपने वयस के तृतीय प्रहर में,
झुकी मौन कुछ सोच रही थी.
प्रशस्त उज्जवल ललाट पर थीं
चिंता की अगणित रेखाएं.
अन्तर-पीड़ा की दारुण गुरुता से
बोझिल कंपते पग,
असमर्थ, नहीं आगे बढ़ते थे.
किंचित सहम, तनिक थमते थे.
त्रस्त नयन, आगे पीछे लखते थे.
शुष्क अधर, व्यथा से कंपते थे.
गहन अन्धकार ! मौन निशा !
वह आई !
आह कराल के महारण-थल में
पीड़ा से पथराई आँखों में,
था अश्रु-जल छाया,
विषण्ण मुख पर घोर विषाद घिर आया.
जैसे, स्वयम को ही दण्डित करने को ,
उसका विद्रोही मन था अकुलाया.
एक बार दृष्टि घुमाकर देखा
उसने महा-विनाश की भीषण लीला.
सहमकर हटी पीछे ,
बढ़ते कदम लड़खड़ाये.
पोछा उत्तरीय से, निज मुख आँसू से गीला.
पुनः थमी आकार,
एक भग्न रथ के समीप.
पृथ्वी पर पड़ा कराह रहा था,
कोई आहत, मरणोंमुख दिव्य महीप.
झुककर उसने उस सिंह-पुरुष को देखा.
उसका उन्नत उज्जवल भव्य भाल
चमक रहा था.
उस गहन मर्मान्तक पीड़ा में भी,
उसका पूर्ण चन्द्र सा उद्दीप्त कांतिमय मुख
अर्धरात्रि में भी दमक रहा था.
इस महाविभीषिका की दुःखद प्रतिक्रया
छायाचित्रों सी,
उसकी पीड़ा की अर्धनिमीलित आँखों में
घूम रही थी.
मौन पड़ा-पड़ा वह न्याय-तुला पर,
इनके परिणामों को आंक रहा था.
उसे देख अस्फुट स्वर में बोली नारी-
“कुंडल नहीं कर्ण में इसके
वक्ष पर कवच नहीं,
भग्न रथ का एक चक्र
पंक पर फंस कर फिंका कहीं
पृष्ट से स्रावित हो रही रक्त की धार,
निश्चय ही, शल्य भी चुभा यहीं.
अवश्य ही सूर्य-पुत्र कर्ण ही है यह.”
सूर्य-पुत्र के आँखों के अन्तरिक्ष पर,
लेती थी लहरें, मृत्यु की काली छाया .
उनपर एक प्रतिबिम्ब उभर आया.
प्रथम दृष्टि मिलते ही,
आहत ने पूछा –
“इस गहन अन्धकार में,
इस मौन निशा में ,
भद्रे तुम कैसे ? कौन हो तुम ?
क्यों आई हो ?
मुझ परित्यक्त के समीप यहाँ ऐसे !”
आँसू के निर्झर में कातर दो आँखें,
दिखी सूर्य-पुत्र को,
हिम-पातों से कम्पित सित कुवलय की पातें.
हृदयावेग से कम्पित,
आद्र स्वर में हांफती सी बोली नारी-
“रण-थल में तेरे जैसा कोई पड़ा नही,
निश्चय ही , समस्त शूर-वीरों में,
तुझसे कोई बड़ा नहीं.
क्या सूर्य-पुत्र है तू ?”
कुम्हलाये फूलों की म्लान पंखुरिओं पर,
बिखर गयीं,
डूबते सूर्य की अंतिम प्रभाहीन टूटती किरणें .
आई पीड़ा के क्लांत मुख पर,
श्यामल विषाद की लहरें.
शुष्क अधरों पर फीकी स्मित की रेखा,
मृत्यु की कठिन घड़ी ने,
क्षण, ठहरा जीवन देखा.
अनन्त-प्रवाह में, चक्कर खाती डूबती,
जीवन-नौका ने पल,
थमने का सम्बल देखा.
स्वीकृति में हिला शीश.
हिले, बिखरे, चूर्ण अलक जाल.
बोला वह सस्मित –
“सूर्य-पुत्र ही हूँ मैं.”
दोनों बाहें फैलाकार पागल सी झपटी नारी.
शीश गोद में रखकर उसका सत्वर,
फूट-फूट कर रोई बेचारी.
ह्रदय लगा केशों को सहलाया,
“आह ! भाग्य ! तूने कितना मुझे रुलाया.“
निज उद्वेलित वक्ष पर,
शीश दबाकर उसका.
गाढ़ स्वर में वह बोली –
“आह ! वत्स ! माँ हूँ मैं तेरी.”
शान्त पड़ा वह वीर-पुरुष चौंका,
पलक उठा, पूर्ण दृष्टि से उसको देखा.
बोला, आहत पीड़ित स्वर्र में –
“माँ !“
इस एक संबोधन में पीड़ा का सम्पूर्ण हलाहल,
विदीर्ण कर गया शल्य सा ,
जल-थल-नभ,
पृथा का कम्पित आहत अन्तर.
अतीत और वर्तमान के प्रताड़ित लहरों के मध्य,
उनके झोंके खाती,
पृथा की छवि,
उसके आँखों के अंतरिक्ष में उतरी .
बार-बार अतीत वर्तमान की लहर के थपेड़ों से,
निज को संभालती,
वह थी कतर दीन खड़ी !
ग्लानी भरे स्वर में बोला वह –
“डूबते प्रचंड सूर्य की अंतिम किरण सी,
हुन्कारित प्रलय की प्रथम लहर सी,
प्राणों के इन सूखे पतझारों के झंखाड़ों के वन में,
क्यों आई हो तुम ?
दावा की जलती भीषण ज्वाला सी.
इस जीवन-संध्या के अंतिम प्रहर में,
तन से,मन से, जीवन से,
मैं , स्वतः बाहर-भीतर से,
अपनी ही अनवरत जलती अग्नि से,
अहर्निश अविराम जल रहा हूँ.
ऐसे पीड़ा के क्षण में
जब जीवन की सारी पूँजी
अपना पावना चुका रही है.
किस ओर झुकेगी न्याय-तुला,
अंतिम साँसें देख रही हैं.
कितनी कातर निरीह सी तू,
मेरे समीप आई है.
क्यों तेरे उज्जवल ललाट पर,
इतनी चिंता की गहरी रेखाएं.
आहत, क्लांत पीड़ित और थकित हैं,
तेरी हर चेष्टाएं.
किस कांतर कटंकित वन से एकाकी,
तू चलती आई है.
झेला है तूने जाने कितनी बीहड़ बाधायें .
तेरे शुष्क कंपते अधरों पर ,
सहमे से ये अस्फुट स्वर.
असह्य वेदना से आँसू के ये झरते निर्झर .
निराधार, आंधी के पातों सी,
काँप रही है तू थर-थर.
किस निर्बाध अबाध सागर में
अपनी जर्जर नौका डाली है ?
सर्वत्र, विजयोल्लास के उड़ते गुलाल की
फ़ैली लाली है.
तेरी ये आप्लावित आँखें.
क्यों इतनी पीड़ित इतनी खाली हैं.
वर्तमान पांडव साम्राज्य की गौरवशालिनी,
राजमाता .
क्यों नहीं तेरा उज्जवल चमकता ललाट,
इस धर्म विजय से,
उन्नत गर्वित और आह्लादित है.
क्यों नहीं इनमें
अबतक उल्लासमय उज्जवल प्रकाश फैला है.
क्यों विषाद से तेरा मस्तक,
इस प्रकार झुका है ?
निष्कंटक तेरा साम्राज्य अमर है,
नहीं किसी का डर या भय है.
मृतक सभी कौरव-दल,
लेकर अपना दीन पराभव.
कोई भी आपत्ति खड़ी हो सके,
भला यह अब कदापि नहीं संभव.
मेरे जीवन की इस समाप्तप्रायः संध्या में,
एक अप्रत्याशित आशंकामयी भरी समस्या सी,
जाने क्या लेकर तू आई है.
निःशेष हो रही जीवन-बाती,
शेष नहीं कुछ देने को,
सर्वस्व दान कर
अंतिम शेष बचे स्वर्ण को,
दांतों से अभी निकाल कर दिया है,
याचक ब्राह्मण को.
केवल शेष बची यह आहत काया है
और टूटते स्वांस के ये क्षण .
फिर भी कह ! जो कहना है,
रोक न निज कातर मन को. 
रोकर कहा पृथा ने –
“वत्स ! नहीं कुछ शेष रहा,
देने या लेने को,
मात्र तुझसे मिलने ही आई हूँ.
रोक नहीं पायी अंतर्द्वंदों से कातर
निज पीड़ित मन को.
तू मेरे मन की, आकुल एकाकी पीड़ा.
पाषाण-प्रताड़ित निर्झर से पागल मन ने.
सदा निःसंग तुझे मन ही मन झेला.
संभव है मेरा यह मिलन,
नितांत व्यर्थ हो तेरे लिए.
किन्तु मेरी एकाकी झेली गयी
असह्य व्यथा का,
केवल यही है संबल मेरे लिए.
इस अभागे आँचल ने,
एक बार तो तेरे शीश ढंके.
एक बार तो यह मेरे और तेरे,
आँसू से एक संग भींगे.”
बोला कर्ण –
इस एक शब्द में “माँ .”
मेरी सारी पीड़ा साकार बनी.
यह, जन्म-मरण,
यह अथ-इति ,
इसके अंतराल में व्यतीत चलचित्रों सा बीता,
व्यथित अतीत .
पुनः मूर्तिमान, सजीव, सजग, सजल, साकार हुआ.
आँखों के रंगमंच पर ,
छायाचित्रों सी हर घटनाएँ,
जीवित सवाक लौटी हैं.
उन पांच सहोदरों के शीश पर ,
तेरा, स्वस्तिमय, आँचल छाया था.
निरभ्र तपते नील गगन के नीचे,
दूर कहीं खड़ा एकाकी.
तुम सबको सदा निरखता,
जलती धरती पर निःसंग तडपता,
मन ही मन, इस घनी उपेक्षा की,
असह्य व्यथा सहता, मैं,
तेरे लिए नितांत पराया था .
एकाकी आया, रहा एकाकी.
मेरी इस एकांत पीड़ा का,
संघर्षों का ,
रहा न कोई सहयोगी या सहभागी.
निर्दोष रहा सदा का,
पर कोई लांछना नहीं रही बाकी.
बिना किसी स्वजन साथी के,
परित्यक्त अकेला यहाँ पड़ा-पड़ा ,
अब मैं जाता हूँ .
नहीं प्रतीक्षा थी मुझको,
कोई मेरे समीप आएगा .
मेरी इन टूटती स्वांसों की तपन,
निज अश्रुओं से मिटाएगा.
मैं ! उस अभागे नक्षत्र के सरिस हूँ.
जो सांझ समय एकाकी उगता और एकाकी ही,
प्रातः को अस्त हो जाता है.
इस घोर मानसिक यंत्रणा के क्षण में,
जब यहाँ अपना कोई नहीं.
जो झेल रहा हूँ, झेल चुका हूँ,
उन सबका,
तू ही क्यों आधार बनी ?
किस वस्तु के निमित्त क्यों ?
तू मुझे सांत्वना देने आई है,
सर्वदा दी जिसे घोर उपेक्षा,
क्यों उसे आज अपना कहने आई है ?
क्या अभीष्ट है तुझको,
क्यों इस प्रकार तू आई है.
निःशेष हो गयी जीवन-बाती
बिखर गए सब स्वांसों के मोती.
इन शेष बचे से, आँचल भर,
क्या तू संतृप्त हो पाएगी ?
माँ के जिस स्वरुप को अबतक मैंने देखा,
वह एक पाषाणी प्रतिमा थी .
निज अश्रुओं से उसे भग्न कर
मत कहो कि, तेरी वह, घोर विवशता थी.
मेरी इस मरणासन्न अवस्था तक की,
झेली गयी दारुण वेदना.
क्या तू हर लेगी ?
जो अबतक की गहन क्षति हुई है.
क्या वह किसी भी प्रकार पूर्ण हो सकेगी ?
तू आई है माँ .
मात्र, मुझे ठोकर देने को,
मेरे उन सूखे गहरे क्षतों को,
पुनः हरे करने को.
मैं इस रण-थल में भी,
एकाकी दूर पड़ा हूँ.
मुझे शान्ति से मरने दो.
मेरा दुःख तुझको होगा,
वह मैं कदापि नहीं मान सकता.
जिस अपमान-वह्नि में अनवरत जला हूँ,
उसे कोई नहीं जान सकता.
यदि किंचित भी मेरे प्रति,
तेरा स्नेह रहा होता,
तो, तुम सबकी सम्मलित मंत्रणा से,
इंद्र ब्राह्मण बनकर,
कदापि मेरे समीप नहीं आया होता.
यदि मुझे ज्ञात हुआ होता कि
तूने इसका सबल विरोध किया है.
इस मंत्रणा से तेरे मन में
भीषण क्षोभ हुआ है.
कितना आश्वस्त हुआ होता मैं,
कि भाग्य ने मुझे बहुत कुछ दिया है.
उन पांडवों की भांति तूने
मुझको भी प्यार किया है,
अपनी वत्सलता पर
मुझको भी अधिकार दिया है.
एक नहीं हज़ार विजय पांडव के ,
इस ममता पर निछावर थे.
किन्तु, निर्विकार रही तू.
मेरे प्रति, तेरा वात्सल्य नहीं उफनाया .
तूने किंचित भी प्यार नहीं दर्शाया.
मौन रही तू.
क्योंकि, मैं था,
तेरे जीवन का,
सदा का, बंद हुआ अध्याय .
उसे पुनः छूकर तूने,
मेरे प्रति किया नहीं न्याय.
क्यों तू, पुनः पलटने आई है,
वह उड़ता हुआ वर्जित पृष्ट ?
जो तेरा कभी नहीं रहा अभीष्ट.
दोष, इतना ही था मेरा
बिना समाज के अनुमोदन के,
मेरा जन्म,
धरती पर एक दुखद दुर्घटना थी.
जो और के हित में था मान्य,
मेरे लिए मात्र एक विडम्बना थी !
मैं उपेक्षित था एकाकी ,
नहीं था कोई पिता मेरा नहीं थी कोई माता.
फिर मुझ जैसे निकृष्ट को,
यह पाखंडी समाज भला क्यों अपनाता.
कटूक्तियां , लांछना , तिरस्कार,
यही थी मेरी मधुकरी.
जिसे, बड़ी उपेक्षा से फेंकी गयी वस्तु सरिस,
मैं अहिर्निश अपनी जीर्ण शीर्ण
झोली में था पाता.
अभिलाषाएं थीं,
अभिजात्य-कुलों की गौरवान्वित,
प्रथम पंक्ति में समझा जाऊं .
किन्तु, महत्वाकांक्षी होना भी
है कितनी बड़ी भूल.
पीडाजनक एकाकी संघर्षण है यह
परिस्थितियाँ ही नहीं प्रारब्ध भी,
रहता है, सदैव प्रतिकूल.
आकाश छू लेने की निष्फल चेष्टा में
उल्लासों की उड़ान भरता,
बेचारा सम्पाति.
अपने दोनों पंख जला बैठा.
जैसा मैं हूँ आहत, धरती पर लेटा,
वैसा ही, वह भी,
कहीं पड़ा रहा विकल तड़पता .
सब कुछ होनी करवाती है,
प्रारब्ध जिसे हैं कहते.
यदि प्रबल नहीं होता भाग्य.
लिखा नहीं रहता, सहना इतना आघात .
सरिता में बहती मेरी मंजूषा,
पड़ती किसी क्षत्रिय या ब्रह्मवेत्ता के हाथ.
मनः अनुकूल परिस्थितियाँ भी देती ,
मेरा साथ.
मैं भी, उदित सूर्य सा,
स्वयंवर मंच पर अड़ा रहता .
परिचय, कुलमर्यादा सब,
यज्ञ-सूत्र ही कह देता.
नहीं साहस था कृष्णा में
वह मेरा निषेध कर पाती.
या उसे भेजी गयी कृष्ण की मंत्रणा भी ,
कोई विभेद कर पाती.
किन्तु भाग्य !
सदा छाला है इसने.
जो सूर्य निज प्रखर तेज से
समस्त विश्व को तपाता रहा.
उसका ही पुत्र !
अभिमानी पतित उच्च वर्ण के टुकड़ों पर
उनके ही चरणों तले पड़ा,
उनसे ही,पलता रहा.
सदा मर्दित होता स्वाभिमान,
करता रहा घूर्णित मस्तिष्क ,
लूं, किस प्रकार प्रतिशोध,
इन अभिजात्य-कुलों से.
प्रतिहिंसा का क्रोधित नाग,
लेता था विषाक्त फुन्कारे.
इसीलिये कृष्णा की रक्षा के हित,
उठते-उठते भी रह गया मौन,
सुनकर उसकी कातर चित्कारें.
शान्त, देखता रहा.
कृष्णा का चीर हरण.
इन अभिजात्य-कुलों का घोर पतन.
और तुम ! मेरी माँ !
राजवंश की राजकुमारी,
पांडव- राजकुल की राजमाता !
जाने कबसे, धवल,उच्च, राजवंश का शुद्ध रक्त,
तेरी रग-रग में है उफनता आता .
तू कर्मनिष्ठ यज्ञ-पूजन अर्चन से पूरित,
तुझे, भलीभांति विदित थी ,
सत्य असत्य की मर्यादा.
जो ह्रदय धड़कता तेरे वक्ष में,
जो रक्त प्रवाहित तेरी नस-नस में,
तेरा ही एक अंश मैं !
सब कुछ तुझसे ही था पोषण पाता.
किस निर्दयता से तुने मुझे विलग किया.
समय-प्रवाह की निर्मम चोटों पर
रोड़े सा ठोकर खाता ,
उंच-नीच की कटु विषमता ने,
भलीभांति मुझे सजग किया.
उच्च वंश ही नहीं,
राजनीति, कूटनीति सबके समिश्रण से,
तेरी मानसिकता आप्लावित थी.
राज्य लिप्सा की मदान्धता तेरी,
पुत्र-वधु को ही नहीं पुत्र को भी,
दांव पर लगा रही थी.
कभी सुरों का, कभी मानवों का लेकर सहारा,
अपने ही आत्मज के प्राणों की बाजी,
तू लगा रही थी.
मैं तेरा ज्येष्ठ पुत्र,
नितांत तिरस्कृत और उपेक्षित था.
माँ की ममता ! माँ का स्नेह !
राज-मद से आवृत था.
ज्ञात था तुझे और मुझे भी,
मेरा जन्मजात, कुंडल और कवच,
मेरी अमर सुरक्षा थी .
उसे धारण कर लेने पर,
हर मारण की विधि निष्फल थी.
यह भलीभांति विदित था तुम सबको ,
निज महत्वाकान्क्षायों को पूरित करने के हित,
गर्हित स्वार्थ की बलिवेदी का,
निरीह अज बनाया मुझको.
क्षद्मवेशी इंद्र को,
सब जानते हुए भी मैंने,
अपनी अटल मृत्यु के आज्ञापत्र पर,
सहर्ष हस्ताक्षर कर,
कुंडल कवच उसे दान कर विदा किया.
मेरी इस अकारण मृत्यु की स्वीकृति पर
निज विजय जान
वह अट्टहास करता चला गया.
फिर भी, इतना होने पर भी,
तू आश्वस्त नहीं हुई.
संशय का काला धूम घूम रहा था
तेरे मन में.
कहीं निरस्त्र कर्ण से भी,
पार्थ, हार न जाएँ रणांगन में.
इन अन्तरद्वंदों से सतत अधीर,
आँखों में भरकर नीर.
मुझसे ही तू !
अर्जुन का जीवन,
मेरी अनिवार्य मृत्यु मांगने आई.
रात्रि-जागरण, अन्तःपीड़ा से,
अति कातर मुख, मैंने देखा तेरा.
पूजा की, उज्जवल पुनीत
दीपित दीप-शिखा पर,
था, सुघन घन-सारों का श्यामल घेरा.
तू माँ की ममता.
साक्षात् करुणा की,
अश्रुमयी आर्द्र प्रतिमा थी.
मैं झेल न पाया तुझको,
मेरी भी तो सह लेने की कोई सीमा थी.
आकुल होकर मन ही मन,
मैंने तत्क्षण तुझे आश्वस्त किया.
तेरे कँवल सरिस उज्जवल पावन चरणों पर,
उसी समय निज पीड़ित प्राणों का भेंट दिया .
किन्तु माँ !
उस समय मेरे मन में इर्ष्या का
जलता विषधर आकर फुंकार गया.
“ प्रथम तुझसे ही तो इसने,
मातृत्व जाना है.
अन्य पुत्रों की भांति क्या तुझे,
उसी स्नेह से, नहीं, अपनाना है.”
चींख उठा अन्तर मेरा,
क्या ज्येष्ठ नहीं मैं तेरा,
तेरा वह प्यार ! क्यों नहीं मेरा ?
तू मेरी भी तो माँ है ?
जो वात्सल्य-सरित उधर उफनाती है,
वह क्यों इस ओर ही,
शुष्क हो जाती है.
तेरे कर्पूर सदृश्य तन की कोमलता ,
मुख पर छायी,
किसी निर्णय की गहन परुषता !
देखकर मुझे स्मरण हो आया .
सत्य ही कहा किसी ने –
“पुष्पों से भी कोमल पाषाणों से भी कठोर.”
कोमलता और कठोरता का मिश्रण,
तेरे अत्यंत विषादपूर्ण मुख पर
और, निखर कर था आया.
जाने क्या है ?
तुझमें और कृष्णा में समता !
क्यों पार्थ पर ही है,
तुम दोनों की विशेष ममता !
समय समीप आ रहा है,
दूँ क्या मैं तुझको उपहार ?
उसे देख, संभव है,
कभी तुझे आये मुझपर प्यार.
कभी झांक जाए मेरी स्मृति भी,
आकर, तेरी स्मृतियों के वातायन में,
पश्चाताप की अग्नि में जलती,
अपने ही आँसू में गलती,
तू जिस उच्च पीठिका पर स्थित है,
वहाँ,
नश्वरता पार्थ्विकता के समस्त
आकर्षणों से वह वंचित है.
पञ्चतत्व या तन्मात्राओं में रहकर भी
जो विनष्ट नहीं होता.
एक “ओम” के शाश्वत स्वर में,
जो पुनः जाकर अधीष्ठित होता है.
उसी अमर अक्षुण्ण प्राणों का अर्ध्य,
तेरे पावन चरणों पर अभी चढाऊंगा.
प्राणों के अवदात कँवल से,
इन पावन चरणों को ढँक दूंगा.
खींच पृथा के दोनों चरण,
रखा निज शीश वहाँपर.
बोला पुनः हाफता सा-
“इस गहन अन्धकार में,
इस महा-विभीषिका के रणांगण में,
घोर विरोध सह लेने का साहस लेकर,
तू पांडव-शत्रु से मिलने आई है.
किंचित थम !
मेरी व्यथा सुन.
इन प्राणों की पीड़ा को,
एक बार तू सहलाती जा.
तू मेरी माँ है, मैं तेरा हूँ.
बस, इतना ही कहकर जा.
“लिपटा कर उसे निज बांहों से
रोई पृथा बिलखकर –
“मेरे प्राण ! मेरे ह्रदय-धन ! ज्येष्ठ पुत्र मेरे !
माँ का गहन दुर्भाग्य कि पुत्र,
उसके सम्मुख साँसें तोड़े.”
कहा कर्ण ने किंचित हंसकर –
सदा छला गया हूँ माँ !
कभी भाग्य से.
कभी समय से.
कभी परिस्थितियों से.
अब तू भी, वैसा कुछ मत कर.
जैसा हूँ वैसा ही रहने दे.
मत ममता में अपनी मुझे जकड.
यदि सत्य में तूने
प्यार किया होता,
मेरी अकारण व्यर्थ मृत्यु,
पार्थ का जीवन !
याचक से फैले आँचल में
मुझसे नहीं लिया होता.
रोकर बोली पृथा –
वत्स !
माँ का आँचल सदा एक बराबर,
सबके लिए दुग्ध से स्रावित गीला था !
पर, चोट कहाँ खा रही माँ की ममता !
इसको किसने देखा था.
पाँचों उंगली एक बराबर नहीं,
पर चोट एक सी सब पर आती है.
माँ की ममता में रंचक भेद नहीं,
वह तो सदा, समय की मार ही खाती है.
अंतर्यामी को ही मात्र विदित है,
मेरी इस मन की पीड़ा.
कर्त्तव्य और प्यार में,
पलड़ा सर्वदा,
कर्त्तव्य का ही भारी होता है.
हँसा कर्ण व्यंग से-
“कर्त्तव्य माँ का भी क्या,पक्षपातपूर्ण होता है ?
विवेक सदा ह्रदय और मस्तिष्क पर,
एक बराबर ही,
संतुलन और शासन करता है.”
बोली पृथा-
किन्तु वत्स !
विवेक, नारी-ह्रदय से सदा हार मानता है.
उसपर, विवेक का नहीं,
ह्रदय का ही शासन होता है.
इन दो विपरीत किनारों के
एक सामान दूरी का,
कभी नहीं मिलन होता है.
इसी से, नारी का,
अपनी ही ममता, कोमलता से,
निर्ममता से, उत्पीड़न होता है,
वह तो !
मात्र एक कोमल लता है.
अवलंब अपेक्षित है उसको.
भले ही आधार मिला हो जिस तरु का .
वह पादप हो. कदम्ब हो, या कंटकित कीकर हो.
वही प्राप्य , प्रारब्ध है उसका.
वही नियति है उसकी,
जो अदृष्ट ने उसे दिया है.
उसका कोई मूल्य नहीं.
चरण तले की धूल है वह.
क्रीत दासी है सदा की.
स्नेह या ठोकर.
स्वामी की इच्छा पर निर्भर है.
सब प्रकार से पंगु, विवश .
हर उपयोगों के हित प्रस्तुत है.
अन्यथा, किस साहस से,
शाप-भ्रष्ट, पांडू रोग पीड़ित पांडू ने,
इतना निर्मम व्यंग किया मुझसे !
अधिकार क्या था उस अभिशप्त-पुरुष को,
मुझे निज अर्धांगिनी बनाने का ?
बरबस, देव-पुत्रों की माता मुझे बनाकर,
आगे वंश और राज्य चलाने का.
कैसी कायरता है यह !
सारे दोषों से निज को निवृत कर,
नारी पर सब आवृत कर देती हैं.
लांछना, जनापद, तिरस्कार की, सुलगती वह्नि में,
निर्ममता से उसे धकेल देते हैं.
समाज की विषाक्त विशिखा का,
उसे ढाल बनाते हैं.
उसका ही आड़ लेकर,
निज पुरुषार्थ दिखाते हैं.
बोला कर्ण हांफता सा –
यदि रंचक पीड़ा तुझे न पहुंचे,
तो इतना भर बतलाती जा.
द्रुपद-सुता के स्वयम्बर में
जब अधिरथ-सुत की गूँज हुई थी
अब भी मेरे मानस क्षितिज पर वह ध्वनि,
जलती उल्का सी घूम रही है.
प्रतिशोधों की जलती प्रचंड अग्नि,
ब्रह्माण्ड छूने को तड़प रही है.
उस दारुण असह्य अपमान की ज्वाला में,
जब धू-धू करता, मेरा तन-मन दग्ध हुआ था.
किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा स्तब्ध,
मैं उसी स्थल पर अचल जड़ा रहा.
मेरी संघानित खिंची प्रत्यंचा का शर ,
वैसा ही, शिंजिनी पर चढ़ा रहा.पर,
जन्म-जाति, परिचय के जलते,
विषाक्त व्यंग-बाणों से,
मेरा तन-मन विंधा रहा.
ऐसे विकट समय में जब लज्जानत मैं,
धरती पर धंसा रहा.
कहाँ गयी थी तुम ?
मेरी दैव प्रदत्त दीन दशा पर,
तुमको किंचित भी दया नहीं आई.
क्यों नहीं भीड़ चीरती आकर तुमने
घोर लज्जा से मुझे उबारा.
क्यों नहीं कहा तुमने
यह सूर्य-पुत्र, कुंती पुत्र है.
अन्य पांच देव-पुत्रों की भांति
यह भी मेरा सुत है !
क्यों नहीं उस जन-संकुलित सभा में,
मुझे निज ज्येष्ठ पुत्र संबोधित कर
तूने वहीँ पुकारा !
किन्तु नहीं,
गहन अपमान-गर्त में गिरते मुझे देखकर भी,
तेरा ह्रदय विदीर्ण नहीं हुआ.
असत्य कलुष-तिमिर में आवृत सत्य ,
अन्धकार चीरता विकीर्ण नहीं हुआ.
सर्वविदित प्रकट सत्य भी,
तू निज मुख से नहीं कह पायी.
इस प्रकार मुझे,
आकाश-धरा दोनों से छलित देखकर भी ,
तू नहीं बचाने आई.
उस अपमान-वह्नि में जलता,
तत्क्षण मुझे ज्ञात हुआ.
यह उच्च मंच.
सुरक्षित है केवल.
राजवंश, अभिजात्य कुलों के हित.
शूद्र, उच्च मानवीय गुणों ,
उदात्त सुसंस्कृत आचरणों से,
कितना ही हो पूरित.
प्रत्येक श्रेष्ठ वस्तु, आदर, सम्मान से,
वह सदा रहेगा वंचित.
एकाधिकार है उच्च वंश का,
सदा,उच्च पीठिका पर अधिष्ठित रहने का.
प्रत्येक वांछित वस्तुओं को जबरन,
हस्तान्तार्रित कर लेने का.
चाहे वे कापुरुष हों ! बर्बर हों ! निकृष्ट हों !
कितनी भी कलुषित हों,
उनकी अकिंचन मानसिकता.
उन्हें छोड़ कोई अन्य कदापि,
नहीं उनके क्षेत्र में प्रवेश पा सकता.
वहाँ नहीं था ऐसा कोई शूर-वीर.
जो मुझे पराजित कर पाता.
किन्तु, सामाजिक विषमता के सम्मुख,
सौदर्य ! शौर्य ! विद्वता ! बौद्धिक प्रांजलता .
व्यर्थ है सब.
उच्च-वर्ग और निम्न-वर्ग के मध्य,
नहीं पटने वाली अलघ्य खाई है.
नीच-वर्ण कदापि नहीं छू सकता,
गर्वित उच्चवर्ण की परछाँयी है.
मेरे और अर्जुन के मध्य,
बल वैभव बौद्धिकता की नहीं किंचित भी तुलना थी.
पर, एकलव्य और मेरी,
दोनों की,
एक सदृश्य ही गरणा थी.
मत्स्य-नयन-बेधन,
पार्थ ही नहीं,मैं भी कर सकता था.
किन्तु, स्वंयवर , स्वयं-वरण नहीं,
वह भी एक शर्त से बंधता है.
मन का कहीं स्वच्छंद चयन नहीं,
वह भी अंकुश में रहता है.
इस नीति में छद्म वेशी अनीति ,
सदा से चली आई है.
निरंकुशता के बर्बर शासन में,
शूद्र जाति दास बनकर
और
नारी अपंग क्रीतदासी होकर,
इनसे पिसती आई है.
इस, अनीति में,
पृथ्वी नहीं आकाश भी सम्मलित होता है.
मानव के संग देवगण भी,
छल बल अपनाता है.
आर्य, शूद्र की गहन विषमता थी,
असुर सदा छाला गया देवों से,
शूद्रों पर कब आर्यों की ममता थी ?
तू भी, पांच देव-पुत्रों को अपनाकर,
मेरे प्रति ही मौन रही.
बोली पृथा आद्र कम्पित स्वर में-
जलते सैकत पर,
कभी तो देखा होगा,
आ भटकी, कंपती सीकर को,
निश्चय ही उस एक बूँद जल को,
जल-जल कर, तड़प-तड़प कर
तत्क्षण मिटते , देखा होगा.
इस अंधे युग के अंधे शासन में,
दावाग्नि लगी है सर्वत्र वन में.
नारी ! तुषार का एक कण.
कहाँ ठहर पाती, इस जीवन में.
अपराध लांछना, के कटंकित विजन में,
घिरी हुई वह भयभीत कुरंगी.
चारों ओर खिंचे अस्त्रों के मध्य,
पड़ी हुई संत्रसित तन्वंगी .
आत्मबल निडरता निर्भीकता सब होने पर भी,
जब चरणों के नीचे धरा नहीं,
कहाँ ठहर पाती ?
निराधार निरावरण होकर.
क्या कहती कैसे कह पाती ?
किसके बल पर कहाँ समाती.
ऐसे ही खुले व्याघ्र के मुख का,
नारी ही आहार बनी.
हाथ झार पुरुष हट जाता है,
वह समस्त दोषारोपण का आगार बनी.
संभव था ज्ञात रहा हो पांडू को,
मेरे समीप, अभिमंत्रित एक सृका है.
सोचा होगा इसीलिए,
पृथा के बिना सब कार्य वृथा है.
पांच देव पुत्रों के पीछे,
पति का कठोर अनुमोदन था.
उस आज्ञा की वहाँ अवज्ञा कर ,
मेरा कहाँ विमोचन था.
वह, मेरा दुर्भेद्य दुर्ग था,
पति की छाया में,
मेरी सुदृढ़ सुरक्षा थी.
निश्चिन्त, भयरहित, सुचारू,
जीवन-दिनचर्या और व्यवस्था थी.
किन्तु, तू !
एक उत्तर-रहित प्रश्न !
निश्च्छल, पीड़ित, प्रतिफल !
मेरे, अनजाने अनगनत जन्मों का,
तू था,
अप्रत्याशित दारुण साकार मौन वेदना . 
तुझे देख .
पीड़ा से व्यथित संतरित हुई,
विमूर्छित, मेरी चेतना.
तू मेरा शापित आह्वान .
अभिशापमय वरदान था.
मेरा भोला कौमार्य !
तेरा अभिनव शैशव !
दोनों ही,
अदृष्ट के निर्मम आघातों से
आक्रांत था.
वह कुमारी !
जिसकी शुचिता की असह्य अग्नि.
कर देती है भस्म,
सुर, असुर,देव,दानव, किन्नर, गंधर्व,
यक्ष, राक्षस कोई भी हो.
ऐसी प्रज्ज्वलित पवित्रता,
भोलेपन के संग, इतना घृणित छल !
इन देव-गणों को ही सुशोभित होता है.
कहने को असुर तामसिक होते है,
हर मान्यातायों के विरुद्ध होते हैं.
किन्तु वे भी,
कहीं-कहीं अति कट्टर
धर्म-कर्म के प्रति एकनिष्ठ होते हैं.
निज आचार, विचार, वचन, पूजन, स्तवन
और कर्त्तव्यों के प्रति अडिग
दृढ़-प्रतिज्ञ होते है.
असुर-राज, धर्म-निष्ठ, सत्य-प्रतिज्ञ,
दानवीर बलि भी,
छला गया,
यज्ञ-पुरुष के ही हित यज्ञ करते हुए,
हव्य, कव्य के भोक्ता,
बावन-अवतार-विष्णु से.
जहां,प्रत्येक नियम अनियमित होते थे,
निज सुविधायों पर ही केंद्रित थे.
वहाँ, तेरे लिए क्या कहती.
किस प्रकार किसे समझाती.
एक अनभिज्ञ किशोरी के
भोलेपन का दारुण दण्ड.
क्या दे पाती साक्ष्य
अपनी निर्दोषिता का.
जबकि कहा जाता है.
साँच को आँच क्या ?
किन्तु वस्तुतः
सत्य.अत्यंत निरीह है.
वह, सदा का प्रमाण रहित,
विवश, बीहड़ है.
इतना सपाट और चिकना है,
एक बूँद जल भी,
नहीं ठहर पाता.
मूक है. अपंग है वह.
कोई इसपर विश्वास नहीं कर पाता.
चाह कर भी, साक्ष्य दे नहीं पता.
इतना ही कह पाता है,
संकेतों से,
मैं जैसा हूँ सम्मुख हूँ,
इतना ही कह सकता हूँ.
कैसे दूँ प्रमाण.
वाचाल नहीं मैं.
वाग्जाल नहीं रच सकता हूँ.
वहीँ मिथ्या !
सुन्दर स्वरूपों में मंद-मंद मुस्काता है.
वह, वाचालता, मुखरता, वाक् वैदिग्धता के,
क्रमवद्ध घटनाओं के साथ,
सुन्दर मनोरम सुगम शिल्प बनाता है.
सहज ही में वह,
तथ्य प्रमाण एकत्रित कर लेता है.
अतः जहां मौन था सत्य.
विवशता क्रंदन करती थी.
वहाँ, यह प्रभुता-संपन्न निरंकुश शासन,
और घृणित, पतित, स्वार्थपरक, गलित समाज.
मुझे या तुझे .
कदापि क्षमा नहीं कर पाता,
अवसर पाते ही वह,
विष-चढ़े सर्प सा डंस जाता.
तू ! बिना पंख के नवजात परिंदे सा,
बाज के तीखे पंजों में निर्ममता से आ जाता.
और मैं ! विवश निरीह क्या कहती,
किससे कहती.
जब स्वेच्छाचारी शासन और सामाजिक संरचना में,
नारी का अस्तित्व,
कोई मूल्य नहीं रखता.
जाने किस अशुभ घड़ी में
सृजन हुआ था इस शुभ मन्त्र का :
“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता.“
वह इसे, अंधे कुँए में व्यर्थ जानकर डाल आया है.
अब उसे वह,
अत्यंत अदूर्दमनीय होकर,
कठोर दमन चक्र में पीस रहा है.
पुरुष की सबसे बड़ी सुविधा है नारी !
वह, उसकी मुट्ठी की दृढ़ जकड़न से,
कहीं फिसल न जाये.
अतः, रंचक स्फूरण को भी उसके,
कुचल दिया जाता है.
कहीं खुली हवा में दो सांस न ले ले वह,
उसकी बासी शिथिल चेतना !
कहीं स्वस्थ न हो जाये.
आंक न ले वह निज वास्तविक मूल्यांकन.
यहीं पुरुष की द्विविधा है.
इस शोषण उत्पीड़न से,
वह निज को भी भूल चुकी है.
हर सांस बिकी है उसकी
हर समय बिका है उसका.
उसके प्रत्येक गतिविधियों पर,
नाना रूपों से, है नाना प्रकार का पहरा.
कहते-कहते सहसा रुकी पृथा,
निरख, पूर्व दिशा की ओर .
प्रश्नभरी आँखों से देखा कर्ण ने,
क्यों हो गयी पृथा मौन !
बोली पृथा- प्रत्युष हो रहा है
शीघ्र फैलेगी अरुणाई.
कैसे रुकूं,
छोड़कर भी कैसे जाऊं,
यही सोचकर हूँ घबड़ायी.
यह सम्बन्ध.
आत्मा का है,
जन्म-जन्म का नाता है.
कैसे इस ममतामय बंधन को छोड़,
कोई विलग रह पाता है.
यही चाहती हूँ तेरे सारे क्षत,
भीतर-बाहर के,
सब, मुझमें आकर समाहित हो जाये.
तेरे सारे क्षत मेरे हों.
तेरी सारी पीड़ा मेरी हो.
तू किसी तरह भी स्वस्थ हो जाता.
तुझे मेरी शेष बची आयु लग जाती.
तू उन्मुक्त धरा पर विचरण करता.
मैं यहाँ इसी जगह सदा तेरे लिए सो जाती.
कितना कातर मेरा मन है,
मैं किसी भी तरह यहाँ रह पाती.
तुझसे विलग नहीं होती.
मन की कोमलता को लेकर संभव नहीं,
इस दुनिया में रह पाना.
भावुक के लिए महा कठिन है,
एक कदम भी चल पाना.
इस पीड़ा की दुनियां में,
जिस दिवस तूने प्रथम आँखें खोली.
पवन-प्रताड़ित कम्पित लतिका सी,
भयभीत मैं, पात-पात सी डोली.
सबसे आँखें बचाकर,
सहमी सी, निज धड़कते हुए ह्रदय से,
तुझे लगाया था.
तेरी धुक-धुक करती छोटी सी धड़कन ने.
मेरा तन-मन भरमाया था.
फूलों से भी कोमल तेरे तन को,
मैंने धीरे-धीरे सहलाया.
हर बार तुझे छूते,
बार-बार नयनों में जल भर आया.
किन्तु, अन्तः सलिला फल्गु का यह,
उद्वेलित प्यार, उफनता ज्वार.
हो गया जड़,
देखकर, समाज का रौद्र रूप विकराल.
मेरा प्यार ! मेरा रुदन !
मेरी निरीह विवशता, मेरा करुण क्रन्द्दन.
हो गया कैद !
बंदी कर गया उसे,
क्षुब्ध कठोर समाज का,
अभेद्द लौह द्वार !
एक अनिश्चित अदृष्ट के लिए,
अज्ञात दिशा.
अनाम व्यक्ति.
अप्रत्याशित अटल नियति.
के हाथों में, सदा के लिए,
बिना किसी आश्वासन और सुरक्षा के,
तुझे, विदा किया मैंने !
अपने ही उद्वेलित उच्छ्वासित
उफनाते मन के सागर में,
अजस्र बहती अश्रु की धारा में
इन अभागे कंपते हाथों ने,
धीरे से डाली थी तेरी मंजूषा.
नहीं ज्ञात था, क्या परिणाम लाएगा.
यह अभागा क्रूर भाग्य रूठा.
आज पुनः उन्ही हाथों ने
तुझे स्नेह से सहलाया है.
हाय दुर्भाग्य.
माता होकर भी मैंने.
केवल तेरा, अथ-इति ही दोहराया है.
वत्स !
यदि नहीं होता मेरा दुर्भाग्यकाल .
वह नहीं होता वन का अज्ञातवास.
किया होता भाग्य ने,
आशीषों से झुके शीश पर
अपना स्वास्तिमय प्रखर प्रकाश.
निश्चय ही, स्वयंवर में निर्भीक मेरे कदम होते.
उन्नत मस्तक, दृढ़ स्वर में,
मेरे कहे गए वचन होते.
नहीं राज, समाज किसी का भय होता.
किन्तु दुर्भाग्य !
अज्ञातावस्था हम सबका.
अवधि पूर्ण होने के पूर्व,
कहीं उपस्थिती ज्ञात हो जाती,
तेरह वर्ष की वनवास की अवधि,
निज शर्तों में दुहरी हो जाती.ली
गहरी सांस सूर्य पुत्र ने,
अधरों पर पीड़ा का हास बिखर आया.
जीवन का सारा विष,
उसके अधरों पर आकर लहराया.
बोला – पांचो- पांडव और मुझमें,
कुछ भी नहीं अन्तर था.
प्रकृति की स्वीकृति नहीं,
मात्र, समाज की स्वीकृति पर सब निर्भर था.
क्या संगत, क्या असंगत है.
इसे अबतक, परिस्थिति धर्म, समाज
कोई नहीं सुलझा पाया.
यह उलझा-उलझा जीवन है.
नीति, अनीति, धर्म, अधर्म,
मात्र एक आडम्बर है.
जिसके हाथों में बल है, शासन है,
वैसी ही वह, नीति-अनीति बनाता है.
सबल को जो कुछ सब है मान्य,
निर्बल, दलित-पीड़ित को,
वह उन्ही परिस्थतियों और स्थानों पर,
अमान्य हो जाता है.
सब केवल मिथ्या बंधन हैं.
तेरे ये बहते आँसू.
पथ अवरुद्ध कर रहे हैं मेरा.
तेरे आंदोलित अश्रु-प्रवाह में,
सूखे तृण सा डोल रहा हूँ.
तेरी पीड़ा ! तेरा शोषण !
रोम-रोम में विष घोल रहा है.
विवश आहत सिंह सा कर्ण.
यदि निठुर मृत्यु-पाश में,
आबद्ध नहीं हुआ होता.
इन,
मिथ्या मर्यादा के पाखंडी पंडित,
दम्भी धर्म वेत्ताओं से,
अभी इस क्षण उठकर-
तेरे प्रति किये गए अन्याय का,
एक-एक से प्रतिशोध लिया होता.
किन्तु ! इन अंतिम क्षणों का,
उत्तर नहीं. मेरे लिए,
जीवन और मृत्यु,
कोई महत्व नहीं रखता.
मृत्यु की अनन्त अविच्छिन्न धारा में,
जीवन, मलिन आग सा है बहता !
अटल अक्षुण्ण नियम महाकाल का है,
इसमें जीवन,
बुलबुले सा स्वतः बनता, मिटता रहता है.
जिसने जीवन को नितांत निरर्थक जाना.
वह कैसे इसकी कारा में बंधा रह सकता है.
जिसका उपभोग्य, न धरा ही है और न स्वर्ग.
वह भला, यहाँ थमा क्यों रह सकता है ?
इसी से, स्वर्ग के लोभी देवों के लिए,
उन्मुक्त दान दिया मैंने.
देवों के दीन-हीन देवत्व पर,
दया कर, मैंने जानबूझ कर,
यह मृत्यु ग्रहण किया है.
विष को विष ही जानकार,
सहर्ष, उन छलियों के हाथों से,
पान किया है.
तुझे विदा दे रहा हूँ माँ !
अब मेरी स्वांसें रुद्ध हो रही हैं.
नहीं चाहता पल भर भी विलग होना तुझसे.
पर सारी बातें विरुद्ध हो रही हैं.
रोई पृथा बिलख कर –
“कर्ण ! मेरे पुत्र ! संत्रसित ह्रदय मेरे !”
तेरे प्रति दोषी हूँ, अपराधिनी हूँ.
ऐसा नहीं समझना मुझको.
पूजा के मिस भी छल पाया जिसने
ह्रदय से क्षमा करना उसको.
वह मेरा जीवन ही क्या था.
जो, क्रूर कुटिल नियति के भीषण अट्टहासों ,
विडम्बना के निर्मम व्यंग और परिहासों के मध्य,
दोनों से टकराता, ठोकर खाता,
निःसंग अकेला मूक अश्रुओं को पीता,
किसी प्रकार जीता रहता था.
दो विपरीत दिशाओं से टकराता,
चाहा, अनचाहा सब बरबस, कर जाता था.
जहां चूर-चूर होकर मन कातर रोता था,
ओठों पर मुस्कानों का ताला होता था.
ऐसे विवश पराधीन जीवन को.
उसकी असहायता ही कहना.
गहन वेदना की ज्वाला में,
दग्ध होता रहा ह्रदय प्रतिपल.
नहीं कभी शीतल कर पाया उसको,
मौन बहता अविरल आँखों का जल.
आहों ! आँसू, असह्य व्यथा !
यही था इस जीवन का पाथेय,
कर्त्तव्य निभाना, निष्काम सेवा,
जाना इसको ही जीवन का श्रेय.
किन्तु ! गवेषणा यही रही हर क्षण मन की.
किसी प्रकार कोई निदान,
कोई समाधान .प्राप्त करे,
यह संत्रासित नारी जीवन.
कभी तो कोई हो ऐसा सुन्दर हल.
हंस उठे उसकी आँखों का,
अविरल बहता जल.
कहा हांफता सा कर्ण-
“अन्याय दमन शोषण उत्पीड़न की,
पृथा और कृष्णा,
दोनों ही आँसू भरी करुण कहानी है.
किसने जाना !
कितनी गहरी है कालिंदी.
क्या शान्त बह रहा,
उसका नीला पानी है.
धू-धू कर जल रहे अन्तर की,
कभी कही नहीं उसने कोई कथा.
हो गयी जल-जल कर कृष्ण वर्ण.
मौन रही अन्तर की गहन रिसती व्यथा.
ऐसी ही रही.
कृष्णा या पृथा.
मेरे मानस में सदा यही,
द्वंद्व छिड़ा रहता था.
क्यों, किसके लिए यह भाग दौड़.
जब मृग मरीचिका सा जीवन रहता है.
इसीलिये, आँख बंद कर लक्ष्यरहित
इस भाग दौड़ को,
कभी महत्व नहीं दिया मैंने.
यह भी नहीं सोचा.
कैसा है युद्ध.
कैसे हैं प्रतिपक्षी और विपक्षी.
यह ! धर्मयुद्ध.
क्या रहा वस्तुतः धर्मयुद्ध !
एक-एक इस शतरंज के मोहरे.
क्या सत्य पर ही डिगे रहे ?
क्या है यह धर्म ?
किस शून्य पर आकर,
धर्म, अधर्म हो जाता है.
या अधर्म !
किन परिस्थितियों से टकराकर ,
धर्म हो जाता है.
या, कोई एक वस्तु !
एक चाहना !
जिस ओर तुला झुकती है,
वह, कभी धर्म कभी अधर्म का
परिवेश बदल कर आ जाती है.
वस्तुतः धर्म या अधर्म.
कुछ भी नहीं.
एक स्वच्छ पारदर्शी को.
कभी धवल कूंची से
कभी कृष्ण तूलिका से,
रंजित कर,
धर्म-अधर्म की संज्ञा दे देते हैं.
अतः इसीलिये,
यह धर्मयुद्ध हुआ या अधर्म-युद्ध हुआ.
कभी नहीं सोचा मैंने.
क्योंकि, वह पार्थ सारथि !
सद्-चित्-आनंद !
वासुदेव नारायण !
साक्षात् भगवान !
उसके ही संकेतों पर
पृष्ट पर यह विषाक्त शल्य मिला मुझे.
माना, अधर्म किया था मैंने.
वह तो.
परात्पर परब्रह्म निस्पृह निरंजन था.
सद्दः युद्ध-विराम हो रहा था.
दिनभर का तपता दिनमान,
अस्ताचल पर अस्त हो रहा था,
पंक में फंसे एक चक्र को रथ के,
मैं झुक कर निकाल रहा था .
’नर’ था अर्जुन.
आया द्वंद्व उसके अन्तर में,
निरस्त्र पर हाथ उठाना निषिद्ध है रणांगण में .
नहीं चाह कर भी उसके कहने पर
किया उसने भीषण आघात.
नहीं सोचा उसने,
यह भी वह एक भाग है, उसका ही,
निर्मित जिससे उसका गात.
सहोदर था वह !
उसके जीवन की रक्षार्थ.
मैंने, कुंडल और कवच दिया.
इतना ही नहीं,
तुझे भी उसके जीवन का,
अभय-दान दिया.
आश्वस्त कर,
नहीं घात करने का,
तुझे वचन दिया.
इस विनिमय में,
अपना पूर्व ही अटल मृत्यु ग्रहण किया.
वह ! सब प्रकार से सुरक्षित था,
आकाश और धरा,
दोनों से निर्भय था.
प्राप्त था उसे,
सर्वनियन्ता का भी अक्षुण्ण बल.
फिर भी किया उसने.
इतना घृणित छल.
उस मर्यादित ‘नर’ को
युग की मर्यादा रखनी थी.
होता कितना भी बड़ा प्रलोभन.
उसको ठोकर देनी थी.
किन्तु ! प्रभु भी,
अपने प्रिय के हित.
करता है अधर्म और पक्षपात.
कहते हैं उसे प्रपंच रहित निष्पाप.
वह पूर्ण है.
अतः बार-बार का यह जन्म-मरण.
नाना रूपों का आवागमन.
करता है वरण, जीव.
मात्र कलुषरहित निर्मल होकर स्वयं भी ,
निकष पर खरा उतर कर उस पूर्ण में,
पूर्ण हो जाने को.
यदि वह भी दुर्बल है.
जीव कहाँ फिर सफल है ?
क्यों पाप-पुण्य का विषद विवेचन !
क्यों पूजन अर्चन और स्तवन.
जब संचित अच्छे और बुरे कर्म,
हो नहीं सकते दण्डित या पुरस्कृत.
तब क्यों यह भाग-दौड़
यह छीन झपट !
क्यों प्रलोभनों की चकाचौंध में ,
मृग मरीचिका की टकराहट.
व्यर्थ यह धर्म-ग्रन्थ ! नैतिक प्रबंध !
निरर्थक ये सारे प्रपंच !
क्यों जीवन के प्रति साग्रह प्रयास.
जब जीवन है केवल प्यास ! प्यास !
जब , महाशून्य के महा श्मशान में,
केवल सत्य है .
गूंजता टकराता,
महाकाल का विकट अट्टहास !
यह विश्व ही उसके मुख में जाता हुआ,
नन्हा सा एक ग्रास !
इतने सारे दान !
व्यर्थ हो गए मेरे भी,
बिछुड़ते पुष्पों से प्राणों में
काँटा एक चुभा है अभी भी.
अधर्म ! किया है मैंने भी,  
देखता रहा .
दांव पर लगी दयनीय नारी को.
उस जन-संकुलित सभा में,
स्वयं वह !
एक असह्य जलती समस्या थी.
\उस न सह पाने वाले ताप से,
बाहर-भीतर से,
विचलित होता हुआ भी मैं .
उन्ही, कापुरुष पांडवों की भांति,
जड़ खड़ा रहा .
उस दिन मैंने जाना.
बल, शौर्य, पराक्रम.
व्यर्थ है.
एक क्रीत दास के निमित्त.
पराधीनता होती है कितनी निकृष्ट.
अपना ही पौरुष. अपना व्यंग बना,
कटु उपहास कर रहा था .
वह त्राहि मांगती नारी.
उसकी करुणा की गुरुता में.
समस्त शौर्य.
रुई के गाले सा उड़ रहा था .
आपत्ति के गरजते महार्णव में,
वह निराधार डूबती जा रही थी.
असह्य था क्रोध का संवरण.
किन्तु मैं !
प्रारब्ध का निर्मम क्रूर व्यंग था.
अभिजात्य कुलों की गणना से कहीं दूर.
सामाजिक सरंचना का भी,
एक अत्यंत दुर्बल, गर्हित,अपंग अंग था.
मैं !
अधिरथ-सुत था.
नीच वर्ण था .
किसी की दया पर पाला हुआ,
नियति, भाग्य से छला हुआ,
नितांत विवश था.
इस घृणित अत्यंत अशोभन,
कृत्य के प्रति, घोर क्षोभ हुआ था मन में.
की, क्यों नहीं उसकी रक्षा,
धिक्कारा क्यों नहीं भरी सभा को.
क्यों नहीं खडा हो गया मैं,
अवलंब देकर द्रुपद-सुता को ?
किन्तु,
ह्रदय का अविराम सुलगता प्रतिशोधों का रोष.
निरख रहा था,
एक पिता.
एक वंश.
एक रक्त.
एक छत के नीचे, रहने वाले,
इन दम्भी अहंकारी राजवंशियों का कृत्य अशोभन.
उनकी, धवल कीर्ति की फहराती ध्वज का,
विषादपूर्ण घोर पतन.
कौरव-कुल-मर्यादा के,
निरभ्र नील-नभ पर,
कलंक-कालिमा का कृष्ण धूम फेंकता,
आतंक मचाता, सर पर था मंडराया,
अभिशापित दुर्भाग्य धूमकेतु.
कृष्णा !
जयलक्ष्मी सी गर्वोन्नत परम प्रफुल्लित ,
अम्बर के अम्बार लिए,
न्याय-तुला के पल्ले पर, अवस्थित थी,
निज गरिमा की गुरुता का भार लिए.
दूसरे पल्ले पर,
शुष्क तृण सा उपेक्षित था पड़ा हुआ,
कौरव-दल का दलित मलिन दुर्भाग्य.
चीरों के फहराते लहराते क्षीर सागर के सित
सहस्र शतदल पर कीर्ति कौमुदी की अजस्र वर्षा में
सबल चुनौती सी थे प्रतिष्ठित ,
कृष्णा !
विजय का अमिय कलश लिए.
वही एक,
इस मरण पथ पर,
मेरी पीड़ाजनक अवरोध बनी है.
कहना उससे,
जिस प्रकार वात्सल्यमय जननी करती है,
निज आत्मजों को क्षमा,
उसी प्रकार मुझे भी कर देगी
ह्रदय से क्षमा उसकी ममता.
और तू !
मेरी जननी ! कितनी पावना !
कितनी भोली है !
मेरे गर्वोन्नत ललाट की,
तू शुभ स्वस्तिमय शुचि रोली है.
तेरी स्नेह गंगा में आकंठ डूबकर मैं पूर्ण संतुष्ट,
प्राण त्यागने को उत्सुक हूँ.
तू मेरी गरिमामय जननी.
मैं तेरा सुत.
यही जानकर परम मुदित हूँ.
किंचित निज चरणों की धूल.
चन्दन सा मुझे लगाने दे.
उसके पावन सौरभ को,
इन बिछुड़ते प्राणों में बस जाने दे.
कितनी शान्ति मिलेगी मुझको,
वही,
मेरे प्राणों का वाहन होगा.
जहां कहीं भी रहेंगे ये उन्मुक्त प्राण.
सदा तेरा ही चिंतन होगा.
बोली पृथा निज चरण समेट-
“वत्स !
चरणों की रक्षा करता पद-त्राण,
कभी शिरःत्राण नहीं हो पाता.
अकिंचन की क्षुद्र मधुकरी.
क्या दाता की विशाल झोली है भर पाता.
मेरे इन रक्तरंजित पथ-थकित चरण,
मत स्पर्श कर वत्स !
स्मरण कर , नमन कर,
उस वासुदेव नारायण को
अंततः वही शाश्वत शरण हैं.
वही अपनाता है तपते प्राणों को.”
चौंका कर्ण !
विचलित हुई उसकी सुसुप्त होती चेतना.
बोला वह –
“मत कह मुझे नमन करने को,
किसी अवतारों को.
इनसे सदा ,
ठोकर ही खाता आया हूँ ,
मत कह ! अंत समय में,
इनसे, जाते-जाते भी, ठोकर खाने को.
किसे नमन करूँ ?
उस पार्थसारथी कृष्ण को,
स्मरण कर उसे , 
कैसे रोकूं, पृष्ट पर बढती पीड़ा को.
यह उसका प्रसाद,
प्राणों का अवसाद.
अंत समय पाया मैंने.
पुनः कहेगी तू !
उसे नहीं तो, ले नाम तू अब,
“दयानिधान रघुवर श्री राम का.”
मेरे लिए, ये सारी संज्ञाएँ विवादास्पद ही हैं.
करती हैं मेरी भावनाएं विद्रोह !
नहीं हो पाती इनसे, किसी तरह भी संबद्ध .
पुण्य,पुनीत, आवागमन मुक्ति से,
मत कर इन नाम को आबद्ध.
कहेगी तू. ले नाम एक बार.
उस मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का .
कह मुझसे.
क्या सच में रखी उसने मर्यादा ?
नहीं आती मुझे,
आँखों से निरख कर,
स्पष्ट दोषों को,
फिर भी करूँ मैं मिथ्या चाटुकारिता.
उसने भी, क्या सर्वत्र रखी,
समुचित मर्यादा.
क्यों टेकूं फिर मैं माथा.
आदर्श और सिद्धांत.
समदर्शी होते हैं.
जाति समाज धर्म की विषमता में भी,
उसके नियमों की समता होती है.
व्यक्ति-विशेष पर,
वे नहीं बदलते हैं.
सर्वत्र, ध्रुव से अचल रहते हैं.
बालि ने,
निज भ्राता की पत्नी को अपनाया.
घोर अधर्म कहकर राम ने,
उसे निज शर का लक्ष्य बनाया,
रण का सिद्धांत,
शत्रु, आमने-सामने हो.
प्रभु होकर भी,
शत्रु को अनजाने में,
वृक्षों की ओट से दी
उसको मर्मान्तक चोट.
यदि यह उचित था
तो क्या विभीषण ने,
रावण की विधवाओं को,
ज्येष्ठ भ्राता की पत्नी को स्वीकार.
क्यों उसे नहीं वहीँ राम ने धिक्कारा .
अपितु पुरस्कार स्वरूप किया
राजतिलक और दिया सिंहासन
सब प्रकार से दिया अभय-वचन.
माना,
बालि द्रविण था.
रावण राक्षस था.
दोनों के धर्म सामाजिक संरचनाएं भिन्न थीं.
किन्तु राम !
उनकी न्याय-तुला एक थी.
और जनकसुता !
वह उनकी पत्नी ही नहीं,
राजमहिषी थी.
यदि वह भी नहीं,
तो सामान्य प्रजा थी.
एक पक्ष की बात सुनकर,
किया उसको वन-वासिता .
और फिर बार-बार का आग्रह
सबके सम्मुख दो अग्नि-परीक्षा.
वह भी नारी थी .
अबला थी, बेचारी थी.
रही निरुत्तर नहीं कहा कुछ भी,
बोली “माता धरती ले लो मुझे अभी”
धर्म, अधर्म.नीति अनीति,
परिस्थतियों के चक्र में चक्कर खाते,
इन शासनकर्ताओं के ही, स्वर में,
इनके अनुरूप ही उतरते हैं.
धर्म वही ! नीति वही !
जिसे, जैसा ये कहते हैं !
अतः मत लो.
इन छलियों का नाम.
नहीं चाहिए इनका धाम.
महाशून्य से आया हूँ,
महाशून्य में जाऊँगा .
यदि होगी कोई शक्ति वहाँ अधीष्ठित,
उसे ही शीश नवाऊंगा.
नहीं मुझे,
देव, मानव, सुर, असुर,
किसी की भी दया अपेक्षित.
जो कर्म किया है,
न्याय-तुला पर चढ़ा हुआ है.
उसका फल पाऊंगा निश्चय.
वह वासुदेव नारायण भी,
निज कर्मों का फल पायेगा.
यह कर्म प्रधान धरा है,
बच कर कहाँ वह जाएगा.
कहीं पर वह भी,
अपने निज दोनों हाथों को,
चुपचाप कटाकर,
बैठा रह जाएगा.
पुनः कहा पृथा ने –
“ मेरे वत्स !
त्याग मन का यह आक्रोश.
समय नहीं अब रखने का,
मन में यह पीड़ित रोष.
मनुष्य कभी मनुष्य के,
अंतिम साँसों का निर्णायक नहीं होता.
अंत समय,
वही सर्वनियन्ता ही
स्वांसों का स्वामी होता है.
पुत्र !
जो अंत समय उसे स्मरण करता है
वह उस महान शक्ति में,
स्वतः प्रवेश करता है.
“अन्तकाले च मामेव स्मरंमुक्तावां कलेवरम् .
यः प्रयाति स मद्भाव .....”
अतः दो अक्षर यह “राम.”
यही है चिरंतन विश्राम.
समाहित इसमें अनगनत बीते,
जन्म-मरण जाने कितने आगत.
प्राणों में रमने वाला यह शब्द,
है परम शांतिमय संत्वनामय
सदा निरापद.
मुझे तो इन अवतारों से,
जाने क्यों है इतनी गहरी ममता.
एक ही स्वर !
अति दूर कहीं से आता
इन प्राणों में है बजता,
है ! बस जाता कस्तूरी मद सा.
रोम-रोम पुलकित हो जाते,
झंकृत हो जाते प्राणों के स्वर.
उसे छोड़ हम हो पाते,
भला कहाँ किस पर निर्भर.
मानव बनकर अवतारों के मिस,
वह, मानवीय पीड़ा,
ममता, कोमलता, संशय, द्वंद्व
सभी कुछ तो है सहता.
साथ-साथ हम जीवों के संग,
वह भी, रोता है हंसता.
जीवन के बीहड़ पथ का
वह भी तो सहयोगी है.
जब वह, इन अवतारों से अलग,
निज शुद्ध-बुद्ध स्वरूप में आएगा.
न्याय-तुला के संतुलन को,
निरखती उसकी कठोर आँखों में,
झेली गयी संग-संग की पीड़ा का,
निश्चय ही स्मरण कर,
जल भर आएगा.
वह दृष्टि !
स्वतः कोमल हो जायेगी.
और फिर, दुर्बलताओं के आगर हम प्राणी को.
निश्चय, कहीं कुछ सांस मिल जायेगी.
इसी से, में सर्वदा निरंतर
इन अवतारों के चरण पर नत हूँ.
जितने प्रिय हैं राम मुझे,
उतनी ही वंशी-धुन में रत हूँ.”
स्थिर दृष्टि से देखा पृथा को,
किंचित कर्ण मुस्काया.
खींच उसके दोनों चरणों को,
सादर उसे शीश लगाया.
फिर आहत आकुल सा बोला-
“ अंतिम विद्या ! विदा दे माता !
तू ममता की प्रतिमा है.
मात्र अश्रुओं से निर्मित,
नहीं किसी से समता है.”
ह्रदय लगाकर कर्ण को उसका शीश,
निज वक्ष पर पृथा ने सहज दबाया.
बिखरे केशों को उसके,
निज हाथों से सहलाया.
भरे गले कम्पित स्वर में बोली-
“तू ! अति गौरवशाली है वत्स !
गर्वोन्नत शीश उठाकर जा.
तेरी दानवीरता की तेजस्विता से,
स्वर्ग, धरा, दोनों ही कम्पित.
निष्कंटक तेरा मार्ग सुगम है,
यह पृथ्वी तेरे लिए अधम है.
स्वर्गलोक हो या मृत्युलोक ,
दोनों ही तुझे नहीं अपेक्षित.
शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध महाशून्य में,
तेरा स्थान समादृत और सुरक्षित.
देवों से भी कहीं श्रेष्ठ-पुरुष .
आज महा-प्रयाण करता है.
फटता है धरती का कातर अन्तर .
आकाश झुका,
नमन करता है.        

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