पृथा की आरक्त अश्रु छलकती,
पीड़ा से जलती, दग्ध आँखों में
तैर रहा था, प्राची का लहर लेता
लोहित रक्त का सागर !
रात्रि-जागरण की क्लांत , श्रांत आँखों के,
श्यामल सुरमई क्षितिज पर, अश्रु-बिंदु रह-रहकर,
दीखते थे, झिलमिल नखतों से !
गहरी साँसों से उद्वेलित वक्ष,
बिखरे थे शीश पर चिकुर रुक्ष.
पग थकित किन्तु चंचल थे,
हो रहा था विलम्ब, सत्वर पहुँचने को विकल थे.
किन्तु, सत्वहीन तन-मन के शिथिल चरण,
चाह कर भी नहीं बढ़ पाते थे, एक भी कदम.
शक्ति-रहित बोझिल मन,
किसी प्रकार खिचती थी अधीर,
पोछती थी उत्तरीय से नीर. सहमी,
कम्पित गहन विचार मग्न.
आहत मन. शीश नत.
शनै शनै वह बढती जाती थी.
सोच रही थी.
मन पर होता यह असह्य अत्याचार.
कर रहा तन पर भी निष्ठुर प्रहार.
यदि पहुँच न पायी मै सत्वर,
अगणित प्रश्नों के तीखे शर,
बेधित कर देंगे, मेरा तन-मन, आहत अंतर.
जिस ज्वाला से दग्ध ह्रदय है,
विवश प्रगट करना होगा.
जले पर नमक छिटकते प्रश्नों को,
अकारण, बरबस सहना होगा.
क्योंकि, अंतर में आंवे सा जलता दर्द,
जो प्रकाश में नहीं आता,
कितना ही गहन दारुण असह्य हो वह,
उसे कोई जान नहीं पाता.
एकाकी, निःसंग झेली गयी पीड़ा,
जितनी तीक्ष्ण उतनी ही अक्षुण और निरंतर है.
अंतर में शूलों से चुभता यह दर्द,
अनवरत धंसता रिसता गहराई में,
इस नीवरहित गलित समाज के,
विकृत आडम्बर को.
कितनी दारुण पीड़ा को, मौन जिया है मैंने.
अभी-अभी कालकूट हलाहल का,
महा-चषक पिया हैं मैंने.
फिर भी , है विवशता.
अंतर की कृत्या सी फ़ैली,
इस शाश्वत बढती ज्वाला का,
किंचित भी आभास नहीं दिया मैंने.
मेरा पुत्र ! मेरे प्राणों की पीड़ा का धड़कन !
मेरा आहत ह्रदय !
उद्दत मानवीय गुणों से संभूत,
सर्वश्रेष्ठ योद्धा इस युग का,
धरती, आकाश, स्वजन, परिजन,
अनवरत सदा, सबसे छला गया.
जननी की पावन गरिमा से, संखलित हुई मैं !
मैंने भी उसे माँ के प्यार,
पुत्र के अधिकारों से, वंचित ही रखा.
उसके प्रति उचित न्याय नहीं किया.
उसको उसका वांछित नहीं दिया.
वह, अप्रमेय, अभूतपूर्व बलशाली !
तिल-तिल, तन-मन से, टूट-टूट कर भी,
अडिग वज्र-सरिस, स्वाभिमान-पूरित,
सदा रहा गरिमा के उच्च मंच पर,
अधिष्ठित.
नहीं झुका कभी, नहीं मुड़ा वचन से.
किंचित भी आभास नहीं दिया,
कितना टूटा है वह मन से.
सबको खुले ह्रदय से, खुले हाथों से,
उन्मुक्त दान कर,
समस्त आकर्षणों को व्यर्थ जान कर,
निज उजली चादर यहाँ त्याग कर,
अभी-अभी उठकर चला गया है.
देख उधर ! पांडव-कक्ष में,
विजयोत्सव की कैसी धूम मची है.
रंगों से प्रकृति वहां होली खेल रही है.
यह, रंगभरी दीवाली !
यह विजयोत्सव का उन्मत्त महोत्सव
!
क्या रंचक भी इनमें कहीं,
विषाद की रेखा है ?
ये वही हाथ गुलाल उड़ा रहे.
ये वही हाथ दीप सजा रहे.
जो अबतक,
अपने ही स्वजनों की ताजे लाल रक्त से,
गीले हैं.
छिपा नहीं पाता उसको कोई रंग.
वे इतने मुखर और चटकीले हैं.
क्या इनका विवेक जड़ है ?
क्या इन्हें तनिक भी ग्लानि नहीं ?
प्रतिपक्षी ही नहीं,
अपनों का भी तो निधन हुआ है.
किन्तु विपक्षी भी कौन ?
एक ही रक्त, एक ह्रदय के दोनों भागों में है.
एक ही वक्ष का रक्त, बहता इन सबकी रगों में है.
पाकशाला के महाभोज के इंधन की जलती लपटें.
और चिता की उठती ज्वाला. क्या कोई अंतर है ?
यह सब क्या अशोभन और वीभत्स सा,
मन को दहलाता, लगता नहीं भयंकर है ?
यह उल्लास-हास !
महाशम्शान के महाकाल का भीषण नर्तन सा है.
किसी महा-अशुभ विप्लव का,
ये क्या आभास नहीं देते ?
आगे उस ओर अग्रसर होते, मेरी साँसें खिंचती हैं.
अंग-अंग टूटता बर्फ हुआ जाता है.
प्राणों की हर धड़कन अकुलाती और तडपाती है.
कोई भीतर चीख-चीख कर कहता है –
“मत जा, थम जा !
तू ही कह, क्या यह अन्याय नहीं,
सूर्य-पुत्र के प्रति ?”
“अन्याय ! – कहा मैंने – देवि ! न्याय कहाँ है ?
भाव वैषम्य में, न्याय-तुला कहाँ एक है ? ”
“तात्पर्य”- कहा पृथा ने-
“यही की अन्याय सूर्य-पुत्र के प्रति ही नहीं,
कृष्णा के संग भी हुआ है.
जितना जला ह्रदय कर्ण का,
उतना ही तडपा मन कृष्णा का है.
कृष्णा की करुण कथा सुनकर,
एक ही संशय मुझे सताता है.
क्या है यह संसार-चक्र ?
क्यों एक ही इतिहास,
पुनः लौट-लौट कर आता है.
आयी थी. द्रुपद-सुता.
कुछ ऐसा ही मुझे जताने को.
मातुश्री ने, अपना प्रतिशोध लिया है.
जिस शाश्वत पीड़ा को झेला है.
उसमें ही मुझे, अविराम धकेल दिया है.
कैसी अनुचित आज्ञा देकर
मेरा जीवन पीड़ा-पूर्ण किया.
मेरे अरमानों की बलि चढ़ाकर
मेरे सपनों को चूर्ण किया.
जिस उत्पीडन, शोषण, संत्रासित जीवन को,
स्वयं अहर्निशि झेला था.
कर्तव्य था उस ज्वलित वह्नि से,
मुझे दूर से ही अलग करना था.
नहीं स्वीकृत मैं थी.
वैसी ही मुझे पितृ-गृह लौटा देना था.
अपमान की असहय सुलगती ज्वाला में,
यों नहीं मुझे जलाना था.
क्या ज्ञात था मुझे कि, प्रारब्ध में,
यह सब भी पाना था.
चौकीं पृथा- “ प्रतिशोध लिया है मैंने ?
नहीं ! कदापि नहीं !”
जो कुछ हुआ है उसके साथ,
वह,
यहाँ के पर्वतीय प्रदेशों के कुछ खण्डों का,
है चली आ रही, अति प्राचीन प्रथा.
एक भ्राता की विवाहिता,
पत्नी होती है अन्य भ्राताओं की भी.
उत्तर नहीं, दक्षिण के आंध्र,
कनारा
और कन्या तीर्थों में भी
व्यापक है ऐसी ही पद्धति.
नहीं ज्ञात और कहाँ कहाँ ऐसे ही सम्बन्ध बने.
नारी स्वाभिमान सम्मान की परम्परा,
सदियों से संखालित हुई है.
भरत-राजवंश से कहीं पूर्व,
तारा बृहस्पति-पत्नी का हरण किया था चन्द्रमा ने.
कहीं से कोई भी विरोध का स्वर,
नहीं उद्घोषित हुआ, देवगणों या ऋषियों से.
अपितु, तारा और चन्द्रमा के पुत्र बुद्ध के,
जातक संस्कार में,
निर्विरोध प्रसन्नता-पूर्वक, उपहार ले लेकर,
आये वे ही, देवगण, ऋषिगण.
बुद्ध को, निज आशीषों से अभिसिक्त कर ,
विदा हुए उसे उपहार समर्पित कर.
और पुनः तारा सहर्ष साग्रह बिना आपत्ति के,
ग्रहण किया बृहस्पति ने.
ये देवगण,ऋषिगण, ब्राह्मण एवं शासक उच्चवंश ,
किस नियम और सिद्धांतों के निकष पर,
धर्म,निति-अनीति खरा उतारते हैं. या,
निज सुविधा के अनुरूप,
निज दृष्टिकोण को सम्मुख रखकर,
मनमाना तोड़-मरोड़ करते हैं.
अन्यथा,
सीता की बार-बार अग्नि-परीक्षा,
गौतमी का पाषाणी बनना,
सती का एक कौतुहल निवारण के कारण,
दक्ष-यक्ष में भस्म हो जाना.
इसी परिपेक्ष्य में,
तारा को किसी प्रकार चंद्रमा से प्राप्त कर लेना,
सबके समीप जाकर बृहस्पति का आतुर आग्रह.
क्या था ?
धर्म-अधर्म, सतीत्व, पातिव्रत सबकी,
इनकी अपनी परिभाषा है.
इनसे, अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति,
मात्र एक दुराशा है.
कहा जाता है –
“सीता बनो सावित्री सी रहो .”
किन्तु ! सीता की निर्दोषिता.
उसकी, नारी की सर्वागीण पूर्णता.
ज्वलित-अग्नि-परीक्षित प्रमाण भी,
व्यर्थ था.
उसे, एक साधारण पत्नी का भी,
अधिकार नहीं था.
उसकी अग्नि-परिक्षा या, स्वर्ण-प्रतिमा.
दोनों ही था, नारी की विवश अपंगता का,
व्यंग और कटु उपहास.
नहीं था वह, उसके सम्मान की स्वीकृति.
प्राप्त नहीं थी उसे, निज निर्दोषिता,
प्रमाणित करने की अनुमति.
एक ही प्रमाण था-
“भस्म हो या बचो.”
निर्मित कर सोने की प्रतिमा.
पुरुष ने प्रदर्शित की अपनी प्रभु-सत्ता.
विकीर्ण हो रहा था प्रतिमा से,
अवेदनशील, बलशाली पुरुष की
दुर्धश ‘अहम्’ ! निरंकुशता !
अन्यथा,स्वर्ण-प्रतिमा रखने के पश्चात भी,
स्वीकृति के पूर्व यह संशय क्यों ?
“एक बार पुनः दो अग्नि परीक्षा.”
नारी थी.
स्वाभिमान शालीनता से पूरित.
देखा राम की ओर पूर्ण दृष्टि से-
“क्या यह है उचित ?”
किन्तु, पाषाण से निकलती सरिता,
उसे आद्र ही बनाती है,
पिघलाती नहीं !
आँखों में उमड़ी,
युग-युग की पीडिता नारी की,
दारुण घोर व्यथा.
आह !
असहनीय यह करुण कथा.
देखा उसने राम की ओर.
यह आज्ञा भी उसकी,
जो अविराम रहा उसकी यादों में.
वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम.
क्यों हुआ ऐसा कुलिश कठोर.
बार-बार की अग्नि-परीक्षा,
क्यों ऐसी है उसकी इच्छा.
जिन प्राणों ने, राम-राम अविराम कहा.
जिन स्वांसों ने,
राम-नाम की केवल,
अजपा माला ही सदा जपा.
यह वही राम !
अब भी,
सत्य की साक्ष्य मांग रहा.
जिसके विरह में, एकनिष्ठ चिंतन में,
वह स्वतः यक्ष की जलती अग्नि बनी रही.
विरह की हर उठती लपटों में,
राम की अभिराम स्मृतियाँ गुथीं रही.
उसका वह आराध्य !
अब किस ज्वाला में जलने को कहता है ?
वह क्यों समाज की विवेकरहित अनीतिपूर्ण इच्छा का,
मौन समर्थन करता है.
नहीं दया अपेक्षित.
किन्तु वांक्षित न्याय भी तो प्राप्त नहीं.
जब निःसहाय, निराधार का
सर्वेश्वर भी आधार नहीं.
व्यर्थ भार वहन करना जीवन का,
जब इसका कभी कोई निदान नहीं.
देख व्यथा सीता का,
फटा ह्रदय पृथ्वी का.
विलीन हो गयी नारी. अं
त हुआ असह्य व्यथा का.
आदर्श नारी को भी,
यह समाज किसी तरह भी
सहन नहीं कर पाया.
समाज की क्षुद्र घृणित विचारधारा ने,
उसे सतत पीड़ित कर अपना बलि बनाया.
लानत है इस समाज को.
जगत-जननी कहा जिसे,
उसे भी उसका वांछित सम्मान, नहीं दे पाया.
क्या है अस्तित्व नारी का.
वह भले ही राजमहिषी ही हो.
कोई भी नगण्य अपरिपक्व मस्तिष्क वाला,
अविवेकशील, असंस्कृत,
उसे जैसे चाहे, अपमानित कर जाए.
वह सीता !
धरती की बेटी !
माधवी की ही भांति सहनशीला.
कहीं भी अवमानना के एक भी शब्द,
राम के प्रति नहीं.
मन की अविराम जलती अग्नि में,
उसके राम, खरे सोने से थे.
अतुलनीय नारी थी वह.
नहीं थी तुलना उसकी,
विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी,
अथवा कृष्ण की पत्नियां,
और राधा एवं गोपिकाओं से.
इन सभी ने. कहीं न कहीं,
मान-अपमान करके, रूठ कर, क्रोध जताकर,
अपने पतियों का, अपमान किया ही था.
किन्तु सीता !
सदा अचल अडिग श्रीराम चरण में
आश्रित ही रही.
उस आदर्श नारी को,
उसका अधिकार नहीं मिला.
राम को, मर्यादा-पुरुषोत्तम का ही स्वरूप,
प्रजा और समाज में प्रतिष्टित करना था.
उन्हें पत्नी की नहीं,
समाज की स्वीकृति अपेक्षित थी.
बृहस्पति के लिए समाज, धर्म, निति, अनीति
शून्य रहित थे.
पत्नी ही सम्पूर्ण संतुष्टि थी.
और अहिल्या,
गौतम के निमित्त,
अपवित्र ही नहीं,
नितांत उपेक्षित और गर्हित थी.
इस प्रकार, एक ही परिपेक्ष में,
कहीं पर मौन ! कहीं पर रोष !
दो विरोधाभास जताते हैं.
जिस प्रकार निज सुविधाएं सुलभ हों,
शासक समाज और धर्मवेत्ता ब्रह्मणगण अपनाते हैं.
अचानक घबरा कर कहा पृथा ने-
“कहाँ अटक गयी ! किस विवाद में !
शीघ्र पहुँचना है गृह,
अन्यथा वहां भी चिंतित होंगें सब .
कहाँ गयी थी मैं अर्धरात्रि में.”
कहा मैंने-“शुभे ! आपको किसका डर या भय.
पुत्रों का ?”
खीजकर कहा पृथा ने-“पुत्र !”
यह संज्ञा बहुत दूर ही रह जाती है.
जब शिशु के शीश से,
माँ के आँचल की छाया हट जाती है.
वक्ष में मुंह छिपाकर, आँचल से निज को ढंककर,
दुग्ध-पान करता सूत ही पुत्र है.
वह ! माँ से रूठता और मचलता है.
उसको ही अपनी सीमा और आधार समझता है.
उतनी ही उसकी दुनिया होती है.
किन्तु, वयस प्राप्त करते ही,
सबल पुष्ट शरीर दृढ भुजाओं के होते ही,
मात्र वह, पुरुष बनकर ही रह जाता है.
अपने पूर्वजों के पिछले पदहिन्हों पर,
उसी प्रकार चलता,
वही तेवर ! वही भृकुटी.
वही कड़ी दृष्टि, लेकर,
कठोरता से सम्मुख आता है.
माता पुत्र के, संबंधों का कोमल तंतु,
वहीँ से छिन्न-भिन्न हो जाता है.
शोषणकर्ता और शोषिता की
पुनः पुनरावृति हो जाती है.
एक, पुरुष पाषाणों का विकट अट्टहास है.
दूसरा, उससे ही ठोकर खता,
उसे भिंगा-भिंगाकर आद्र बनाता,
अविरल ढल-ढल झरता,
निर्झर का बहता पानी है.
एक पुरुष, एक नारी की,
यही शाश्वत करुण कहानी है.
इन सारे संबंधों, परिवेशों का,
केवल एक ही है पर्याय.
“पुरुष !”
जाते ही, दम नहीं लेने देंगे.
पथ-श्रम, नहीं हरने देंगे.
क्या बीता है, क्या हारा है,
कितना टूटा है मन.
कितना उसने झेला है.
कुछ भी नहीं कहीं सँभलने देंगे.
टूट पड़ेंगे चारो ओर से,
लेकर प्रश्नों के तीखे शर.
सात महारथिओं से घिर आहत अभिमन्यु,
अनगिनत शरों की शय्या पर,
शयित भीष्म, आठवें वासु.
दोनों के विशिख कम पड़ जाते हैं.
जब प्रश्नों के शर एक साथ छूट जाते हैं.
आकुल ह्रदय, कांपते अधर, रसना पर अस्फुट स्वर,
बिखर-बिखर कर रह जाते हैं.
इन अनर्थ, व्यर्थ के चोटीले
प्रश्नों के,
चुभते, कटंकित, कटीले, कटघरे में,
अपराधिनी सी, निरालम्ब, निराधार सदियों से,
दोषारोपण के निर्मम बौछारों में, खड़ी हुई है नारी.
तपता आकाश शीश पर,
जलती धरा चरण तले,
निरीह आतंकित सत्य, छिपा, अश्रुओं में, सतत पले.
किस साहस से वह किससे क्या कहे.
करुणा कातरता की कोमल प्रतिमा.
मोम सदृश्य ह्रदय जले.
अपनी अपंग विवशता पर,
आंसू के शतधार बहे.
किन्तु प्रश्नों की वर्षा में,
किसका आश्रय वह ग्रहण करे?
किन प्रश्नों का उत्तर दे ?
करे किनका प्रतिकार ?
प्रश्नों पर प्रश्नों की बौछार,
हो उठे प्रश्न दुर्निवार.
हर उत्तर,
पुनः सहस्र प्रश्न बनकर,
उठ खड़े हुए,
रक्त-बीज दानव से.
कैसे पाए वह निस्तार.
इस प्रभुता संपन्न नृशंस मानव से.
कभी न समाप्त होंगे,
ये प्रश्नों के गोरखधन्धे.
वे क्या निदान बताएँगे,
जो स्वयम निजः-मद में हैं अंधे.
इन सब प्रश्नों के उत्तर,
प्रश्नकर्ता को, भलीभांति विदित हैं.
क्योंकि, यह मात्र संघर्षं है.
अहंकारी, बलशाली, आत्मकेन्द्रित शोषणकर्ता और,
निर्बल, निरीह, दलिता, शोषित नारी का.
जिन प्रश्नों के,
कशाघातों के आघातों से आक्रान्त,
हारी विवश उत्तर देकर भी,
उत्तर-रहित हुई है,वह !
और सब पुराने, सड़े, गलित, निर्जीव, प्रश्नों के,
सन्दर्भसहित, व्याख्यामय, सटीक, समुचित,
उत्तर,
बहुत दिनों से,
बड़ी सुरक्षा से,
कृपण के घन सरिस,
बंद हैं,
इनके ही तलगृह की
सुदृढ़ लौह तिजोरी में .

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